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मंगनी के चन्दन, लगाइब रघुनन्दन…

By   /  January 9, 2014  /  No Comments

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-शिवनाथ झा||

“मंगनी के चन्दन, लगाइब रघुनन्दन”,  आज की तारीख में भारत में कला और संस्कृति को बचाने में लगी संस्थाओं, चाहे वे सरकारी क्षेत्र की हों या गैर-सरकारी क्षेत्र की, पर बहुत ही सटीक बैठ रहा है.  कला और संस्कृति के “बचाव” के नाम पर ये संस्थाएं किसी भी प्रकार से मुग़ल या अंग्रेजों के समय बने ऐतिहासिक भवनों को “हड़पना” चाहती हैं और सरकारी मुलाजिम और मुखिया भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इनके साथ हैं.Picture 556

अजमेर के नया बाज़ार स्थित अकबर का किला इसका एक ज्वलंत उदाहरण है. प्राप्त जानकारी के अनुसार इस किले के अधिकांश भागों, जो अब गलियों और बाजारों में तब्दील हो गये है, पर निजी लोगों का कब्ज़ा है. सम्भव है उस पर उनका पुश्तैनी दखल हो, परन्तु जिस तरह से अन्य दीवारों को तोड़ कर शहर की मुख्य सड़कों से जोड़ा जा रहा है, वह भले ही आज पर्यटकों को आकषित करे, परन्तु आने वाले दिनों में इसका “नेस्तनाबूद” होना तय है.

इतना ही नहीं पर्यटकों का ध्यान आकर्षित करने के लिए इसके नामों के साथ भी “खिलवाड़” करना शुरू कर दिया गया है.

इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटेक) अजमेर चेप्टर के संयोजक महेंद्र विक्रम सिंह ने अकबर के किले के अलग-अलग लिखे नामों पर ध्यान आकर्षित करते हुए सही नाम लिखे जाने की मांग की है.

Picture 584सिंह का कहना है कि नया बाजार स्थित अकबर के किले के बाहर अजमेर का किला एवं संग्रहालय लिखा है. प्रवेश द्वार पर यहां चल रहे ध्वनि एवं प्रकाश कार्यक्रम वाले बोर्ड पर अकबरी किला लिखा है. कोतवाली के बाहर सूचना पट्ट पर अकबरी किला और राजकीय संग्रहालय लिखा लिखा हुआ है.

सिंह ने कहा कि आखिर यह है तो “अकबर का किला” ही, फिर हम अकबर के नाम को विभिन्न नामों से क्यों लिख रहे हैं. सही नाम “अकबर का किला और राजकीय संग्रहालय” लिखा जाना चाहिए.

अकबर का किला की स्थिति भारत में फैले अन्य ऐतिहासिक भवनों कि स्थिति से बहुत बेहतर नहीं है, चाहे दिल्ली हो या मुम्बई. स्थानीय लोगों का क्षेत्र में कब्ज़ा, या फिर अपनी सुविधा अनुसार उन्हें बरगलाना, यह  नज़ारा सभी जगह आम है.

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  • Published: 4 years ago on January 9, 2014
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  • Last Modified: January 9, 2014 @ 10:45 am
  • Filed Under: देश

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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