/“आप” के लिये सवाल दर सवाल…

“आप” के लिये सवाल दर सवाल…

-दीपेश नेगी||

दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद से ही कांग्रेस और बीजेपी आम आदमी पार्टी की सरकार के लिए कई प्रकार की मुसीबतें खडी कर रहीं है. भले ही ये पार्टिया यह संदेश देना चाह रहीं होंगी कि आप के सारे विधायक और मंत्री पहली बार विधानसभा में आये हैं तथा इनकों विधायिका और कार्यपालिका के प्रोटोकॉल की जानकारी नहीं है. कांग्रेस और बीजेपी के विधायकों में इतनी नकारात्मकता भरी हुई है कि इनको अपना किया गया वादा भी याद नहीं रहा जो कि इन्होंने आप की सरकार बनाने के लिए दिये थे. जहा कांग्रेस ने बिना शर्त समर्थन दे कर और बीजेपी ने रचनात्मकता की बात की थी. इन दोनों पार्टियों को लगने लगा है कि यदि दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने जनता से किये वादे पूरे करने शुरू कर दिये तो इससे इनकी आज तक की गयी राजनीति की पोल ही खुलेगी वहीं इनका जनाधार भी दिनों दिन कमजोर होता जायेगा. यह तो सभी को पता हैं कि आप के सारे विधायक पहली बार हीं विधायक बने हैं जो कि आम आदमी ही है.  जाहिर है इन्हीं नये नवेले विधायकों में से ही बने हैं नये मंत्री तथा विधान सभा अध्यक्ष.aap

आप की सरकार ने कांग्रेस के बिना शर्त समर्थन पर जनमत के द्वारा प्राप्त समर्थन से सरकार बनाने से लेकर अब तक जो भी कार्यप्रणाली शुरू की है उससे इन पारंपरिक दलों की खोखली राजनीति सामने आने लगी हैं. अब इन दलों को अपने द्वारा बनायी गयी इसी खोखली जमीन को खोने का डर सताने लगा है. आप की सरकार आने से दिल्ली में ही नहीं बल्कि पूरे देश में सकारात्मकता की जो एक सिहरन सी पैदा की और जनता जनार्दन में लोकतंत्र के प्रति जो जोश दिखने लगा हैए वह जोश इन नेताओं के लिए खतरे की घंटी बनने लगा हैं.  आज तक जो जनता अपने को ठगा महसूस करती थी और जिसका विश्वास इन नेताओं और लोकतंत्र पर से उठने लगा था वह यकीनन आज वापस आने लगा है.

यहीं इन दलों के डर का कारण बनने लगा है. अन्यथा क्या बजह हो सकती है कि अपने आप को राजनीतिक पंडित मानने वाले नेता जहा बिहार में राबड़ी देवी को तो खुशी.खुशी मुख्यमंत्री मान कर उनकी अधीनता स्वीकार कर लेते है और उनको राजनीति का मर्मज्ञ और ज्ञानी मानने लगते हैं ! ये वहीं नेता ओैर दल है जिनको दिल्ली सरकार में किसी भी प्रकार से भारतीय राजस्व सेवा के पूर्व अधिकारीए जाने माने वकीलए पत्रकारों और विधि विशेषज्ञों को मुख्यमंत्री और मंत्री यहा तक कि विधायक बनना भी स्वीकार नहीं है.

श्रीमती राबड़ी देवी की मुख्यमंत्री की स्वीकार्यता क्या यह नहीं दर्शाती कि वह केवल पारंपरिक राजनीति की ही ध्वजवाहक थी एवह इन पार्टियों द्वारा इजाद की गयी लकीर को ही आगे बढा रही थी जबकि आप के नेता राजनीति की इसी परम्परा को समाप्त करना चाह रहे हैं जिसके कारण आज जनतंत्र मे आक्रोश है और इसमें जन तो कबका गायब हो चुका है बचा है तो केवल तंत्र.

