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‘आप’ के लिए मुसीबत बनता सोशल मीडिया…

By   /  January 24, 2014  /  2 Comments

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दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की लोकप्रियता में ट्विटर और फेसबुक जैसी सोशल मीडिया वेबसाइटों का बड़ा हाथ रहा है, लेकिन क्या यही सोशल मीडिया अब उनके लिए मुश्किल बनता जा रहा है ?62004_611720765560109_1644769198_n

ये तो स्पष्ट है कि उन्हें सोशल मीडिया पर भारी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है.

सामाजिक कार्यकर्ता से राजनेता बने केजरीवाल ट्विटर पर बहुत सक्रिय हैं. 12 लाख से ज़्यादा लोग उन्हें फ़ॉलो करते हैं. उनकी क्लिक करें आम आदमी पार्टी अपने आयोजनों और रैलियों में समर्थकों को जुटाने के लिए सोशल मीडिया का भरपूर इस्तेमाल करती है.

पिछले महीने ‘आप’ ने दिल्ली विधानसभा चुनावों के दौरान हर निर्वाचन क्षेत्र के लिए अलग से फ़ेसबुक पेज बनाया था. संभवतः सोशल मीडिया पर इतनी सक्रियता का ही नतीजा है कि वो युवाओं में बेहद लोकप्रिय हैं.

लेकिन पिछले कुछ दिनों में ट्विटर पर कुछ हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं जिनमें #QuitAAP यानी आप छोड़ो और #AAPdrama (आप ड्रामा) ख़ास तौर से शामिल हैं. इनमें से कुछ के पीछे विरोधी पार्टियों के समर्थक हो सकते हैं लेकिन मुख्य धारा का मीडिया भी आप की काफ़ी आलोचना कर रहा है.

क्यों ख़फ़ा हैं लोग

सोमवार और मंगलवार को मुख्यमंत्री केजरीवाल ने दिल्ली पुलिस का नियंत्रण हासिल करने की मांग के साथ धरना दिया. इस दौरान न सिर्फ़ की मेट्रो स्टेशन बंद रहे बल्कि शहर के कई हिस्सों को बंद करना पड़ा.

“केजरीवाल इतने ईमानदार हैं कि कभी किसी महिला की उनसे ये पूछने की हिम्मत नहीं होती है कि क्या मैं मोटी दिख रही हूं.”

सोशल मीडिया पर एक लतीफ़ा

इस धरने के बाद आम लोग केजरीवाल को लेकर कई गंभीर सवाल उठा रहे हैं. फेसबुक पर एक व्यक्ति ने टिप्पणी की, “उन्हें पता ही नहीं है कि सरकार कैसे चलाई जाती है, ऐसे में उनके सामने यही विकल्प बचा है उन्हें जो भी कोई समस्या दिखाई दे रही है, वो उसे लेकर विरोध प्रदर्शन करें.”

आप के समर्थक और विरोधियों के और भी कई दिलचस्प कमेंट आए. कई जगह उनकी मुहिम का समर्थन दिखा तो कई लोगों ने उन पर आलोचना के तीर चलाए. #YoKejriwalSoHonest और #YoKejriwalSoBrave जैसे हैशटैग इसकी बानगी हैं.

फेसबुक पर उन्हें लेकर लतीफ़े भी चल निकले हैं. मिसाल के तौर पर, “केजरीवाल इतने ईमानदार हैं कि कभी किसी महिला ने उनसे ये पूछने की हिम्मत नहीं की है कि क्या मैं मोटी दिख रही हूं.”

