/हर चुनाव के बाद लोकतंत्र मज़बूत हो, राजनैतिक दल नहीं…

हर चुनाव के बाद लोकतंत्र मज़बूत हो, राजनैतिक दल नहीं…

~नारायण देसाई||

अभी हाल ही में पांच राज्यों में हुए चुनाव परिणामों के बाद निकट ही होने वाले लोक सभा चुनावों को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं. ऐसे में निकट और दूर के भविष्य को लेकर भी कई प्रकार की बातें की जा रही हैं. सत्ता की राजनीति से सदा दूर रह कर समाज का काम करने वाले एक लोक सेवक के नाते मेरे सामने कई चिंताजनक विषय हैं जिन्हें मैं आप सभी से साझा करना चाहता हूँ.1-loktantra

इन दोनों चुनावों के बारे में विश्लेषक अलग अलग अटकल लगा रहे हैं और कुछ तो भविष्यवाणी भी कर रहे हैं. अपनी ओर आकर्षित करने के लिए तमाम तरीके अपनाए जा रहे हैं. इसमें सबसे ज्यादा अशोभनीय तरीका है प्रजा के प्रतिनिधि बनने के दावेदार उम्मीदवारों द्वारा अपने प्रतिस्पर्धी दल के नेताओं के खिलाफ भद्दी भद्दी बातें करना. बरसों पहले जब आज की तुलना में चुनाव इतने स्पर्धात्मक नहीं थे, आचार्य विनोबा भावे ने चुनाव के सबसे विलक्षण चरित्र की व्याख्या करते हुए कहा था कि वह आत्म-प्रशंसा और पर-निंदा करने वाले होते हैं. उस काल की तुलना में आज यह और भी ज्यादा सही परिभाषा बन गई है. आज आत्म-प्रशंसा और पर-निंदा के अलावा झूठे-सच्चे वायदों के बीच देश के मूलभूत सवाल कहीं खो गए हैं और उनके बजाए तात्कालिक चमक दमक की बातों से मतदारों की आँखें चुंधिया रही हैं.

यदि राज्य या देश के चुनाव में देश के मूलभूत प्रश्नों का विचार हो तो ये चुनाव देश के लोकतंत्र को मजबूत करने तथा संविधान के मूल सिद्धांतो को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ने में सहायक होते. यही नहीं, बार-बार होने वाले चुनाव हमारे देश की प्रगति के मील के पत्थर भी बन सकते थे.

हमें यहाँ दो मुख्य बातों का विचार करना चाहिए. चुनाव में खड़े होने वाले उम्मीदवार का व्यक्तित्व और उसकी काबलियत के बारे में तो सोचना ही चाहिए. हमें इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि उनमें से कुछ उम्मीदवारों की प्रकृति तानाशाह जैसी हो तो उसका प्रभाव देश के लोकतंत्र के लिए मारक साबित हो सकता है. लेकिन व्यक्ति के स्वभाव से ज्यादा जरूरी है उसकी नीतियों पर विचार करना. यह इसलिए आवश्यक है क्यों कि चुनाव जीतने के बाद लोग सत्ता पर आए दल से उन नीतियों को लागू किए जाने की आशा रखेंगे. विरोधी दल भी इन्हीं नीतियों को केंद्र में रख कर सत्ताधारी दल का मूल्यांकन करेंगे. इसलिए नीतियों का सवाल उम्मीदवार के व्यक्तित्व जितना ही महत्वपूर्ण बन जाता है.

इस साल होने वाले चुनाव किन मूलभूत सिद्धांतो को केंद्र में रख कर होंगे यह हमारी चिंता का विषय है. राष्ट्रिय चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों पर होने चाहिए. यानी देश के ज्यादातर लोगों के जीवन से सम्बंधित होने चाहिए.

मूलभूत नीतियों की अग्रिमता को देखते हुए राष्ट्रीय मुद्दे ऐसे होने चाहिए जो:
१. संविधान के मूलभूत सिद्धांतों को ध्यान में रख कर खड़े किए गए हों.
२. देश के ज्यादा से ज्यादा लोगों के जीवन को दीर्घकाल के लिए प्रभावित करने वाले हों.
३. उन प्रश्नों को स्पर्श करने वाले हों जो विशेष रूप से समाज के दलित, वंचित तथा पिछड़ों के जीवन से सम्बन्ध रखते हों.

