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भविष्य की राजनीति के संकेत…

-दीपेश नेगी||
आम आदमी पार्टी की दिल्ली सरकार का कल समाप्त हुआ धरना सफल रहा अथवा असफल इस के विश्लेषण पर विशेषज्ञों के विचार अब आगे पढ़ने को मिलते ही रहेंगे लेकिन ऐसा वाक्या पहली बार देखने को मिला कि दो भिन्न- भिन्न पार्टियों की सरकारें आपस में इतना उलझी हैं. आम आदमी पार्टी द्वारा किया गया यह धरना भारतीय लोकतंत्र के भविष्य के लिए अच्छा संकेत दे गया है बसर्ते कि हम इसको किसी की जीत या हार से न तोलें. यदि इसी हार जीत की बात करें तो इसमें न तो किसी की हार हुई है और न ही किसी की जीत.गणतंत्र दिवस के नजदीक होने के कारण पूरा राजपथ सुरक्षा के मददे नजर अति संवेदन शील होने के कारण यह दबाव दिल्ली की सरकार पर था तो उपराज्यपाल पर भी दोनों सरकारों के बीच मध्यस्तता करने का दबाव था. सुशील कुमार शिन्दे पर भी कोई बीच का रास्ता निकालने का दबाव था. सभी जिम्मेदार विभागों पर दबाव होने के कारण जो बीच का रास्ता निकाला गया वह वर्तमान की आवश्यकता थी. दिल्ली सरकार इसी कारण से अधिक दबाव मे रही कि 26 जनवरी नजदीक है इसलिए केजरीवाल ने फोरी तोर पर सम्बन्धित पुलिस अधिकारियों का तबादला चाहा था. यह जानते हुऐ भी कि जिस सरकार के अधीन पुलिस बल होता है वह उसका दुरूपयोग अधिक करता है और पुलिस के बल पर अपने रूतबे को बरकरार रखते है.arvind kejriwal

केन्द्र तथा राज्य में इस प्रकार के विभिन्न पार्टियो की सरकारें आज तक इतना ही कह पाती थी कि केन्द्र राज्य के अधिकारों में हस्तक्षेप न करे. आम आदमी पार्टी ने भारतीय लोकतंत्र में एक ऐसे दबाव समूह का निर्माण करना शुरू कर दिया है जो हमारे लोकतंत्र के लिए संजीवनी का कार्य करना करेगी A इस धरने के दूरगामी परिणाम होंगे. क्या आज की राजनीतिक भ्रष्टता अराजकता नहीं है. इस अराजकता के खात्में के लिए यह आन्दोलन जीवन रक्षक दवाइयों का कार्य करेगी. यकीन मानिये यह इस लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत है.

किसी प्रदेश का मुखिया रात में हाड कपाती सर्दी मे फूटपाथ पर सो कर क्या सारी राजनीतिक जमात को चेलैंज नहीं कर रहा ! साथ ही चेतावनी भी दे रहा है इन तथाकथित लाट साहबों को जो लाट साहबी झाडने के चक्करों में आम आदमी से इतना दूर हो चुके है कि आम आदमी जिसने इनको अपना अमूल्य मत दिया था उससे बहुत दूर हो चला है. इनकी इसी लाट साहबी को ललकार रहा है एक आन्दोलन कारी मुख्यमंत्री कि लाटसाहबो अब आवो अखाडे में. आम आदमी पार्टी इस देश की राजनीति को सडक पर ले आयी है. यह चेतावनी नरेन्द्र मोदी जैसे तथाकथित शेर को कैसे परेशान नहीं करती जो हमेशा से जैड कैटगरी के सुरक्षा दस्ते से घिरे रहते है और जिनके लिए अहमदाबाद में 150 करोड का बुलैट प्रुफ कार्यालय बनाया जा रहा हो या फिर छत्तीसगढ के मुख्यमंत्री रमन सिंह का 81 करोड का घर. गृहमंत्री सुशील कुमार शिन्दे जिनके आवास पर कुछ माह पूर्व आन्दोलन कारियों द्वारा मारे गये कंकडों से कुछ शीशे टूट जाते हैं तो एक मुश्त 12 पुलिस वाले बर्खास्त कर दिये जाते है. इन तथाकथित लाट साहबों के एक से बढ़ कर एक किस्से आम आदमी के लिए किसी तिलिस्म से कम नहीं हैं. राजीव गाधी के प्रधानमंत्री के कार्यकाल में उनका कुत्ता अचानक से भाग जाता है दिल्ली पुलिस की पूरी फौज को उस कुत्ते को ढूढने के लिए लगा दिया जाता है.

क्या जरूरत है सैफई जैसे महोत्सवों की. केवल इसीलिए न कि इनकी लाट साहबी बची रहे. सैफई महोत्सव में जितना पैसा खर्च हुआ, उसका एक हिस्सा भी यदि वह मुजफफर नगर के दंगा पीडितों पर खर्च किया जाता तो शायद उन बच्चों की जान बच सकती थी, जो ठंड बर्दाश्त न कर पाने के कारण काल कल्वित हुऐ.

