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राजनीतिक परिस्थितियों का तेजी से बदलना जारी…

By   /  January 9, 2014  /  No Comments

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-हरेश कुमार|| 

जब से दिल्ली में आम आदमी पार्टी या आआपा की सरकार बनी है और अरविंद केजरीवाल उसके मुख्यमंत्री बने हैं तभी से अगले लोकसभा चुनाव में देश भर में इस पार्टी के प्रभाव की चर्चा जोरों पर है. पिछले साल अन्ना हजारे के द्वारा दिल्ली के रामलीला मैंदान में जनलोकपाल को लागू करने के लिए किए जा रहे आमरण अनशन के बाद अरविंद केजरीवाल ने नवंबर के महीने में एक अलग राजनीतिक पार्टी आम आदमी पार्टी का ऐलान किया था.kejriwal (1)

केजरीवाल का मानना था कि राजनीतिक गंदगी को साफ करने के लिए आपको राजनीति में उतरना ही होगा. सिर्फ इल्जाम लगाने से कुछ नहीं होगा, आपको जमीनी धरातल पर भी काम करना होगा. हम सिर्फ स्थापित राजनीतिज्ञों और दलों को गाली देकर या उनके कार्यों में कमियां निकालकर ही अपने कर्तव्यों की इतिश्री नहीं कर सकते हैं. इसी के साथ ही अन्ना हजारे और केजरीवाल में मतभेद होने शुरू हो गए. कई बार तो ऐसा लगा कि यह मतभेद अब मनभेद का रूप ले चुका है. क्योंकि अन्ना हजारे के साथ अब केजरीवाल दूर-दूर तक नहीं दिख रहे हैं, ना ही उनकी जीत पर बेमन से खुशी जाहिर करने वाले अन्ना अरविंद केजरीवाल को पचा पा रहे हैं. पूरे देश की जनता ने देखा कि लोकपाल बिल को पारित कराने के लिए अन्ना हजारे ने जब अपने गांव रालेगण सिद्धि में फिर से अनशन शुरू किया तो दिल्ली की जीत से उत्साहित केजरीवाल ने अपने साथी गोपाल राय को वहां भेजा था. मंच पर अन्ना के साथ उपस्थित पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह ने जब कहा कि अन्ना के कुछ पूर्व साथियों ने राजनीतिक लाभ के लिए अन्ना के नाम का इस्तेमाल किया है तो गोपाल राय ने इसका तुरंत उठकर कड़ाई से प्रतिवाद किया जिस पर अन्ना हजारे ने कहा कि मैंने आपको हल्ला करने के लिए नहीं बुलाया है अगर हल्ला ही करना है तो आप गांव के बाहर जा सकते हैं. खैर, यह तो मात्र एक प्रतीक है कि अन्ना और केजरीवाल के बीच संबंधों में पहले जैसी मधुरता नहीं रही.

अब आते हैं हाल के दिनों में बदलाव पर.

