/अहंकार में डूबी भाजपा…

अहंकार में डूबी भाजपा…

-मदन मोदी||
आजादी के 66 साल बाद भी बहुतायत से सामंती, जीहजूरी और गुलामी की मानसिकता वाले राज्य राजस्थान में जहां आम आदमी, गरीब और वास्तविक आदिवासी शिक्षा के क्षेत्र में अब भी बहुत पीछे है और एक तिहाई लोग गरीबी की रेखा और उसके नीचे जीवन यापन करते हैं, वहां इस बार विधानसभा चुनावों में प्रचण्ड बहुमत से जीतने वाली भाजपा बम-बम है और पूरी तरह अहंकार में चूर है, मगरूर है. इसी अहंकार में लोकसभा चुनावों में वह राज्य की सभी 25 सीटें आराम से अपने कब्जे में ले लेगी, ऐसा वह मिथ पाल बैठी है और इसीलिए मंहगाई व भ्रष्टाचार से त्रस्त आम आदमी को राहत देने के लिए अब तक उसने कोई ठोस व कारगर कदम नहीं उठाया है, केवल बातें ही हो रही है, जबकि उसकी तुलना में दिल्ली में ‘आप’ की सरकार ने अल्प बहुमत के बावजूद मात्र 25 दिनों में ही बहुत से काम कर दिखाए हैं. राजनीतिक दल और उनके इशारों पर नाचने वाले लोग चाहे जो भी शोर मचाते रहें, किन्तु ‘आप’ द्वारा उठाए गए कदमों से आम आदमी खुश है और उसमें नई आशा का संचार हुआ है.modi_rajnath_bjp_elections
राजस्थान में हालांकि अभी बहुत पिछडापन है और यहां कोई बडे सुधारवादी आंदोलन भी नहीं हुए हैं, किन्तु इलेक्ट्रानिक मीडिया के प्रसार, शिक्षा और जागृति बढने के साथ ही अब यहां कसमसाहट तो पैदा हुई है. दिल्ली का असर होने लगा है, हालांकि लोगों में अब भी यह संदेह है कि ‘आप’ लम्बे समय तक चल पाएगी क्या? लेकिन यह संदेह भी जल्दी दूर हो सकता है. यदि भाजपा सरकार ने राहत के लिए कुछ नहीं किया और जन अपेक्षाओं के अनुरूप ठोस कदम नहीं उठाए तो यहां भी लोगों की कसमसाहट के आंदोलन में परिणत होने में ज्यादा देर नहीं लगेगी.
सबसे पहले राजस्थान में भी भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए एक लोकायुक्त की नियुक्ति करे, जितने भी संविदाकर्मी शोषण का शिकार हैं, उन्हें स्थाई किया जाए. ‘राजस्थान स्टेट एड्स बचाव एवं नियंत्रण सोसायटी’ को चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग की ‘एड्स बचाव एवं नियंत्रण इकाई’ में तब्दील किया जाए, एनआरएचएम को भी विभाग का ही एक ग्रामीण स्वास्थ्य अनुभाग बनाया जाए और इनमें काम कर रहे संविदाकर्मियों को उन्हीं पदों पर तत्काल प्रभाव से स्थाई किया जाए. इन विभागों में भयंकर भ्रष्टाचार है, उस पर अंकुश के कडे कदम उठाए जाएं. विश्वविद्यालयों में कार्यरत संविदाकर्मियों को तुरंत प्रभाव से स्थाई किया जाए. मनरेगा में कार्यरत कर्मियों को पंचायतीराज के तहत स्थाई किया जाए. इच्छाशक्ति हो तो यह सबकुछ सप्ताह दस दिन में हो सकता है.
बिजली की दरें भी यहां आधी हो सकती हैं, यदि विद्युत निगमों में व्याप्त भ्रष्टाचार पर पूरी तरह अंकुश लग जाए. बिजली के मीटरों में, ट्रांसफर्मर्स में और अन्य जगहों, छीजत आदि में बहुत घेटाले हैं.
माइनिंग में व्याप्त भयंकर भ्रष्टाचार रूके तो सरकार को यहां से प्राप्त होने वाला राजस्व पचास गुना बढ सकता है. यदि सरकार को मालूम न हो तो हम बता सकते हैं कि किस प्रकार और कहां-कहां गैरकानूनी, अनियंत्रित और अवैज्ञानिक खनन हो रहा है और माइनिंग माफिया किस प्रकार धरती मां को लूट रहा है, सरकार को कहां-कहां चूना लग रहा है और इस माफिया में कौन-कौन राजनेता व अफसर मिले हुए हैं? इस आय वृद्धि से राजस्थान समृद्ध बन सकता है, तेल रिफाइनरी से यह समृद्धि और बढ़ सकती है, इस आधार पर यहां शराबबंदी हो सकती है. आबकारी में होनेवाली आय कम होगी तो उसका राज्य की अर्थ व्यवस्था पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ेगा.
जलदाय विभाग अकाल हो या सुकाल चौबीसों घण्टे न्यूनतम दर पर जल आपूर्ति कर सकता है, जबकि अभी 1986 से उदयपुर जैसे शहर में भी पांतरे पानी दिया जा रहा है, योजनाओं में भारी कामचोरी और भ्रष्टाचार यहां है. पिछले 27 वर्षों में पानी के नाम पर करोडों रुपये पानी की तरह बहाए गए हैं और सारा बहाव नेताओं व अफसरों के घरों की ओर ही रहा है, मतलब की करोडों रुपयों का भ्रष्टाचार है. पानी के मीटरों में भी भारी भ्रष्टाचार हुआ है. बोझ तो आम आदमी पर ही है न !
केवल सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद लालबत्ती हटा देना या ‘आप’ के भय से सादगी का दिखावा कर लेना ही अब पर्याप्त नहीं है.
दिल्ली में ‘आप’ के कदमों की आहट से जो संदेश निकल रहे हैं, उन्हें भाजपा को गम्भीरता से लेना चाहिए. नरेन्द्र मोदी के कारण युवाओं में जो एक जोश जागा था, उसके दिशा बदलने और करवट बदलने के खतरे बढ गए हैं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.