/सरकारी सुविधाओं को लेकर केजरीवाल पर हमला निरर्थक….

सरकारी सुविधाओं को लेकर केजरीवाल पर हमला निरर्थक….

-अनुराग मिश्र||

इन दिनों दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल व उनकी आम आदमी पार्टी हर तरफ चर्चा का विषय बनी हुई है. चर्चा इस बात कि अरविन्द केजरीवाल वास्तव में आम आदमी के नेता है या फिर आम आदमी का नेता बनने का ढोंग कर रहे है. उन पर ये आरोप लग रहें है कि वो भी पूर्व राजनेताओं का की भांति सरकारी संसाधनो के उपयोग में लगे हुए है.Arvind_Kejriwal_new_official_residence

ऐसे में यह देखना आवश्यक है कि मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल और उनका मंत्रिमंडल सरकारी संसधानों का उपयोग किन रूपों में कर रहा है ? यदि वो सरकारी गाडी और सरकारी फ्लैट का इस्तेमाल अपने निजी उपयोग के लिए कर रहा है तो ये गलत है. लेकिन अगर जनता के हित के कर रहे हैं तो यह सही है. क्योकि शासन में मुख्यमंत्री और उनके मंत्रीगण ही जनता प्रतिनिधितव करते है और जनता से सीधा संवाद कायम रखने के लिए और जनता के हितों के लिए बनी योजनाओ का क्रियान्वयन करने के लिए उन्हें एक समुचित स्थान व माध्यम की आवश्यकता पड़ती है. अगर इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वो जनता के धन से ख़रीदे गए संसाधनो का प्रयोग करते है तो इसमें गलत क्या है ?

वस्तुतः सवाल ये नहीं होना चहिये कि मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल क्या ले रहे है बल्कि सवाल ये होना चाहिए कि अरविन्द केजरीवाल दे क्या रहें है ? और इस लिहाज से देखा जाये तो अब तक केजरीवाल द्वारा उठाया हर कदम आम जनता के हित में ही रहा है.

जहाँ तक सवाल विरोधियों का है तो एक कटु सत्य यह भी है लोकप्रियता अपने साथ विरोधियों को लेकर आती है. जैसे-जैसे आपकी लोकप्रियता बढ़ेगी वैसे-वैसे आपके विरोधी भी बढ़ेंगे. इतना ही नहीं सत्ता भी अपने साथ आरजकता भी लाती है. इसलिए यदि आने वाले समय में टीम अरविन्द के कुछ सदस्यों पर अगर किसी तरह के अनर्गल आरोप लगते है तो ये कोई बड़ी बात नहीं होगी. बड़ी बात तब होगी जब आरोप लगें और केजरीवाल उसकी जांच न करायें. आरोपी को बचायें जैसा कि अभी तक का रस्मो रिवाज चला आ रहा था.

एक बात और अरविन्द जो भी कर रहे है वो इस देश के इतिहास के लिए कोई नयी बात नहीं है. अरविन्द के जिस कदम को भारतीय राजनीती के इतिहास में एक क्रन्तिकारी कदम माना जा रहा है उसका सूत्रापात तो आजादी के कुछ सालों बाद ही सन 1957 में हो गया था जब पहली बार केरल में गैर कोंग्रेसी सरकार बनी थी और ई.एम.एस.नम्बूदरीपाद उस सरकार के मुख्यमंत्री बने थे.

उस समय नम्बूदरीपाद देश में अकेले ऐसे मुख्यमंत्री थे जो साईकिल से सचिवालय जाते थे. सिवाए सरकारी कार्यों के उन्होंने कभी भी सरकारी गाडी का उपयोग नहीं किया. इतना ही नहीं नम्बूदरीपाद सरकार की बढ़ती लोकप्रियता से घबराई कांग्रेस ने पहली बार जनता द्वारा निर्वाचित सरकार को अपदस्थ करने के लिए सन 1959 में अनुच्छेद 356 का उपयोग किया और नम्बूदरीपाद सरकार को बर्खास्त कर दिया.

ये बात अलग की है कि उस दौर में जन-चेतना उतनी चेतन्य नहीं थी कि कांग्रेस की इस नापाक हरकत पर देश की जनता कोई प्रतिक्रिया देती.

पर अब हालात बदल चुके है अब जनता सतर्क है अपने अधिकारों के लिए लड़ना जानती है. ऐसे में जब अरविन्द केजरीवाल जैसा आदमी जनता के बीच से निकलकर सत्ता के सिंहासन पर काबिज होता है तो आज के दौर में भ्रष्ट राजनीति के इजारेदार सहम जाते है. उन्हें अपनी जागीर खतरें में दिखायी देती है. यही खतरा विरोध के रूप बार-म-बार सामने आता रहता है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.