सबसे पहले आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता और वकील प्रशांत भूषण के द्वारा कश्मीर में जनमत संग्रह पर दिए गए विवादित बयान पर जिस पर हो-हल्ला मचने के बाद आआपा ने भूषण के बयान को उनका निजी बयान बताते हुए उनसे पल्ला झाड़ लिया. हंगामा इतना बड़ा कि गाजियाबाद के कौशांबी स्थित ऑफिस में हिंदू रक्षा दल के कथित कार्यकर्ताओं ने तोड़फोड़ की और ऑफिस को काफी नुकसान पहुंचाया. इससे पहले भी कश्मीर पर इसी तरह के एक बयान को लेकर कुछ लोग प्रशांत भूषण की पिटाई कर चुके हैं. हमारा तो यही मानना है कि संवेदनशील मुद्दों पर बोलने से पहले देश की भावनाओं का निश्चित तौर पर ख्याल रखा जाना चाहिए. आजकल ऐसा देखने में आ रहा है कि लोग चर्चा में बने रहने के लिए कुछ भी बोल देते हैं और फिर पार्टियां उनका निजी विचार कहके खारिज कर देती हैं, लेकिन तब तक बहुत ज्यादा नुकसान हो चुका होता है. सामाजिक सरोकारों को देखते हुए हम सबको इन सबसे बचना चाहिए. हमें सामाजिक समरसता और देश की सुरक्षा और संविधान को देखते हुए फूंक-फूंक कर अपने कदम रखने चाहिए. किसी से बातचीत में कोई नुकसान नहीं है, जब दुनिया के सबसे अशांत माने जाने वाले देश फिलिस्तीन और इस्राइल के बीच में बातचीत हो सकती है तो फिर हम अपने पड़ोसी देश से बात क्यों नहीं कर सकते लेकिन यहां सवाल पड़ोसी की नीयत का है. उसकी नीयत में सदैव ही खोट रहा है. आजादी के समय से ही हम सबने देखा है कि किस तरह से वह कश्मीर को हड़पने के लिए कूटनीतिक और आतंकी गतिविधियों के साथ-साथ सैन्य आक्रमण से पीछे नहीं रहा है, हालांकि हर समय उसे मात ही खानी पड़ी है. इस देश में ऐसे नेता, पत्रकार और नौकरशाहों की कमी नहीं है जो पड़ोसी देश से सहानुभूति रखते हैं, इसकी सच्ची वजह वही बता सकते हैं. पूरे विश्व में कहीं भी कोई घटना घट जाये ये तुंरत प्रतिक्रिया दे देते हैं लेकिन पड़ोसी देश बांग्लादेश, पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिंदुओं पर अत्याचार होने पर इनकी तरफ से कभी कोई प्रतिक्रिया नहीं आती है, शायद फिर इनके धर्मनिरपेक्षता पर सवाल उठने का खतरा पैदा होने का डर इन्हें सताता होगा या वोट बैंक के बिखरने/खोने का डर. ये तो यही जाने.

हाल के दिनों में देश की राजधानी दिल्ली सहित कई राज्यों में कई घटनाओं ने लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचने में सफलता पाई है. इनमें कुछ प्रमुख है – कांग्रेस उपाध्यक्ष, राहुल गांधी की छवि सुधारने के लिए जापानी जनसंपर्क कंपनी को 500 करोड़ रुपये का ठेका, इस पर इतना बबाल मचा जैसे कि पहली बार किसी कंपनी को किसी राजनीतिक दल ने इस तरह की सेवा के लिए ठेका दिया हो. दूसरा प्रशांत भूषण का कश्मीर में जनमत संग्रह का विवादित बयान जिसे पार्टी ने उनका निजी विचार करार दिया.तीसरा – यूपी यानि देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश या उल्टा प्रदेश जो कह लीजिये के मुख्यमंत्री के गांव सैफई में रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन.saifai1

यह वही राज्य है जहां कुछ समय पहले दंगा हुआ है और हजारों लोग घर से बेघर हुए हैं. क्या बिडंबना है कि तुष्टीकरण की राजनीति करने वाले हमारे नेताजी ने इस क्षेत्र का दौरा करने की जरूरत ही नहीं समझी और सारा ठीकरा मीडिया और विपक्षी दलों पर फोड़ दिया. इसी बीच, मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का साइकिल रेस भी कम चर्चा में नहीं रहा. मर्सिडीज कंपनी द्वारा निर्मित लगभग छह लाख रुपये की इस साइकिल पर सवार होकर मुख्यमंत्री समाजवाद का नया नारा (अपने कुनबे का विकास) देने सड़कों पर जब निकले तो लोग-बाग यह देखकर हैरान थे कि यह साइकिल अपने साथ चल रही मोटरसाइकिल के साथ रेस लगा रही थी, इस साइकिल में छह गियर है और प्रत्येक गियर बदलने के साथ ही स्पीड में बढ़ोतरी होती जाती है. 40 से 50 किलोमीटर की स्पीड वाली यह साइकिल किस तरह से आने वाले लोकसभा चुनाव में समाजवाद का झंडा बुलंद रखने में योगदान देती है यह तो आने वाला वक्त ही बतायेगा. एक और खबर इसी प्रदेश से आई और वो है 9 मंत्री औऱ विपक्ष के विधायकों सहित विदेश दौरे पर अध्ययन के लिए जाने की खबर. प्रांत में कानून-व्यवस्था की स्थिति तो बद से बदतर होती जा रही है और ये हैं कि विदेश दौरे पर जा रहे हैं. खैर, ऐसा करने वाले सिर्फ इसी प्रदेश के नेता नहीं हैं, कांग्रेस शासित कर्नाटक के विधायक भी अभी विदेश दौरे से लौटे हैं और हवाईअड्डे पर पत्रकारों के जवाब से बचते हुए निकल गए घर को.

