/सीएम उर्फ हेल्पलाइन…

सीएम उर्फ हेल्पलाइन…

-आलोक पुराणिक||

मुख्यमंत्रियों की किसी कांफ्रेंस का सीन दिखायी पड़ रहा है-
जी मेरे यहां पचास हेल्पलाइन हैं.Alok Puranik
जी मेरे यहां तो पचास हेल्पलाइन मंत्री हैं. हमारी स्टेट में चीफ मिनिस्टर को चीफ हेल्पलाइन कहा जाता है, इन शार्ट एचएल.
हमारे यहां थानों की जगह वड्डी-वड्डी हेल्पलाइनें लगा दी हैं, बंदा वहां जाता है, कंपलेंट बोलकर चला आता है. सरकार का खर्च कम हो गया है, चोर-उठाईगीर तो पहले भी ना पकड़े जाते थे, अब भी ना पकड़े जाते, पर ये है कि थानों पर खर्च होनेवाली रकम बच रही है.

वाऊ, हेल्प तो तब मिले, जब लाइन मिले, मैंने अपनी स्टेट में ऐसा जुगाड़ करवा दिया है कि किसी भी हेल्पलाइन पे नंबर मिला लो, लाइन ही नहीं मिलती.
मैंने अपनी स्टेट में ये जुगाड़ करवा दिया है, देखो-

जी सीएम हेल्पलाइन का नमस्कार. एक नंबर दबायें अगर आप नाराज विधायक हैं. दो नंबर दबायें अगर अर्ध-नाराज विधायक हैं. तीन नंबर दबायें अगर नाराज पब्लिक हैं.
मैं नाराज पब्लिक हूं, तीन नंबर दबा दिया है मैंने. महात्मा गांधी मार्ग पर मेरी चेन लुट गयी, छेड़ाखानी हुई.

जी एक नंबर दबायें अगर आपकी चेन मोटरसाइकिल वाले ने लूटी. दो नंबर दबायें अगर चेन स्कूटरवाले ने लूटी. तीन नंबर दबायें अगर पैदल चलनेवाला ही आपकी चेन लूटकर चला गया.
एक दबाया, मोटरसाइकिलवाला लूट गया.

जी एक नंबर दबायें अगर आपकी चेन को पल्सरवाला लूट गया, दो नंबर, अगर आपकी चेन को बुल्लेटवाले ने लूटी. तीन नंबर, अगर आपकी चेन को होंडा बाइकवाला लूट गया.
एक दबाया, पल्सरवाले ने लूटा.

प्लीज एक दबायें अगर पल्सर का रंग ब्लैक था, दो दबायें अगर कलर सिल्वर था और तीन दबायें अगर एकदम जैड ब्लैक था.
उफ्फ तीन दबाया, ब्लैक था. आप कुछ हेल्प भी करेंगे.

प्लीज सुनें इस संबंध में आपकी पूरी मदद की जायेगी. मैं सीएम हेल्पलाइन की तरफ से बताना चाहूंगा कि हमारे राज्य में पुलिस वगैरह के मसले चीफ मिनिस्टर के अंडर में नहीं आते. ये केंद्रीय गृह-मंत्रालय के अंडर में आते हैं, उनकी हेल्पलाइन का नंबर हमें नहीं पता.
कमाल है, आपके हाथ में जब है ही नहीं कुछ, तो इतना मगमजारी क्यों की.

प्लीज समझिये, हेल्पलाइन देना हमारे हाथ में है, हेल्प देना नहीं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.