प्रश्न पर प्रश्न क्या यह अति नहीं है. सर्वप्रथम इन नेताओं ने विधान सभा अध्यक्ष को ही घेरना शुरू किया जब किसी कांग्रेसी विधायक ने यह कहा कि उनके विधानसभा क्षेत्र में आाप के कार्यकर्ता दिल्ली सरकार के कर्मचारियों से काम करवा रहे है वह भी बिना उनकी जानकारी के तो अध्यक्ष ने यह कहा कि वह इस खबर की पुष्टि मुख्यमंत्री से करेगे तो इसी बात पर विधायक महोदय ने अध्यक्ष को ही घेर लिया कि विधानसभा में आप ही सर्वेसर्वा हो तो मुख्यमंत्री से क्या पूछोगे. विधानसभा अध्यक्ष का कहने का आशय यह था कि वह वस्तुस्थिति से मुख्यमंत्री को अवगत करेंगे तो उन्होंने क्या गलत कह दिया. वहीं दूसरी ओर समाज एव बाल विकास मंत्री राखी बिडला के कार का शीशा टूटने पर क्या बबाल मचाया गया. क्या यह साजिश नहीं थी. हद तो तब हो गयी जब कानून मंत्री को ही कानून के सचिव द्वारा ही कटघरे में खडा किया जा रहा हो. क्या यह सम्भव है कि एक वकील रहे मंत्री को यही न पता हो कि न्यायपालिका कार्यपालिका के अधीन नहीं होती. सर्वसामान्य भी यह समझ सकता है कि एक माना जाना वकील ऐसी बेतुकी बात नही कर सकता. इन नेताओं की आपको घेरने पर दिल्ली के शिक्षा मंत्री श्री मनीष सिसोदिया कह चुके है कि हमको भले हीं ऐसे प्रोटोकाल न आते हों परन्तु हम यहा जनता के काम करने आये है जो कि हमको करने है. क्या इससे स्पष्ट नहीं हो जाता कि इनकी नियति बडी साफ है.

मीडिया को भी देखों वह भी इन नेताओं की कठपुतली बना फिर रहा है. मीडिया भी कहा पीछे रहने वाला था चला मुख्यमंत्री से सवाल करने कि आप के खाप पंचायतों के बारे में क्या ख्यालात है घ् आप ये उन नेताओं से क्यों नहीं पूछते जो आजादी के बाद से इस लोकतंत्र के नुमायंदे बने हुए हैं. मीडिया के इस प्रश्न पर अरविन्द केजरीवाल ने क्या सही जवाब नहीं दिया कि आप इस संबन्ध में राहुल गाधी और नरेन्द्र मोदी से भी पूछिये. जहा इस लोकतंत्र को नेता रूपी इसके पहरेदारों ने ही लूटा काश लोकतंत्र का चैथा स्तम्भ ही इसकेा सम्भाल लिया होता तो शायद आम आदमी जैसी पार्टी की जरूरत भी नहीं पडती. अब जब आप की धमाके दार इन्ट्री हो गयी है और हमारे देश का लोक इस इन्ट्री को हाथों हाथ ले भी रहा है तो अब भी मीडिया इन नेताओं का ही साथ दे रहा है.

आखिर मेंरू आम आदमी पार्टी को कई क्षेत्रों में एक साथ संघर्ष करना पड रहा है जहा एक ओर उपरी स्तर पर तो यह टाग खिचाई चल ही रही है वही निचले स्तर पर भी कम संघर्ष नहीं चल रहा है जो कार्यकर्ता पार्टी बनने से लेकर दिल्ली चुनाव तक पार्टी का अलख जगाये हुऐ थे अब उनको बिल्कुल बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है क्यांेकि कांग्रेस और बीजेपी के कार्यकर्ता बडी संख्या में और कुशलतापूर्वक एकजुट होकर आप के पुराने कार्यकर्ताओं जो कि संख्या में कम थे उन्हें टारगैट कर रहे है और उनका साथ दे रहे है पार्टी के पुराने असंतुष्ट कार्यकर्ता जो केवल चमचागिरी के कारण ही आप में शामिल थे.

दौलत सिंह नेगी

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.