इस साल अप्रैल और मई में होने वाले भारतीय आम चुनावों के दौरान सोशल मीडिया की अहम भूमिका रहेगी. हालांकि अभी भारत में इंटरनेट तक एक बड़ी आबादी की पहुंच नहीं है, लेकिन फिर भी तेज़ी के साथ लोग इंटरनेट से जुड़ रहे हैं. ब्रिटेन से तुलना करें तो उसकी आबादी से दोगुने लोग फ़ेसबुक से जुड़ चुके हैं.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 Comments

  1. mahendra gupta says:

    यह तो होना ही था.केजरीवाल पार्टी को जिस मीडिया ने जितना ऊँचा उठाया , वही मीडिया वापिस जमीं पर गिरा सकता है, अब समझ आ गया होगा. वैसेभी कहावत है जो जितनी जल्दी शिखर पर पहुँचता है, वह हांफ कर उतनी ही जल्दी नीचे भी आता है.आंदोलन कर सड़क पर आना,विरोध कर भीड़ जुटाना अलग बात है, पर उसेसंभले रखना कठिन. केजरीवाल नए हैं, देश की जनता इन खाये पिए अघाये नेताओं से तंग है, युवा वर्ग की अपनी अपेक्षाएं है, पर केजरीवाल इतने क्षमतावान नहीं कि यह सब काम अकेले कर सकें. साथ आये लोगों को भो उन्होंने इतना जिम्मेदार समझा नहीं या बन्ने नहीं दिया कि उनकी चौधराहट को कोई चैलेंज न कर दे और इसलिए आज उनके ओंधे मुहं गिरने की हालत हो गयी है.इलेक्ट्रॉनिक व प्रिंट मीडिया जहाँ अपनी टी आर पी बढ़ने के लिएयह सब स्वांग रचते हैं, तो सोशल मीडिया पर हर आदमी अपनी ख़ुशी नाखुशी जाहिर करने को स्वतंत्र है.फिर वैसे भी जिन कन्धों पर चढ़ केजरीवाल ने परचम फहराने की कोशिश की थी , उनकी मजबूती उन्हें पहले परख लेनी चाहिए थी.जिसके सर पर हम बैठते हैं, तो हमें गिराने का हक़ भी उसी के पास सुरक्षित है.अब केजरीवाल को अपनी राह सुरक्षित करनी होगी पर ऐसे मौके बार बार नहीं आते.

  2. यह तो होना ही था.केजरीवाल पार्टी को जिस मीडिया ने जितना ऊँचा उठाया , वही मीडिया वापिस जमीं पर गिरा सकता है, अब समझ आ गया होगा. वैसेभी कहावत है जो जितनी जल्दी शिखर पर पहुँचता है, वह हांफ कर उतनी ही जल्दी नीचे भी आता है.आंदोलन कर सड़क पर आना,विरोध कर भीड़ जुटाना अलग बात है, पर उसेसंभले रखना कठिन. केजरीवाल नए हैं, देश की जनता इन खाये पिए अघाये नेताओं से तंग है, युवा वर्ग की अपनी अपेक्षाएं है, पर केजरीवाल इतने क्षमतावान नहीं कि यह सब काम अकेले कर सकें. साथ आये लोगों को भो उन्होंने इतना जिम्मेदार समझा नहीं या बन्ने नहीं दिया कि उनकी चौधराहट को कोई चैलेंज न कर दे और इसलिए आज उनके ओंधे मुहं गिरने की हालत हो गयी है.इलेक्ट्रॉनिक व प्रिंट मीडिया जहाँ अपनी टी आर पी बढ़ने के लिएयह सब स्वांग रचते हैं, तो सोशल मीडिया पर हर आदमी अपनी ख़ुशी नाखुशी जाहिर करने को स्वतंत्र है.फिर वैसे भी जिन कन्धों पर चढ़ केजरीवाल ने परचम फहराने की कोशिश की थी , उनकी मजबूती उन्हें पहले परख लेनी चाहिए थी.जिसके सर पर हम बैठते हैं, तो हमें गिराने का हक़ भी उसी के पास सुरक्षित है.अब केजरीवाल को अपनी राह सुरक्षित करनी होगी पर ऐसे मौके बार बार नहीं आते.

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