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अभिरंजन कुमार की किताब “बचपन की पचपन कविताएं” का लोकार्पण..

By   /  February 2, 2014  /  No Comments

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नई दिल्ली. शुक्रवार 31 जनवरी की शाम हिन्दी बाल साहित्य के लिए एक ख़ास और कभी न भूलने वाली शाम बन गई, जब हिन्दी के वरिष्ठ लेखक और पत्रकार अभिरंजन कुमार की एक बेहद ख़ूबसूरत किताब “बचपन की पचपन कविताएं” का लोकार्पण किया गया. लोकार्पण के लिए मशहूर समालोचक डॉक्टर विश्वनाथ त्रिपाठी के साथ ही जब हिन्दी बाल साहित्य के दिग्गजों प्रकाश मनु, बालस्वरूप राही, शेरजंग गर्ग, दिविक रमेश और रमेश तैलंग ने पुस्तक को अनरैप किया, तो समारोह में उपस्थित सभी लोगों की आंखें इस गौरव से चमक उठीं कि हिन्दी में भी अब बच्चों के लिए इतनी ख़ूबसूरत किताबें छपने लगी हैं. बच्चों की 55 कविताओं से लैस 84 पृष्ठों वाली इस हार्डबाउंड, सचित्र और रंगीन किताब को नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दरियागंज, दिल्ली ने प्रकाशित किया है.

book release image
वरिष्ठ समालोचक डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि अभिरंजन ने बड़ों के लिए भी उम्दा कविताएं लिखी हैं, लेकिन बच्चों के लिए लिखी उनकी कविताएं बेमिसाल हैं. उनकी कविताओं में एक घरेलूपन है. उनमें घर-परिवार, नाते-रिश्तों और अपनी मिट्टी की ख़ुशबू भरी पड़ी है. मसलन- “भैया अपना मोर सरीखा, बहना ज्यों गौरैया. एक झूमता रहता दिन भर, दूजी है चहचहिया. पापा अपने धूप सरीखे, मम्मी छाया जैसी. एक नरम हैं, दूजी नम हैं, तभी हुई मैं ऐसी.“ डॉ. त्रिपाठी ने कहा कि अभिरंजन की अलग-अलग मसलों की गहन जानकारी और पत्रकारिता में उनके अनुभव ने भी उनकी किताब को समृद्ध किया है. उन्होंने मुख्य धारा के लेखकों-आलोचकों द्वारा बाल साहित्य की उपेक्षा पर तंज कसते हुए कहा कि बच्चों की कविताएं कम से कम समझ में तो आती हैं. आजकल बड़ों के लिए लिखी कविताएं तो समझ में ही नहीं आतीं.

डॉ. प्रकाश मनु ने कहा कि नंदन के संपादन से लंबे समय तक जुड़े रहने की वजह से कविताएं पढ़ना उनका काम ही रहा है और अब तक उन्होंने अनगिनत कविताएं पढ़ी हैं, लेकिन अभिरंजन की कई कविताओं के बारे में वे कह सकते हैं कि ऐसी ख़ूबसूरत कविताएं उन्होंने पहले कभी नहीं पढ़ीं. इस संदर्भ में उन्होंने “एक पपीता” शीर्षक कविता का ख़ास तौर से ज़िक्र किया- “छूट गया डंठल का फीता, टपका नीचे एक पपीता…” प्रकाश मनु ने कहा कि कवि अपने प्रयोगों के प्रति आश्वस्त हैं और पूरे संकलन में उनमें ग़ज़ब का आत्मविश्वास देखा जा सकता है. इस संदर्भ में उन्होंने संकलन की आखिरी कविता “पचपन में बचपन” की आख़िरी पंक्तियों का ज़िक्र किया- “चलो सुना दें दादाजी को ये कविताएं पचपन. शायद पुनः लौट ही आए उनका खोया बचपन.“ उन्होंने कहा कि यह किताब पढ़कर सचमुच ही बड़ों का भी बचपन लौट आएगा.

