/भ्रष्टाचार के खिलाफ़ अभियान मगर सीएम हाऊस में भ्रष्टाचार…

भ्रष्टाचार के खिलाफ़ अभियान मगर सीएम हाऊस में भ्रष्टाचार…

वर्ष 2011 में बिहार के मुख्यमंत्री ने राज्य में अक्षय ऊर्जा को बढावा देने की बात कहते हुए ऐलान किया था कि वे सबसे पहले मुख्यमंत्री आवास को सौर ऊर्जा से लैस करेंगे। उनकी इस परिकल्पना को एक केंद्रीय योजना के तहत अंजाम देने की प्रक्रिया शुरु की गयी है। खास बात यह है कि केंद्र सरकार की मानक एजेंसी एमएनआरआई के विशेषज्ञों ने 3 करोड़ रुपए की लागत आने का अनुमान किया था। जब इस योजना को अंजाम देने के लिए कंपनियों से टेंडर मंगाये गये तब दो कंपनियों के टेंडर में इसी राशि में योजना को साकार करने की गुंजाइश थी। लेकिन बिहार सरकार के अधिकारियों ने सारे नियमों को दरकिनार करते हुए चेन्नई की कंपनी मेसर्स लार्सन एंड ट्रुबो को 4 करोड़ 72 लाख में दे दी। सीएजी ने जब इस मामले की तहकीकात की तब कई और सच सामने आये। प्रस्तुत रिपोर्ट पटना हाईकोर्ट में चल रहे एक वाद सीडब्ल्यूजेसी 21443।2012 के सिलसिले में याचिकाकर्ता नागरिक अधिकार मंच के द्वारा अदालत में एक दस्तावेज के रुप में प्रस्तुत किया गया है। चूंकि सीएजी ने अपनी रिपोर्ट सुनवाई से पहले सार्वजनिक कर दिया था, इसलिए हम इसे आधार मानकर इस खबर को प्रकाशित कर रहे हैं। सीएम आवास में हुए एक अजीबोगरीब भ्रष्टाचार की पूरी कहानी खुद पढिये और पूछिए उनसे जो बिहार को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने की बात करते हैं। क्या वे इस मामले में भी कोई कार्रवाई करेंगे?

-नवल किशोर कुमार||

इस योजना के कार्यान्वयन हेतु एम एन आर ई के अनुसार केंद्रांश के रुप में 19 जनवरी 2012 को स्वीकृत 40 लाख तथा राज्यांश मद से अप्रैल 2012 में 282-66 लाख रुपए की राशि यानी कुल 322-66 लाख रुपए की राशि ब्रेडा कार्यालय को उपलब्ध करायी गयी थी। निविदा के निष्पादन के लिए पहली तारीख 16 जुलाई 2012 को मुकर्रर किया गया था। लेकिन तकनीकी कारणों का हवाला देते हुए 30 अगस्त को अमल में लाया गया। निविदा के निष्पादन की प्रक्रिया पुरी होने के बाद 26 नवंबर 2012 को आपूर्ति का आदेश दिया गया। इस प्रकार सहायक अनुदान की राशि प्राप्त होने के बाद भी निविदा के निष्पादन में लगभग 10 महीने की देरी की गयी। जबकि सरकारी प्रावधानों के तहत सहायक अनुदान की राशि अविलम्ब कार्यान्वयन के लिए उपलब्ध कराया जाता है।BL04RASH4_336478g

सीएजी का कहना है कि जब उसने इस बारे में जब उसने बिहार सरकार और ब्रेडा से जानकारी मांगी तो बताया गया कि इस कार्य के लिए निविदा आमंत्रण की गयी थी। नियम के आलोक में एवं आपूर्तिकर्ताओं को निर्धारित समय में भाग नहीं लेने के कारण संशोधित निविदा निकाली गयी। सीएजी के अनुसार सरकारी तंत्र का यह जवाब संतोषप्रद नहीं था क्योंकि निविदा को प्रकाशित होने के बाद रद्द किया गया। उसमें आपूर्तिकर्ताओं को निर्धारित समय में उपस्थित न होना जवाब एकमत प्रतीत नहीं होता है।