ऐसे में दो पुरानी कहावत याद आती हैं. – जब रोम जल रहा था तो नीरो बंसी बजा रहा था और घर में नहीं दाने अम्मा चली भुनाने. एक तरफ देश भर में किसान फसल की सही कीमत नहीं मिलने से त्राहि-त्राहि कर रहे हैं तो दूसरी तरफ लोग महंगाई और बेरोजगारी से परेशान हैं और नेताजी मौजमस्ती में मशगूल. बिहार में अगले लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस फिर से लालू यादव के साथ गलबहियां करने की तैयारी में, लोजपा परेशान तो जेडीयू हैरान. आखिर जायें तो जायें कहां. सबने देखा है किस तरह से बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की तैयारी हो रही थी जिसे फिर से ठंडे बस्ते में डाल दिया गया. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के राज में कानून-व्यवस्था की स्थिति का हाल किसी से छुपा नहीं है. यहां तक कि बलात्कार जैसे केस में भी वो राजनीति करती रही हैं तो सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज, एके गांगुली का एक लॉ इंटर्न के द्वारा यौन उत्पीड़न का आरोप लगाये जाने के बाद पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा. फिर आज ही महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष, राज ठाकरे के द्वारा दिया गया बयान – मोदी को गुजरात के सीएम के पद से इस्तीफा दे देना चाहिए, ने राजनीतिक हलचल मचा दी है. यह सब लोकसभा चुनाव में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए किया जा रहा प्रयास है.

अंत में –

आने वाले लोकसभा चुनाव में संभावनाओं को भांपते हुए नौकरशाह, थैलीशाह और उद्योगपतियों के साथ-साथ कथित तौर पर पत्रकार विभिन्न दलों में शामिल हो रहे हैं. इसमें आम आदमी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने वालों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हुई है. हाल के दिनों में कांग्रेस में शामिल होने वालों की चर्चा कम ही सुनने को मिली है. आज ही आईबीएन7 के मैनेजिंग एडिटर, आशुतोष ने अपने पद से इस्तीफा देकर आम आदमी पार्टी ज्वाइन कर लिया है, हालांकि इसे लेकर भी चूहे-बिल्ली का खेल खेला गया. पहले तो कुमार विश्वास ने ट्वीट किया फिर तुरंत डिलीट कर दिया, लेकिन लोगों तक इसकी खबर पहुंच चुकी थी. मल्लिका साराभाई का नाम भी आम आदमी पार्टी में शामिल होने वालों में चर्चा में है. वैसे इस सूची में कई नाम है.

सोचने वाली बात यह है कि जिस तरह से मोटी-मोटी तनख्वाह छोड़कर लोग आम आदमी पार्टी में शामिल हो रहे हैं तो क्या आने वाले समय में यह पार्टी आम आदमी पार्टी रहेगी या यह भी सत्ता प्राप्त करने के लिए हर तरह के जोड़-तोड़ करेगी. फिर इसमें और दूसरी पार्टियों में फर्क क्या रह जायेगा. देश की जनता इस पूरे घटनाक्रम पर नजर रखे हुए है.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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