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महिषासुर: पुनर्पाठ की क्यों जरुरत है..

By   /  January 10, 2014  /  No Comments

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-राजकुमार राकेश||

‘बलिजन कल्चरल मूवमेंट के तत्वाधान में प्रकाशित पुस्तिका ‘‘किसकी पूजा कर रहे हैं बहुजन? महिषासुर: एक पुनर्पाठ‘‘ मेरे सामने है. तकरीबन चालीस पृष्ठों की इस सामग्री को मैने दो-ढाई घंटे के अंतराल में पढ़ लिया. मगर इस छोटे से अंतराल ने मेरे भीतर जमे अनगिनत टीलों को दरका दिया है. फारवर्ड प्रेस के प्रबंध संपादक प्रमोद रंजन द्वारा संपादित इस पुस्तिका को 17 अक्टूबर, 2013 को दिल्ली के दिल्ली की ख्यात जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में ‘बैकवर्ड स्टूडेंटस फोरम’ द्वारा आयोजित ‘महिषासुर शहादत दिवस‘ पर जारी किया गया था. पुस्तिका में प्रेमकुमार मणि, अश्विनी कुमार पंकज, इंडिया टुडे (हिंदी) के प्रबंध संपादक दिलीप मंडल समेत 7 प्रमुख लेखकों, पत्रकारों व शोधार्थियों के लेख हैं.Cover Page of Booklet_Jpg

जिस दिन मैंने इस पुस्तिका को पढ़ा, उसी दिन शाम को टी.वी. के एक चैनल पर दिल दहला देने वाला एक दृश्य था. उत्तरी कोरिया के तानाशाह किम जोंग ऊन ने अपने फूफा और उसके छह साथियों को तीन दिन से भूखे रखे गए एक सौ बीस शिकारी कुत्तों को परोस दिया. तकरीबन एक घंटे में इन कुत्तों ने उन जिंदा मानवीय शरीरों को फाड़कर चट कर डाला. इस विशाल पिंजरे के चारों ओर की बालकनियों में खड़े दर्शक इस दौरान तालियां बजाते रहे. उनमें खुद किम जोंग ऊन भी मौजूद था. ऐसा ही एक दृश्य सद्दाम हुसैन को अमेरिका द्वारा फांसी दिए जाने का था. इन विजेताओं ने मारे जाने वालों को बर्बर, क्रूर, विद्रोही, अमानवीय घोषित किया था. यह हारे हुए लोगों के प्रति विजेता न्याय है.

यही कुछ महिषासुर के साथ किया गया था. सदियों से उसकी ऐसी अमानवीय छवियां गढी गईं हैं, जो विश्वासघात से की गई उस शासक की मौत को जायज ठहराने का काम करती रही हैं. हमलावर आर्यों, जो इंद्र के नेतृत्व में बंग प्रदेश को कब्जाने के लिए यहां के मूल निवासी अनार्यों से बार-बार हारते चले गए थे, उन्होंने अंततः विष्णु के हस्तक्षेप से दुर्गा को भेजकर महिषासुर को मरवा डाला था. आर्यों (सुरापान करने वाले और पालतू पशुओं को अपने यज्ञों के नाम पर वध करके उनके मांस को खा जाने वाले सुरों) ने खुद को देवता घोषित कर दिया और बंग प्रदेश के मूल निवासियों को असुर. महिषासुर इन्हीं असुरों (अनार्यों) का बलशाली और न्यायप्रिय राजा था. ये आर्य इन अनार्यों के जंगल, जमीन की भू संपदा और वनस्पति को लूट लिए जाने और अनार्यों के दुधारु जानवरों को हवन में आहुत कर देने के लिए कुख्यात थे. महिषासुर और उनकी अनार्य प्रजा ने आर्यों के इन कुकर्मों को रोकने के लिए इंद्र की सेना को इतनी बार परास्त कर डाला कि उसकी रीढ़ ही ध्वस्त हो गई. ऐसे में इंद्र ने विष्णु से हस्तक्षेप करवाकर एक रुपसी दुर्गा को महिषासुर को मार डालने का जिम्मा सौंपा. जब दुर्गा पूरे नौ दिन और नौ रातों तक उस महल में मौजूद थी, तो सुरों का टोला उसके गिर्द के जंगलों में भूखा प्यासा छिपा बैठा, दुर्गा के वापस आने का इंतजार कर रहा था. आखिर इतने अर्से में दुर्गा ने छलबल से महिषासुर का कत्ल कर दिया.

इस पाठ की पुष्टि बंगाल में की जाने वाली नवरात्रि दुर्गा पूजा और नौ दिनों तक व्रत कर भूखे रहने के आधुनिक पाठों से होती है. हालांकि इन विजेताओं ने दुर्गा के लिए पशुबलि का प्रावधान रखा है. तर्क दिया जाता है कि यह पशुबलि दुर्गा के वाहन शेर के लिए है. बाकी वे खुद को शाकाहारी घोषित करते हैं ताकि असुरों को मांसाहारी सिद्ध करने का तर्क उनके पास मौजूद रहे.

बहुत हद तक प्रस्तुत पुस्तिका में महिषासुर दुर्गा के इसी पुनर्पाठ की प्रस्तुति है, मगर इस पर अधिकाधिक व्यापक शोध की जरुरत है, जिसके चलते बहुत से छिपे सत्य उद्घाटित होने की संभावना बनती है, जिन्हें नकारा जाना आज के आर्यपुत्रों के लिए मुमकिन नहीं रहेगा.