सीएजी ने निविदा निष्पादन में भी अनियमितता की बात अपनी टिप्प्णी में कही। कैग के अनुसार मुख्यमंत्री आवास में सौर ऊर्जा संयंत्र लगाने के लिए एम एन आर आई ने अपने पत्रांक 32/5/2011-12/पीयूएसई(पार्ट-1) दिनांक 19 जनवरी 2012 के द्वारा पूरे परियोजना की लागत करीब 3 करोड़ रुपए बताया। जबकि ब्रेडा कार्यालय द्वारा ड्राफ़्ट डीपीआर में अनुमानित राशि  साढे चार करोड़ रुपए का उल्लेख किया गया था। इस ड्राफ़्ट डीपीआर में स्पष्ट था कि उक्त कार्य का वास्तविक व्यय डीपीआर पर आधारित होगा। 28 मार्च 2012 को ऊर्जा विभाग के प्रधान सचिव ने ब्रेडा की समीक्षा बैठक के दौरान कहा कि ड्राफ़्ट डीपीआर में उल्लेख राशि का संशोधन एम एन आर आई नई दिल्ली में प्राप्त कर ली जाय तथा फ़ाइनल डीपीआर तैयार होने के उपरांत ही निर्धारित प्रक्रिया के तहत एजेंसी का चयन कर सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति प्राप्त कर ली जाय। सीएजी के अनुसार संचिकाओं से स्पष्ट है कि इस कार्य का फ़ाइनल डीपीआर के बिना ही निविदा निष्पादन किया गया जो ऊर्जा सचिव के द्वारा दिये गये निर्देशों के विपरीत है। यानी बिहार सरकार के अधिकारियों ने एम एन आर आई नई दिल्ली से बिना फ़ाइनल डीपीआर का संशोधन की स्वीकृति लिये ही निविदा को निष्पादित कर दिया।

सीएजी के अनुसार इस बारे में उसे बिहार सरकार के अधिकारियों द्वारा बताया गया कि एम एन आर आई नई दिल्ली के दिशा निर्देशों के अनुसार ही निविदा का प्रकाशन कराया गया तथा कार्य की महत्ता (सीएम आवास में सौर ऊर्जा की व्यवस्था करना) को देखते हुए ड्राफ़्ट डीपीआर के आधार पर ही निविदा का निष्पादन कर कार्य करा दिया गया।

सीएजी ने सरकार के इस जवाब पर भी ऐतराज जताया है। उसका कहना है कि मार्च 2012 में ऊर्जा विभाग के प्रधान सचिव की अध्यक्षता में हुए बैठक के दौरान लिये गये निर्णयों की अवहेलना कर 26 नवंबर 2012 को आपूर्ति का आदेश दिया गया। यह कार्रवाई 8 महीने के बाद हुई। सीएजी का कहना है कि अगर कार्य वाकई इतना महत्वपूर्ण था तो फ़िर 8 महीने की देरी क्यों की गयी?

सीएजी ने इस घोटाला के नब्ज को पकड़ा। उसने अपनी रिपोर्ट में उल्लेखित किया है कि जानबुझकर मुख्यमंत्री आवास में सौर ऊर्जा संयंत्र लगाने का काम चेन्नई की मेसर्स लार्सन एंड ट्रुबो को दिया गया जबकि समान अहर्ता रखने वाली हरियाणा की मेसर्स लैनको सोलर एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड ने सबसे कम कीमत को कोट किया था। हालांकि जब इस बारे में सीएजी ने बिहार सरकार से जवाब तलब किया तब उसे बताया गया कि मेसर्स लैनको सोलर एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड के संयंत्र में बैट्री बैकअप न्यूनतम अहर्ता से कम था। हालांकि इस कंपनी ने इसका स्पष्ट उल्लेख किया था कि अगर 11 लाख रुपए मूल्य के संघटक उसके संयंत्र में जोड़ दिये जायें तो वह न्यूनतम अहर्ता से अधिक बैट्री बैकअप उपलब्ध करा सकती थी। इस प्रकार मेसर्स लैनको कंपनी के दस्तावेजों में एक गलती की गयी। गलती यह कि उसके द्वारा पहले कोट किये गये कीमत यानी 1 करोड़ 62 लाख रुपए में 11 लाख रुपए जोड़े जायें तो यह 1 करोड़ 73 लाख रुपए होता है। लेकिन बिहार सरकार के अधिकारियों ने सीएजी को जो जवाब दिया है उसमें यह राशि 6 लाख रुपए अधिक यानी 1 करोड़ 79 लाख रुपए दर्शाया गया है।

ब्रेडा ने 9 नवंबर 2012 को ऊर्जा विभाग के प्रधान सचिव को पत्र लिखा जिसका पत्रांक 1806 था। इस पत्र में स्पष्ट रुप से उल्लेखित था कि नवंबर 2012 में कार्यावंटन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद दिसंबर 2012 के प्रथम सप्ताह में एजेंसी के साथ एकरारनामा कर लिया जाएगा। उसके बाद ही कार्य प्रारंभ किया जाएगा। परंतु सीएजी ने जांच के दौरान पाया कि कार्यावंटन के बाद बिना एकरारनामा के ही चयनित एजेंसी मेसर्स लार्सन एंड ट्रुबो को आपूर्ति आदेश निर्गत किया गया। इसके जवाब में सीएजी को बताया गया कि एकरारनामा की कार्रवाई की जा रही है। सीएजी की टिप्प्णी है कि लगभग 50 फ़ीसदी के ज्यादा काम पूरा किया जा चुका है। ऐसे में अब एकरारनामा कराने की बात सत्य से परे है।

