/और कितने बिन्नी…

और कितने बिन्नी…

-दीपेश नेगी||

आम आदमी पार्टी के असंतुष्ट विधायक श्री विनोद कुमार बिन्नी ने कल अपनी प्रैस कॉन्फ्रेंस में यों तो आप पर अक्षमता के अनेक आरोप लगाये. ये वही आरोप हैं जो कि बी जे पी के नेता आप की सरकार पर लगातार लगा रहे हैं. लेकिन यह विचारणीय प्रश्न है कि बिन्नी के द्वारा सरकार को ब्लैकमेल करने की यह दूसरी घटना रटे रटाये तोते की भाति ही था जो शायद बी जे पी से ट्रेनिंग प्राप्त करके आया था. यहाँ यह एक बाजिब प्रश्न तो है ही कि क्यों बिन्नी जैसे लोगों का व्यवहार अचानक से ऐसा हो जाता है अथवा यह पहले से ही एक सोची समझी रणनीति के तहत होता है. ऐसे में जबकि बिन्नी पार्टी के एक वरिष्ठ सदस्य तो थे ही और वह आम आदमी पार्टी की हर उस छोटी बडी कार्यवाही का हिस्सा रहे थे तथा  उससे भी बढ़ कर आम आदमी पार्टी में केवल वहीं थे जो कि राजनीति में पहले से ही सक्रिय थे. बिन्नी दिल्ली के वार्ड संख्या 214 कोण्डली से दिल्ली नगर निगम के दूसरी बार निर्दलीय पार्षद चुने गये थे .kejriwal_4

बिन्नी आम आदमी पार्टी में पार्टी की विचार धारा से प्रभावित थे अथवा पद की लालसा से जुडे ये तो वही बेहतर जानते होगे लेकिन बिन्नी के रूप में आम आदमी पार्टी को दिल्ली में अपना पहला पार्षद मिला था और अरविन्द केजरीवाल को मिला एक मौका, जिससे वह अपनी स्वलिखित किताब स्वराज पर प्रयोग कर सकते थे. इस अवसर को गवाये बिना केजरीवाल ने बिन्नी के वार्ड 214 कोण्डली मे यह प्रयोग किया. स्वराज के तहत एक विशेष दिन का चयन करके वार्ड के लोगों को एक दिन पहले ही बता दिया गया कि फला चौपाल पर मोहल्ला सभा का आयोजन होने जा रहा है और आप लोग वहा पहुच कर अपने गली मोहल्लों की समस्यायें ले कर आये. मोहल्ला सभा के आयोजन पर स्वयं बिन्नी अपने इस प्रयोग पर केजरीवाल की हर उस जन सभा में जनता केा बताते थे कि जब पहली बार मोहल्ला सभा आयोजित हुई तो उन्होंने सोचा कि मेरे पास तो 50 लाख रूपये है अगर जनता ने खर्चे अधिक बता दिये तो क्या होगा.

यह सोचकर वह परेशान थे. इसी कडी को आगे बढाते हुऐ बिन्नी बताते थे कि जब जनता ने अपनी जरूरते बतायी तो वह हैरान रह गये कि जनप्रतिनिधि बिना जनता से पूछे लाखो करोडों के खर्चे कर देते है जबकि यदि जनता से पूछ कर काम किया जाय तो बडी आसानी से 8-10 लाख रूपये के खर्च से ही जनता के पूरे कार्य हो रहे थे साथ ही जनता भी खुश थी कि उनसे पूछ कर काम हो रहा है.

एक सामान्य इन्सान भी इस बात को भली भाति समझ सकता है कि 18 दिन पुरानी सरकार ने दिल्ली की जनता के हित में और आम जनता को महगायी की मार से बचाने के लिए इतने त्वरित कार्य किये हैं कि जो कांग्रेस की 15 साल पुरानी सरकार भी नहीं कर पायी थी तथा विपक्ष में रहते हुए बी जे पी कांग्रेस से करवा भी नहीं पायी थी.

