/आबिद सुरती के मशहूर करेक्टर “बहादुर” का ट्रेडमार्क कब्ज़ा लिया एक मीडिया हॉउस ने…

आबिद सुरती के मशहूर करेक्टर “बहादुर” का ट्रेडमार्क कब्ज़ा लिया एक मीडिया हॉउस ने…

-पंकज शुक्ल||
बातचीत के दौरान शाहरुख खान के दिल से छलक आई वो ख्वाहिश जो वो हिंदी सिनेमा के बादशाह होकर भी पूरी नहीं कर पा रहे हैं। दरअसल, शाहरुख बड़े परदे पर ‘बहादुर’ बनना चाहते हैं। जिनकी उम्र पैंतालिस पचास के आसपास होगी, उनको अपने बचपन के इंद्रजाल कॉमिक्स ज़रूर याद होंगे। एक रुपये की एक किताब मिलती थी और वो एक रुपया भी जुगाड़ना जतन का काम होता था। किराए पर तब 10 पैसे में मिला करते थे कॉमिक्स।bahadur

इंद्रजाल कॉमिक्स याद होंगे तो फिर उनका एक किरदार ‘बहादुर’ भी याद होगा। ‘बहादुर’ यानी इसी नाम से बनी कॉमिक सीरीज का हीरो। बाप जिसका डाकू था, लेकिन उसने कानून के पाले में आने का फैसला किया। केसरिया कुर्ता, डेनिम की जींस। कॉमिक्स की दुनिया का पहला हिंदुस्तानी हीरो। दुनिया भर में वो आबिद सुरती के बहादुर के नाम से मशहूर हुआ। शाहरुख खान इस किरदार का चोला पहनकर बड़े परदे पर आना चाहते हैं। बोले, “बचपन में इसके बारे में खूब पढ़ा। पूरा कलेक्शन जमा करके रखा। अब मन किया कि इस पर फिल्म बनाई जाए तो इसके कॉपराइट नहीं मिल रहे।” शाहरुख खान जैसी हस्ती किसी किरदार पर फिल्म बनाना चाहे और उसके सामने ऐसी अड़चनें आ जाए कि वो भी न पार सकें तो मन में उत्सुकता तो जागती ही है।

यहां से शाहरुख ने शुरू की कहानी मुंबई के वॉटरमैन की। ये वॉटरमैन और कोई नहीं, हमारे आपके अजीज़ आबिद सुरती साब ही हैं। जी हां, वही जिनके कॉमिक किरदार ढब्बू जी ने कभी धर्मवीर भारती तक पर उर्दू को बढ़ावा देने का इल्जाम लगा दिया था, और वो इसलिए कि ढब्बूजी धर्मयुग के पीछे के पन्ने पर छपते थे और लोग धर्मयुग खरीदने के बाद उसे पीछे से ही पढ़ना शुरू करते थे। आबिद सुरती के किरदार दुनिया भर में मशहूर हैं। उनकी लिखी कहानियां परदेस में हिंदी सीखने के इच्छुक लोगों को क्लासरूम में पढ़ाई जाती हैं। नाटककार भी वो रहे। फिल्मों में स्पॉट बॉय से लेकर लेखन तक में हाथ आजमाया। पेंटर ऐसे कि अगर एक ही लीक पकड़े रहते तो आज एम एफ हुसैन से आगे के नहीं तो कम से कम बराबर के कलाकार होते।

आबिद सुरती मुंबई से थोड़ा दूर बसे इलाके मीरा रोड में अकेले रहते हैं। दोनों बेटे सैटल हो चुके हैं। एक का तो शाहरुख ने नाम भी लिया, किसी कंपनी में नौकरी लगवाने के सिलसिले में। आबिद की पत्नी अपने बच्चों के साथ हैं, और वो मीरा रोड में ही ड्रॉप डेड एनजीओ के नाम पर नलों से पानी टपकने के खिलाफ मुहिम चलाते हैं। पढ़ने में अजीब सा लग सकता है लेकिन कोई छह साल पहले अपने एक दोस्त के घर में लेटे आबिद सुरती को घर के बूंद बूंद टपकते नल ने सोने नहीं दिया।

Brave-act1और, बस वहीं से ये ख्याल जनमा। हर इतवार आबिद अपना झोला लेकर घर से निकलने लगे। झोले में होती कुछ रिंचे, प्लास और वाशर। वो सोसाइटी के घर घर जाकर टपकते नल ठीक करने लगे। और, यहीं से शुरू हुई ड्रॉप डेड फाउंडेशन की। शाहरुख खान ने आबिद सुरती की इस मुहिम के बारे में किसी अखबार में पढ़ा और उन्हें एक लंबा एसएमएस भेज दिया। शाहरुख ने ये भी लिखा कि कैसे वो बचपन से ‘बहादुर’ के फैन रहे हैं। फैन मैं भी बचपन से ‘ढब्बू जी’ का रहा हूं। शाहरुख ने बस इस किरदार को बनाने वाले आबिद सुरती से मुलाकात की मेरी इच्छा को फिर से जगा दिया। आबिद सुरती की फ्रेंड लिस्ट में मैं शामिल रहा हूं और उनकी सालगिरह पर मुबारक़बाद भी भेजता रहा हूं। इस बार बात आगे बढ़ी। मैंने संदेश भेजा। उनका जवाब आया। पिछले इतवार हम मिले फन रिपब्लिक के पास एक रेस्तरां में।

बातों बातों में ज़िक्र फिर से ‘बहादुर’ का निकला। ‘बहादुर’ के परिवेश के बारे में बताते वक्त 78 साल के आबिद सुरती के चेहरे की चमक देखने लायक थी। फिर जैसे ज़ोर का झोंका आए और लौ फड़फड़ाने लगे, वैसी ही बेचैनी के साथ बताने लगे, “शाहरुख से पहले कबीर सदानंद ने भी बहादुर पर फिल्म बनाने की प्लानिंग की थी। हमने इस किरदार को ट्रेडमार्क रजिस्टर्ड कराना चाहा। पर पता चला कि एक बहुत बड़े मीडिया हाउस ने ‘बहादुर बाई आबिद सुरती’ नाम का ट्रेडमार्क अपने नाम रजिस्टर्ड करा लिया है।”Brave-act3 (5)

सुनकर बड़ा दुख हुआ। दूसरों के अधिकारों की दिन रात बात करने वाले मीडिया हाउस क्या ऐसे भी किसी कलाकार का हक मार देते हैं। कॉपीराइट कानून कहता है कि किसी कृति के बनाते ही उसका कॉपीराइट सृजक के नाम हो जाता है। उसका कहीं रजिस्ट्रेशन जरूरी नहीं। माने कि अगर कोई ढंग का वकील आबिद सुरती का मामला अपने हाथ में ले तो उनके बौद्धिक संपदा अधिकार उन्हें मिल सकते हैं। मुझे खुद एक हफ्ता लग गया इस बात को दुनिया के सामने लाने में। चाहता हूं उनकी लड़ाई लड़ूं। जितना बन सकेगा कोशिश करूंगा। क्या आप साथ देंगे?

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.