फिलहाल मैं  धर्मग्रंथों की बिक्री की एक दुकान से ‘दुर्गा सप्तशती‘ नामक पुस्तक लाया हूं. यह रणधीर बुक सेल्स (प्रकाशन) हरिद्वार से प्रकाशित है. इस में मौजूद पाठ हालांकि सुरों के पक्ष में लिखा गया है, मगर यह महिषासुर वध के छल छद्म  और सुरों के चरित्र पर बहुत कुछ कह जाता है  – ‘‘प्राचीन काल के देवी-देवता तथा दैत्यों में पूरे सौ बरस युद्ध होता रहा. उस समय दैत्यों का स्वामी महिषासुर और देवताओं का राजा इंद्र था. उस संग्राम में देवताओं की सेना दैत्यों से हार गई. तब सभी देवताओं को जीतकर महिषासुर इंद्र बन बैठा. हार कर सभी देवता ब्रह्माजी को अग्रणी बनाकर वहां गए जहां विष्णु और शंकर विराज रहे थे. वहां पर देवताओं ने महिषासुर के सभी उपद्रव एवं अपने पराभव का पूरा-पूरा वृतांत कह सुनाया. उन्होंने कहा, महिषासुर ने तो सूर्य, अग्नि, पवन, चंद्रमा, यम और वरुण और इसी प्रकार अन्य सभी देवताओं का अधिकार छीन लिया है. स्वयं ही सबका अधिष्ठाता बन बैठा है. उसने देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया. महिषासुर महा दुरात्मा है. देवता पृथ्वी पर मृत्यों की भांति विचर रहे हैं. उसके बध का कोई उपाय कीजिए. इस प्रकार मधुसूदन और महादेव जी ने देवताओं को वचन सुने, क्रोध से उनकी भौंहे तन गईं.‘‘ इसके बाद उन्होंने दुर्गा को महिषासुर का वध करने को भेजा. जब युद्ध चल रहा थो तो ‘‘देवी जी ने अपने बाणों के समूह से महिषासुर के फेंके हुए पर्वतों को चूर-चूर कर दिया. तब सुरापान के मद के कारण लाल-लाल नेत्रवाली चण्डिका जी ने कुछ अस्त-व्यस्त शब्दों में कहा – हे मूढ़! जब तक कि मैं मधुपान कर लूं, तब तक तू भी क्षण भर के लिए गरज ले. मेरे द्वारा संग्रामभूमि में तेरा वध हो जाने पर तो शीघ्र ही देवता भी गर्जने लगेंगे.‘‘ इस धमकी के बावजूद उस दैत्य ने युद्ध करना नहीं छोड़ा. तब देवीजी ने अपनी तेज तलवार से उसका सिर काटकर नीचे गिरा दिया….देवता अत्यंत प्रसन्न हुए. दिव्य महर्षियों के साथ देवता लोगों ने स्तुतियां की. गंधर्व गायन करने लगे. अप्सराएं नाचने लगीं. बहरहाल, इस कथा में देवी का ‘सुरापान‘ स्वयं अनेक अनुमानों को जन्म देता है!

उपरोक्त तथ्य कुछ ऐसे अंतर्निहित पाठों की सृष्टि करते हैं, जो महज एक छोटे से आलेख में नहीं निपटाए जा सकते. इसके लिए व्यापक शोध की जरुरत है. अगर इनके अर्थ संकेतों पर गौर किया जाए, तो असल में ये आज की भारतीय राजनीति का भी बहुत गंभीर पाठ प्रस्तुत करते हैं. इंद्र अगर प्रधानमंत्री था, तो ये विष्णु, शिव वगैरह  कौन हैं, जिनके सामने गंधर्व गाते हैं और अप्सराएं नाचती हैं. पिछड़ा, दलित, औरत, वंचित लोगों के इस व्यापक अर्थपाठ के बीच जो ये नक्सलवाद के नाम पर आदिवासियों को उनके जंगल जमीन से हांका जा रहा है – इसके अध्ययन और पुनर्पाठ की प्रस्तुति से कितना कुछ सामने आएगा, यह कोई कल्पना से परे की चीज नहीं है. अब तो पश्चिम पार से आने वाले आर्यों को सेना की जरुरत भी नहीं है. उनकी पूंजी ही अनार्यों को खदेड़ देने के लिए काफी है और अपने देश के शासक उस पूंजी के गुलाम बने हैं ही.

फिलहाल, मै कहना चाहता हूं कि रणेन्द्र के चर्चित उपन्यास ‘ग्लोबल गांव के देवता‘ मे वर्णित आदिवासियों, खासकर असुर जनजाति की त्रासदी को भी इन्हीं परिप्रेक्ष्यों में पढ़कर व्यापक शोध में शामिल करने को कोई पिछड़ा-दलित विद्वान या विदुषी आए. महिषासुर ललकार रहा है.

पुस्तिका : किसकी पूजा कर रहे हैं बहुजन? (महिषासुर: एक पुनर्पाठ)

संपादक :  प्रमोद रंजन

प्रकाशक :  बलिजन कल्चरल मूवमेंट, दिल्ली

मूल्य  :  30 रुपए

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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