/बिहार टीईटी : योग्यता की बेकदरी हो रही जग-जाहिर…

बिहार टीईटी : योग्यता की बेकदरी हो रही जग-जाहिर…

-मिथिलेश कुमार राय||
बिहार सरकार और उनके शिक्षा विभाग की लापरवाही के कारण इन दिनोँ सूबे के 90 हजार युवा हताशा के शिकार हो रहे हैँ. राज्य के 25 से 35 वर्ष के ये नौजवान वर्ष 2011 मेँ आयोजित बीटीईटी मेँ सम्मिलित हुए थे और शिक्षक बनने की पात्रता हासिल की थी. बता देँ कि तीन वर्ष पूर्व राज्य मेँ आरटीई के नियमोँ के तहत छात्र-शिक्षक अनुपात को दुरुस्त करने के उद्देश्य से टीईटी का आयोजन किया गया था. बिहार टीईटी ने तब एक कीर्तिमान ही स्थापित किया था जब एक लाख 68 हजार शिक्षक पद के लिए ली गयी पात्रता परीक्षा मेँ लगभग 28 लाख अभ्यर्थी शामिल हुए. जिसमेँ से मात्र सवा लाख अभ्यर्थी को ही शिक्षक बनने के योग्य पाया गया.Bihar TET
अब हैरत की बात यह है कि पद से बहुत कम अभ्यर्थियोँ के रहने के बावजूद दो वर्ष मेँ मात्र 41 हजार अभ्यर्थियोँ का नियोजन ही संभव हो पाया है. जो नियमोँ मेँ शिथिलता और विभाग की लापरवाही को जग-जाहिर कर रहा है. यह जानना दिलचस्प होगा कि जिस काम को राज्य अथवा जिला स्तर पर समिति बनाकर कम समय मेँ अंजाम दिया जा सकता था उसके लिए सभी प्रखंड व पंचायत को एक स्वतंत्र नियोजन इकाई मेँ तब्दील कर दिया गया. इस तरह पूरे सूबे मेँ नौ हजार नियोजन इकाई बन गये. जिसका संचालन पंचायत सचिव,मुखिया,बीडीओ व प्रमुख के हाथोँ रहा.
इधर अभ्यर्थी अपनी नौकरी कन्फर्म करने के लिए पचास-पचास नियोजन इकाई मेँ आवेदन डालने के लिए दौड़-भाग करने लगे. परिणाम यह हुआ कि कुछ उच्च अंक वाले एक-एक अभ्यर्थी को तीस-तीस नियोजन-पत्र मिल गये. जबकि अधिकतर अभ्यर्थी एक भी नियोजन-पत्र के लिए तरसते रह गये. साथ ही धांधली की शिकायतेँ भी उठने लगी.
नौकरी मेँ जाने से बच गये लगभग 90 हजार अभ्यर्थी बीते दो वर्षो से सरकार की ओर आस लगाए बैठे-बैठे अब अपनी मांगोँ के समर्थन मेँ अनशन पर बैठने लगे हैँ. लेकिन सरकार उनके भविष्य का ताला खोलने के बजाय हरेक बार उन्हेँ आश्वासन का झूनझूना थमा देती है. जिससे अभ्यर्थियोँ के आक्रोश मेँ दिनोँ-दिन इजाफा देखने को मिल रहा है. बीते दिनोँ सुपौल मेँ चार दिनोँ तक अनशन पर बैठे दर्जनोँ अभ्यर्थियोँ ने आत्मदाह की चेतावनी तक दे दी थी. इस मामले मेँ अभ्यर्थियोँ को विपक्ष और मीडिया की चुप्पी भी अखर रही है. उन्हेँ लग रहा है कि सूबे के युवाओँ की सुधि लेनेवाला कोई नहीँ है.
मामले मेँ सबसे दिलचस्प बात यह है कि सरकार के इस उदासीन रवैये से जहां आरटीई (शिक्षक-छात्र अनुपात) के नियम का उल्लंघन हो रहा है वहीँ पर्याप्त सीट व योग्य अभ्यर्थियोँ के रहते बहाली नहीँ किये जाने से हजारोँ युवाओँ के मानसिक शोषण से ऊपजे आक्रोश का ठीकरा भी सरकार के ही सिर फूट रहा है. जबकि इस बाबत स्वयं सीएम नीतीश कुमार द्वारा शिक्षा विभाग व ग्रामीण विकास विभाग के मंत्री व अधिकारियोँ की बैठक बुलाकर स्पष्ट निर्देश दिया जा चुका है. सीएम का निर्देश था कि चाहे नियमावली मेँ बदलाव ही क्योँ न करना पड़े,अतिशीघ्र योग्य अभ्यर्थियोँ का नियोजन बचे हुए सीटोँ पर कर दिया जाना चाहिए. बावजूद इसके विभाग महीनोँ से नियमावली मेँ बदलाव के बहाने हताश अभ्यर्थियोँ को अपना सिर धुनते हुए देखे जा रहा है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.