/दंगा कैंप राहत में तीन मंत्री…

दंगा कैंप राहत में तीन मंत्री…

-आलोक पुराणिक||

यह किसी काल्पनिक देश-प्रदेश की कतई काल्पनिक गाथा है, इसका सच से कुछ लेना-देना हो तो हो, किसी सरकार से कोई लेना-देना नहीं है.

अबे बहुत आफत हो रही है, बड़े नेता बावले हो रहे हैं मिनिस्टर बनने को, कह रहे हैं कि अगली बार तो पता नहीं चुनाव जीत पायें कि नहीं. अभी ही मिनिस्टर बना दो, खा-निपट लें.My-Neta

जनाब, मिनिस्टर बनेंगे कहां है. पशु पालन विभाग और कुक्कुट पालन विभाग तक के लिए मारकाट हो ली है पहले. अब तो डिपार्टमेंट ही नहीं हैं.

अबे तो डिपार्टमेंट नये बनाओ. देखो दंगे होते रहते हैं सूबे में, तो एक दंगा मंत्री क्यों ना बना दें

जनाब, कैसी बातें कर रहे हैं, पहले ही पब्लिक आरोप लगाती है कि मंत्री ही दंगा करवाते हैं और अब आप उनके नाम के आगे दंगा मंत्री लगा देंगे, तो फिर तो लोगों को यकीन हो जायेगा कि एक मंत्री का जिम्मा सिर्फ और सिर्फ दंगा कराने का है.

अबे, मेरा मतलब है कि दंगा राहत मंत्री बना दें.

जनाब, इसके लिए जरुरी है कि दंगे नियमित हों सूबे में, तो ही तो यह मिनिस्टर काम कर पायेगा.

अबे, तू बेवकूफ है. तुझे क्या लगता है कि हम जिन्हे जिन विभाग का मिनिस्टर बनाते हैं, वो उस विभाग का काम करता है क्या.

जनाब, मिनिस्टर किसी भी विभाग में हो, वह एक काम तो करता ही है कि वह नोट बनाता है. इसके अलावा मिनिस्टर पर कोई और काम करने का संवैधानिक दायित्व तो नहीं होता.

अबे दंगा राहत मंत्री बनाकर एक बंदे को रोजगार दिया जा सकता है.

जनाब, दंगे से मंत्रियों को रोजगार देने पे तुल गये हैं आप, तो फिर एक को बनायें दंगा मंत्री, जो दंगे से जुड़ी संभावनाएं, आशंकाओं का कामकाज देखे. दूसरे को बनायें राहत मंत्री, तो दंगे से जुड़े राहत बजट में खाने-पीने का डौल जमाये. तीसरे को बनायें हम दंगा राहत कैंप मंत्री, दंगे होंगे, तो कैंप भी खुलेंगे. एक मिनिस्टर दंगा राहत कैंप का हिसाब-किताब देखे.

अबे, तू तो घणा हुशियार है बे, एक दंगे से तीन मिनिस्टर निकाल देता है.

जनाब, दंगे से कई मिनिस्टर निकलते हैं आप सिर्फ तीन की बात कर रहे हैं.

अबे, दंगा तो कईयों को कारोबार देता है. दंगे राहत कैंप में सुना है कि कई बच्चे हैं, उनके लिए राहत कैंपों में ही स्कूल खोल लो. एक मंत्री यह भी हो सके-दंगा राहत कैंप शिक्षा मंत्री.

जनाब, आपकी सोच कितनी ऊंची है. दंगे से कैसे-कैसे रोजगार निकाल रहे हैं.

अबे, दंगे बड़े हुए तो राहत कैंप भी बड़े लगेंगे. कैंप में अस्पताल खोल दो, एक मिनिस्टर ये बन सके-दंगा राहत कैंप अस्पताल मंत्री.

जनाब, कमाल कर दिया आपने. मिनिस्टर ही मिनिस्टर बरसेंगे एक दंगे से. इतने मंत्री इस तरह के तब हो सकते हैं जब दंगे खूब हों, बड़े हों, लगातार हों.

अबे, वो चिंता तू छोड़ दे. नेताओं को बेरोजगार ना रहने दूंगा, चाहे जो भी करना पड़े मुझे.

(नेशनल दुनिया, 30 दिसंबर, 2013, सोमवार, संपादकीय पेज पर छपा व्यंग्य)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.