एक बात तो साफ है कि अधिक नही तो कम से कम 75 से 90 प्रतिशत लोग जो कि किसी राजनीतिक दल में शामिल हो रहे हों वह किसी न किसी महत्वाकांक्षा के कारण हीं इनसे जुडता है. हाँ, यह दूसरी बात है कि अति महत्वाकांक्षा के कारण वह अपना तो नुकसान कर ही रहा है साथ ही उस पार्टी का भी कुछ न र्कुछ तो नुकसान अवश्य कर गया होता है यह एक विचारणीय प्रश्न तो अवश्य है कि इस अति महत्वाकांक्षा के लिए क्या बिन्नी जैसा व्यवहार करना आवश्यक है? ऐसे में जबकि वह एक वरिष्ठ कार्यकर्ता रहे हों और हर फैसले में उनकी रजामंदी रही होगी ऐसे में वह कभी मंत्री पद के लोभ में तो कभी लोकसभा सीट की उम्मीदवारी के लिए किसी भी प्रतिद्वन्दी दल का मोहरा बनने को कैसे तत्पर हो जाते हैं.

हमारे देश में चाटूकारों की खूब चलती आयी है और आगे भी चलेगी. विनोद कुमार बिन्नी भी चाटूकारी का प्रयोग यदा कदा करते रहते थे. आम आदमी पार्टी के हमेशा से कुछ नियम बडे प्रशंसनीय रहे है जैसे कि कभी भी किसी नेता की जय नहीं बोलना है या फिर किसी भी नेता के चरण स्पर्श नहीं करने है. परन्तु  एक जनसभा मं जनता के सामने बिन्नी ने जनता से कहा कि मैं जब भी अरविन्द जी के पैर छूने का प्रयास करता हू तो यह भाग जाते है. इसलिए मे आज भरी सभा में अरविन्द जी के पैर छूना चाहता हू अरविन्द केजरीवाल के मना करने के बावजूद बिन्नी ने उनके चरण स्पर्श किये. इस प्रकार की चाटुकारिता अरविन्द केजरीवाल सहित कुछ लोगों को शायद बुरी लग सकती है लेकिन अधिकतर लोग इस का आनन्द लेते हुए भी देखे जा सकते है.

आज पार्टी में उन्ही लोगों की तूती बोल रही है जिनमें यह गुण तो है ही और साथ ही उनके पास आय के स्रोत भी है. क्या अब आप में ऐसे लोगो का बोल बाला अधिक हो चुका है जो नये नवेले विधायकों के आगे पीछे घूम कर केवल मीडिया के सामने उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं साथ ही पुराने कार्यकर्ताओं को नाकाबिल और अयोग्य घोषित कर रहे हैं. इन लोगो के पास आय के अन्य स्रोत होने के कारण ये लोग जमीनी स्तर पर कार्य करने में अपनी तौहीन समझते है. इस कारण वे पुराने कार्यकर्ता जो कि दिन भर अपनी रोजी रोटी के लिए कार्य करते थे और सुबह. शाम तथा छुटटी के पूरे दिन अपने परिवार को छोडकर  घर. घर जाकर अलख जगा रहा था जिसके कारण कई परिवारों में बिछोह की स्थिति पैदा हो गयी थी हर कार्यकर्ता के घर में झगडा हुआ करता था इस कारण कार्यकर्ता मरहम लगाने के लिए समूह में उस कार्यकर्ता के घर जा कर परिवार के लोगों को समझाया करते थे. आज वह पुराना कार्यकर्ता अपने आपको उपेक्षित महसूस कर रहा है. क्या आम आदमी पार्टी उन पुराने कार्यकर्ताओं के दर्द को कम करने की कोशिश करेगी अथवा नये कार्यकर्ताओं चाटुकारों के भरोसे रहकर और बिन्नी बनाते रहेगी.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.