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ऑपरेशन ब्लू स्टार में ब्रिटेन ने की थी मदद…

भारत में साल 1984 में हुए ऑपरेशन ब्लू स्टार के बारे में कथित तौर पर कुछ नए दस्तावेज सामने आए हैं जिनसे इस ऑपरेशन में ब्रिटेन की भूमिका को लेकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं.operation blue star

ब्रिटेन सरकार के इन कथित दस्तावेज़ों के मुताबिक अमृतसर के स्वर्ण मंदिर पर हुई भारतीय सेना की कार्रवाई में ब्रितानी स्पेशल एयर सर्विस (एसएएस) ने मदद की थी. ब्रिटेन की तत्कालीन प्रधानमंत्री मारग्रेट थैचर के निर्देश के बाद ऐसा हुआ था. हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि यह मदद किस तरह पहुँचाई गई.

ब्रिटेन की लेबर पार्टी के सांसद टॉम वाटसन का दावा है कि उन्होंने इन पूरे दस्तावेजों को देखा है. उनके मुताबिक ये दस्तावेज उस वक्त की सरकार की भूमिका पर कई सवाल खड़े करते हैं.

उन्होंने बीबीसी के एशियन नेटवर्क के संवाददाता चेतन पाठक से कहा, “मैं काफी अचरज में हूं. हम उस अभियान में शामिल रहे जिसमें कई लोगों की मौत हुई और इसके बाद राजनीतिक तनाव पैदा हुआ. यह जानकर मैं काफी परेशान और आहत महसूस कर रहा हूं.”

लेबर पार्टी के सांसद टॉम वाटसन का दावा है कि उन्होंने इन दस्तावेज को देखा है.
उन्होंने कहा, “ब्रितानी सिख और दुनिया भर में मौजूद मानवाधिकार के हिमायती लोग यह जानना चाहते हैं कि इस मामले में ब्रिटेन की संलिप्तता कहां तक थी. हमें उम्मीद है कि ब्रितानी विदेश मंत्री इन सवालों के जवाब देंगे.”

टॉम वाटसन ने दावा किया है कि इस खुलासे से ब्रितानी ही नहीं दुनिया भर के सिख प्रभावित हो सकते हैं.

documents_on_operation_blue_star_by_tom_watsonवाटसन ने कहा, “सिख समुदाय इससे आहत होगा. इस दस्तावेज के महज 30 साल पूरे नहीं हुए हैं, बल्कि इसी साल सिख ऑपरेशन ब्लू स्टार की 30वीं वर्षगांठ में मारे गए अपने परिजनों को याद भी कर रहे हैं.”

जून, 1984 में भारतीय सेना ने चरमपंथियों पर काबू पाने के उद्देश्य से क्लिक करें स्वर्क्लिक करें ण मंदिर परिसर में ऑपरेशन ब्लू स्टार के नाम से सैन्य कार्रवाई की थी.

भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक इस कार्रवाई में 400 लोगों की मौत हुई थी. जबकि सिख समुदाय के मुताबिक कार्रवाई के दौरान हज़ारों लोगों की मौत हुई थी.

ऑपरेशन ब्लू स्टार के कुछ ही दिनों के बाद भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या उनके सिख अंगरक्षकों ने कर दी थी.

इसके बाद दिल्ली में सिख विरोधी दंगे भड़क गए थे, जिसमें कम से कम तीन हज़ार लोग मारे गए थे.

(बीबीसी)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.