खुलासा : सत्ता बदली, लेकिन नहीं उखड़ा भ्रष्टाचारियों का खूंटा, 15 आईएएस और 25 आईपीएस पर भ्रष्टाचार का आरोप

पटना (अपना बिहार, 17 जनवरी 2014) – बात उस समय की है जब सूबे में तथाकथित सुशासन की सरकार नहीं थी। वर्ष 2002 में एक आईपीएस पदाधिकारी मेघनाथ राम पर अपराध नियंत्रण में ढिलाई बरतने से लेकर गैर जिम्मेदराना हरकन करने का मामला प्रकाश में आया था। इनके खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले भी सामने आये थे। इन आरोपों की विभागीय जांच के संबंध में तत्कालीन मुख्यमंत्री के द्वारा विभागीय जांच की अनुशंसा की गयी थी। खास बात यह है कि विभागीय जांच रिपोर्ट को केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजी गयी। इसके बाद गृह मंत्रालय के आदेश के आलोक में मेघनाथ राम से कारण पृच्छा की मांग की गयी। दिलचस्प यह भी है कि इस मामले में राज्य सरकार के पास आज तक मेघनाथ राम का जवाब नहीं पहुंचा। नतीजतन आजतक कार्रवाई नहीं हुई।

मेघनाथ राम अकेले ऐसे नौकरशाह नहीं हैं जिनके उपर भ्रष्टचार का आरोप है और राज्य सरकार द्वारा उनका बाल तक बांका नहीं किया जा सका है। सूचना का अधिकार कानून के तहत राज्य के जाने माने आरटीआई कार्यकर्ता शिवप्रकाश राय के द्वारा राज्य सरकार से मांगी गयी जानकारी के अनुसार राज्य में 15 आईएएस पदाधिकारियों के खिलाफ 18 मामले और 25 आईपीएस पदाधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले लंबित हैं। इनमें से एक अजय कुमार वर्मा के उपर भी भ्रष्टाचार का आरोप लगा था। इनके खिलाफ दो आरोप थे। पहला आरोप अनुशासनहीनता एवं आदेश उल्लंघन का था वहीं दूसरा आरोप उच्चाधिकारियों के खिलाफ अमर्यादित शब्दों के इस्तेमाल का था। इनके खिलाफ वर्तमान डीजीपी अभयानंद जो उस समय अपर पुलिस महानिदेशक बीएमपी पटना के पद कार्यरत थे, ने विभागीय जांच को अंजाम दिया। यह पूरी कार्रवाई वर्ष 2005 में समाप्त हो गयी।

बड़े नौकरशाहों के उपर भ्रष्टाचार का आरोप वर्तमान सरकार के कार्यकाल में भी लगता रहा। विभागीय जांच की खानापूर्ति भी की गयी, लेकिन नतीजा जस का तस रहा। एक उदाहरण डीजी के पद से रिटायर हुए ध्रुव नारायण गुप्ता का भी है। इनके उपर अनुसंधान में लापरवाही का आरोप था। इनके खिलाफ विभागीय जांच को अंजाम दिया गया और वर्ष 2008 में ही विभागीय काार्यवाही के लिए एक संकल्प निर्गत किया गया। इनके मामले में दिलचस्प यह है कि अब श्री गुप्ता रिटायर हो चुके हैं और बेदाग जिंदगी के मजे ले रहे हैं।

खैर, बिहार में भ्रष्टाचार के आरोप में अब तक केवल दो बड़े नौकरशाहों के खिलाफ़ कदम उठाये गये हैं। इनमें से एक थे अति पिछड़ा वर्ग के गौतम गोस्वामी जिन्हें अच्छे काम के लिए कभी टाइम मैगजीन ने हीरो बताया था और दूसरे पटना के एसएसपी रहे पासवान जाति के आलोक कुमार। गौतम गोस्वामी को बाढ घोटाले का दोषी बताया गया। श्री गोस्वामी के उपर लगाये गये आरोप गलत थे या सही, यह आज भी रहस्य है। आश्चर्यजनक तरीके से उनकी मौत भी हो गयी। वहीं आलोक कुमार पर एक सवर्ण शराब व्यवसायी ने दस करोड़ रुपए रिश्वत मांगने का आरोप लगाया। मामला जांच की प्रक्रियावस्था में है।

बहरहाल, इस पूरे मामले में आरटीआई कार्यकर्ता शिव प्रकाश राय का कहना है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ राज्य सरकार द्वारा लिया गया संकल्प सराहनीय है। लेकिन अगर राज्य सरकार सचमुच में भ्रष्टाचार को खत्म करना चाहती है तो उसे बड़े पदाधिकारियों के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। इसकी वजह यह है कि बड़े पदाधिकारियों के भ्रष्टाचारी होने के कारण ही छोटे कर्मचारी भी भ्रष्टाचारी होते हैं।

बिहार में दागी आईपीएस अधिकारियों की सूची जिनका नहीं उखड़ा आजतक खूंटा:

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.