/आम आदमी पार्टी की सरकार को समर्थन देना कांग्रेस की मजबूरी…

आम आदमी पार्टी की सरकार को समर्थन देना कांग्रेस की मजबूरी…

-हरेश कुमार||

दिल्ली में विधानसभा चुनाव परिणाम आने के बाद से किसी भी दल को बहुमत ना मिलने और 15 सालों से केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली की सत्ता पर काबिज कांग्रेस को आम आदमी पार्टी के हाथों, बिजली, पानी और कॉमनवेल्थ खेल घोटालों में भ्रष्टाचार करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा तो भारतीय जनता पार्टी को अंतिम समय में दिल्ली में अपने प्रदेश अध्यक्ष को बदलना पड़ा एवं हर्षवर्धन के नेतृत्व तथा नरेंद्र मोदी की लहर के बावजूद भी भाजपा को 31 सीट और उसकी सहायक पार्टी अकाली दल को एक सीट पर कामयाबी मिली जो 70 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत से चार कम थे तो दूसरी तरफ 13 महीने पहिले गठित आम आदमी पार्टी यानि आप ने सभी राजनीतिक पंडितों को चौंकाते हुए 28 सीटों पर झंडा गाड़ दिया. इसके बाद से दिल्ली की सत्ता पर काबिज होने हर राजनीतिक दल के लिए एक टेढ़ी खीर साबित हो गई. एक तरफ जहां एक सीट जनता दल यूनाइटेड को मिला तो एक सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार की जीत हुई.98936

अगर आप का असर नहीं होता तो भाजपा जोड़-तोड़ का प्रयोग करके सरकार कब की बना चुकी होती, जैसा कि पहले यूपी, झारखंड और कर्नाटक में पार्टी कर चुकी है और इसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा है. इससे पहले सबने देखा है कि अलग चाल, चरित्र और चेहरा का दावा करने वाली पार्टी भी अन्य पार्टियों की तरह ही है. उसके विधायक औऱ सांसद व पार्टी कार्यकर्ताओं पर भी उसी तरह से हत्या, बलात्कार और अपहरण के केस दर्ज हैं जैसे अन्य पार्टियों के नेताओं व कार्यकर्ताओं पर.
अपनी पुरानी गलतियों से सबक सीखते हुए पार्टी हर कदम फूंक-फूंक कर रख रही है और वह कोई भी ऐसा कदम उठना नहीं चाहती है जिससे आगे चलकर नुकसान हो औऱ पार्ती एख बार फिर से सत्ता से वंचित हो जाये. पार्टी को मालूम है कि एक छोटी सी गलती का आने वाले लोकसभा चुनाव में बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ सकता है और वैसे भी आप की सरकार ज्यादा दिन चलने वाली है क्योंकि इसे समर्थन देने वाली पार्टी कांग्रेस में शुरू से ही इसे लेकर एकमत नहीं है, बस वक्त की नजाकत को भांपते हुए ही उसके नेता चुप हैं. भाजपा नेताओं की मानें तो अगले लोकसभा चुनाव में मोदी की लहर पर सवार होकर केंद्र में सरकार बनाने के बाद दिल्ली की सत्ता पर आसानी से कब्जा किया जा सकता है।
इधर कांग्रेस की हालत तो सांप-धुछूंदर जैसी हो गई है. आप द्वारा उसके 15 सालों के शासन में हुए भ्रष्टाचार के खिलाफ एक-एक करके पोल पट्टी खोलने व अपने वादों को अमलीजामा पहनाये जाने के बाद भी चुपचाप बेइज्जती का घूंट पीकर रह रही है. और दूसरी तरफ आप चुनावों में किए गए वादों के अनुसार सबसे पहले प्रति परिवार को 667 लीटर प्रतिदिन पानी मुफ्त देने यानि महीना में 20 हजार लीटर पानी मुफ्त देने का ऐलान करते हैं तो 400 यूनिट तक बिजली बिल पर 50 प्रतिशत तक छूट की घोषणा करने के साथ-साथ कैग से मिलकर तीनों बिजली कंपनियों के ऑडिट की भी घोषणा कर देती है.

वर्तमान स्थिति में, कांग्रेस के पास भाजपा को रोकने के लिए केजरीवाल सरकार को अभी समर्थन देने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है. उसका मानना है कि अभी चुनाव हुए तो इसका नुकसान कांग्रेस को ही होगा. और भाजपा है कि हर हाल में चानव चाहती है क्योंकि उसे मोदी के करिश्मे पर भरोसा है. भाजपा को लगता है कि आगे जब कभी चुनाव हुए तो इसका लाभ उसे ही मिलने वाला है. दूसरी तरफ, कांग्रेस के रणनीतिकारों का मानना है कि अभी सरकार को कुछ दिन चलने ना चाहिए. अभी सरकार गिराने से उसे नुकसान उठाना पड़ेगा तथा गर्मी के महीने में पानी-बिजली की असली समस्या जनता के सामने आयेगी और फिर लोगों को वह बताने में सक्षम हो सकेगी कि देखिए वादे करना और उसे लागू करना दो अलग-अलग बातें हैं. फिर सरकार से समर्थन लेने का उसे लाभ भी मिलेगा और वो जनता के बीच जा सकेगी. लेकिन अभी तो वो हर हाल में आप के सरकार को समर्थन देने को विवश है.

इस बीच आम आदमी सरकार, उसे समर्थन देने वाली कांग्रेस और भाजपा के नेताओं के कार्यों पर गहरी नजर रखे हुए है. आने वाले चुनावों में हर पार्टी को इसका जवाब देना होगा. जब आप ने सरकार नहीं बनाई थी तो भाजपा के नेता कहते थे कि वे सरकार बनाने से इसलिए भाग रहे हैं क्योंकि उन्होंने ऐसे-ऐसे वादे कर दिये हैं जिन्हें पूरी करना नामुमकिन है तो सरकार बनाने के बाद उनकी प्रतिक्रिया है कि केजरीवाल ने अपने बच्चों की कसम खाकर कांग्रेस से समर्थन ना लेने का वादा दिल्ली की जनता से किया था यानि चित भी मेरी, पट भी नेरी और कंटा मेरे बाप का. ना हम सरकार बनायेंगे और ना आपको चलाने देंगे. जनता जाये भाड़ में. दूसरी तरफ आप ने मुस्लिम वोटों को देखते हुए कांग्रेस से समर्थन लेकर भविष्य की अपनी राजनीति का संकेत दे दिया है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.