इससे पूर्व तालाब समय पर न बन पाने के कारण किसी प्रशासनिक अधिकारी को बर्खास्त तक होना पडा. आप सबको वह सीन याद होगा जिसमें एक आई जी साहब घुटनों के बल बैठ कर सौफे में बैठे अपने आका से आदेश ले रहे है औेर इस सीन को देख कर पूरे देश में लोग अपने अपने विचार बना रहे है. मेरे जैसे आम आदमी को ग्लानि हो रही है कि क्या हमें भी अपने बच्चों को अधिक पढा लिखा कर इस आई जी जैसा बनाना चाहिए अथवा हुडदंगी या असभ्य बना कर नेता, जो आगे जाकर इस आई जी को ज्ञान सिखाये. क्या यह उचित स्थिति है, क्या ऐसे भीडतंत्र मे पढे लिखे अथवा ज्ञान का कोई सम्मान नहीं? जब भारत की सबसे बडी प्रशासनिक परीक्षा पास किया हुआ ब्यक्ति इस प्रकार से निरीह है तो आम आदमी को कौन पूछे. हाँ, राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओ का इस सीन को देखने पर बाछें जरूर खिली होगी क्योंक वो भी आसानी से छोटे लाट साहब का रूतबा इस निरीह प्राणी पर दिखा सकेंगे ओैर गर्व से कह देंगे कि आई जी साहब हम आपकी वर्दी कभी भी उतरवा देंगे. वहीं दूसरी ओर जब उत्तर प्रदेश शासन ने दिल्ली के मुख्यमंत्री को कौशाम्बी स्थित आवास के लिए सुरक्षा देने के लिए कुछ पुलिस वालों को भेजा तो उन्होंने उत्तर प्रदेश पुलिस के इन जवानों के सैल्यूट करने पर उन्हें हाथ जोड कर मना किया. अब ये लाट साहब इस बात को कैसे पचाऐं कि एक राज्य का मुख्यमंत्री मामुली से पुलिस वालों को हाथ जोडे.

अरविन्द केजरीवाल भी नरेन्द मोदी रमन सिंह और अखिलेश यादव जैसे ही एक सूबे की बागडोर सभाल रहे हैं. तो यह बात यह राजनीतिक जमात कैसे स्वीकार करे कि उनके स्तर का नेता रात को फूटपाथ पर सोये. इनको अरविन्द केजरीवाल की चिन्ता नहीं, इनको तो चिन्ता है तो अपने उस रूतबे की, जिसके लिए इन्होंने जनता को कौन कौन से झुनझुने नहीं पकड़ाये. क्या क्या झूठ नहीं बोला और जब इतने पापड़ बेलने के बाद लाट साहब बने तो क्यों सोयें रोड पर. यदि रोड पर ही सोना था तो कोई क्यों बने नेता.
राहुल गाधी अमेठी में मीडिया टीम के साथ किसी दलित घर में भोजन करने का ढोंग करते है. बीजेपी दिल्ली में चुनाव पूर्व दलितों के साथ सामूहिक भोज का दिखावा करते हैं. ये दिखावे की राजनीति है. अन्दरखाने तो इनके आलीशान ठाठ बाट ऐसे हैं जो आम आदमी के लिए चमत्कार से कम नहीं हैं क्या मायावती के आलीशान ड्राइंगरूम में कोई दलित बैठ सकता है. इन लाट साहबों के घरों में नौकरों से ज्यादा कुत्तों की इज्जत होती है.

जो एक विभाजक रेखा इन तथाकथित लाट साहबों ने अपने और आम आदमी के बीच में बना दी है उसी को तोडने की कोशिश कर रहे हैं अरविन्द केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी. उस आम आदमी को इन लाट साहबों के सामने खडे होने की हिम्मत दे रहे हैं अरविन्द. जिस दिन उस आम आदमी का कहीं से भी लगा कि ये भी अब लाट साहब बनने लगे हैं उसी दिन मर जायेगा यह आन्दोलन. जिसका पूरा विरोध जनता कर भी चुकी है. जब अरविन्द ने 5-5 कमरों के दो सरकारी क्वाटरों के लिए हामी भरी थी तो जनता के विरोध के कारण वो वापस भी करने पड़े. इसलिए लड़ते रहो अरविन्द, उस अन्त्योदय वर्ग के लिए बने रहो. उसकी आवाज जिसको गूंगा कर दिया है इस भीडतंत्र तथा इसके रहनुमाओं ने. आप किसी कांग्रेस, बीजेपी या फिर किसी और राजनीतिक जमात अथवा मीडिया के लिए जिम्मेदार नहीं हो अरविन्द! आप जिम्मेदार हो केवल उस जनता के लिए जिसने आपको इस स्थान तक पहुँचाया है. उस आम आदमी को वह पहले वाला अरविन्द केजरीवाल भी पसंद था और अब पसंद है एक आन्दोलनकारी मुख्यमंत्री भी.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.