इस मानदंडो को ध्यान में रखते हुए हमारी चिंता का विषय यह है की आजकल चुनाव में जिन मुद्दों पर विचार होता है वह समाज के मुखर वर्ग को ध्यान में रख कर होतें हैं और जो वर्ग मुखर नहीं हैं उनकी आवाज चुनाव के शोर शराबे में दब जाती है.

देश की एक मूलभूत समस्या है रोजी रोटी की. लेकिन अपने दल प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार, प्रशासनिक क्षमता या अक्षमता अथवा भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे ही उठा रहे हैं. इस शोरगुल में कहीं भी करोड़ों भूमिहीन या करोड़ों कम पढ़े-लिखे शहरी युवकों के प्रश्न नहीं उठाए जाते.

इसी प्रकार जल, जंगल और जमीन से जुड़े सवाल भी देश के मूलभूत प्रश्न हैं. आज देश के सैंकड़ो इलाकों में सामान्य जनता, खास तौर से वंचित समाज, इन सवालों को लेकर आन्दोलन कर रहे हैं. लेकिन चुनाव की आंधी में इन आन्दोलनों का कुछ भी असर नहीं दिखाई देता.

अपने संविधान के मूलभूत सिद्धान्तों द्वारा मान्य स्वतंत्रता, समानता, बंधुता और न्याय की दिशा में देश कितना आगे बढ़ पाया है यही अपने देश के लोकतंत्र की सही कसौटी हो सकती है.

आज नजर के सामने तात्कालिक सवालों पर इतना शोर गुल होता है कि उसकी चकाचौंध में प्रजा मूलभूत सिद्धांतों तथा सवालों को भूल जाती है और इस कारण लोकतंत्र कमजोर होता जाता है.

हर चुनाव में इस बात को सोचना चाहिए कि सच्चे लोकतंत्र में आखिरी सत्ता किसके हाथ में हो – मतदारों की या उनके द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों की? विधायक, सांसद या प्रधानमंत्री के बारे में चर्चा करने का महत्त्व हो सकता है लेकिन यह कोई एक मात्र महत्त्वपूर्ण मुद्दा नहीं है.

महत्व की बात तो यह है कि हर चुनाव के बाद लोग मजबूत हों और लोकतंत्र मजबूत हो, सत्ताधारी या विपक्ष नहीं. कभी दल देश से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं हो सकता. यह एक चिंता का विषय है कि हम चुनाव प्रचार की अंधी दौड़ में कहीं सत्ता के असली हक़दार मतदाता को गौण बनाकर, उसे बहला – फुसला कर, ललचा कर, खरीद कर, डरा धमका कर, नशे में चूर कर उसका मत हासिल कर दलों को मजबूत कर रहे हैं. दल कभी भी राष्ट्र से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं हो सकता, उम्मीदवार कभी मतदाता से महत्वपूर्ण नहीं हो सकता. इसलिए राष्ट्र का महत्व समझ कर सभी दलों को देश के मूलभूत प्रश्नों पर अपनी नीति घोषित करनी चाहिए. चुनाव जीत कर सत्ता में आ जाने के बाद उस दल की सरकार इन मूलभूत सवालों को हल करने का काम कैसे कर रही है इस बात की चौकीदारी मतदारों को करनी चाहिए.

तात्कालिक और दीर्घकालिक मूलभूत प्रश्नों के चयन में विवेक रखना होगा. भ्रष्टाचार नाबूद होना चाहिए इस बारे में कोई मतभेद नहीं होना चाहिए. भ्रष्ट्राचार में शामिल दोनों प्रकार के लोग – जो घूस लेते हैं और जो देते हैं – दोनों को रोकने के कार्यक्रम बनाने चाहिए. महंगाई पर अंकुश लगना चाहिए और इसके लिए राष्ट्रिय और अंतर्राष्ट्रीय कारणों पर काबू पाना चाहिए. इसी प्रकार, देश के ग्रामीण और शहरी बेरोजगार युवकों को रोजगार देना यह एक मूलभूत सवाल है. देशी या विदेशी कंपनियों को खनिज के दोहन के लिए खुली छूट दे कर उस जमीन पर बसने वाले लोगों को विस्थापित करने की नीति को रद्द करना चाहिए.

शिक्षा के निजीकरण और व्यापारीकरण के कारण गरीब वर्ग शिक्षा से वंचित हो गया है.

इस प्रकार के कुछ मूलभूत सवाल, जो चुनाव प्रचार के शोर गुल में दब गए हैं, उन्हें आज उठाना निहायत जरूरी हो गया है.

(नारायण देसाई प्रसिद्ध गांधीवादी विचारक हैं)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.