“बचपन की पचपन कविताएं” की प्रस्तुति और छपाई से गदगद होकर मशहूर कवि शेरजंग गर्ग ने कहा कि अगर हिन्दी में ऐसी किताबें छपने लगें, तो माहौल बदल जाएगा. फिर कोई नहीं कहेगा कि हिन्दी में अच्छा बाल साहित्य नहीं लिखा जा रहा. उन्होंने पुराने संस्मरण सुनाते हुए कहा कि अभिरंजन को वे तब से जानते हैं, जब वे ख़ुद एक बच्चे थे और बालकन जी बारी इंटरनेशनल की गोष्ठियों में आया करते थे. अपनी छोटी उमर के बावजूद तब भी वे एक एक्टिविस्ट जैसे थे, भीड़ में भी अलग नज़र आते थे, ग़लत का पुरज़ोर प्रतिरोध करते थे और उनकी बातें सोचने को मजबूर करती थीं. उन्होंने कहा कि “बचपन की पचपन कविताएं” भी किताबों की भीड़ में अलग और बेहतर है.

मशहूर बाल साहित्यकार डॉ. बालस्वरूप राही ने कहा कि समूची “बचपन की पचपन कविताएं” वे एक सांस में पढ़ गए, जबकि किसी भी किताब को एक सांस में पढ़ने का उनका अभ्यास नहीं रहा है. इस किताब की सारी कविताएं उन्हें इतनी रोचक और सार्थक लगीं कि उन्हें अपने साथ बहा ले गईं. उन्होंने कहा कि अभिरंजन ने हिन्दी बाल कविता को हमारी पीढ़ी से आगे ले जाने का काम किया है.

Cover-Bachpan Kee Pachpan Kavitayen अभिरंजन कुमार की प्रयोगधर्मिता की तारीफ़ करते हुए वरिष्ठ कवि दिविक रमेश ने उन्हें अपने मकसद में कामयाब बताया और कहा कि उनकी कई कविताएं बड़ों को भी सोचने पर मजबूर करती हैं. इस संदर्भ में उन्होंने “पापा ये क्या हुआ मुझे” और “सुनो-सुनो सरकार जी” शीर्षक कविताओं का ख़ास तौर से ज़िक्र किया- मैं इक छोटा सा बच्चा हूं, सुनो-सुनो सरकार जी. मेरी भी कुछ मांगें हैं, क्या कर सकते स्वीकार जी? गांवों में हम कितना खाते लीची, जामुन, आम. कितनी मस्ती करते हर पल सुबह-दोपहर-शाम. दे देते क्यों नहीं यहीं पर पापा को रोज़गार जी?” उन्होंने कहा कि आम तौर पर विज्ञान कविताएं बोझिल हो जाती हैं, लेकिन अभिरंजन की विज्ञान कविताएं भी बेहद सहज हैं और रोचक हैं. इस संदर्भ में उन्होंने ई-मेल कविता की कुछ पंक्तियों को उद्धृत किया- “बर्मा में बहना है बैठी, भाई है भूटान में. चाची बसी चीन में, देखो मैं हूं हिन्दुस्तान में. पेरिस में है पप्पू रहता, लंदन में है लल्लू. और रूस में रूबी रहती, कोलंबो में कल्लू.”

साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित बाल कवि रमेश तैलंग ने कहा कि “बचपन की पचपन कविताएं” में अभिरंजन कुमार अपने पिछले संग्रह “मीठी-सी मुस्कान दो” से कई कदम आगे बढ़े हैं. उन्होंने कहा कि अभिरंजन की कविताएं बिल्कुल अपने तेवर की, सहज, सरल, रोचक और बच्चों के दिल में उतर जाने वाली कविताएं हैं. उन्होंने बच्चों के साहित्य को दोयम दर्जे का माने जाने पर रोष जताया और कहा कि इसे मुख्यधारा के साहित्य में प्रतिष्ठा मिलनी ही चाहिए.

अभिरंजन कुमार ने अपनी इस किताब को देश के वंचित और बेसहारा बच्चों के नाम समर्पित करते हुए कहा कि इस किताब की आधी रॉयल्टी वे ऐसे ही बच्चों के लिए ख़र्च करेंगे. इस मौके पर उन्होंने बच्चों की बेहतरी के लिए “दुलार” नाम की संस्था बनाने की भी घोषणा की. उन्होंने कहा कि देश के सभी बच्चे हमारे बच्चे हैं और हमारे रचनाकर्म की सार्थकता तभी है, जब इसका लाभ उन बच्चों तक भी पहुंचे, जिन तक किताबें भी नहीं पहुंच पाती हैं. “बचपन की पचपन कविताएं” के बारे में अभिरंजन कुमार ने कहा कि वे एक ऐसा संकलन तैयार करना चाहते थे, जिसे बच्चे और बड़े दोनों ही चाव से पढ़ सकें. कुछ कविताओं के अंश सुनाते हुए उन्होंने कहा कि इस लिहाज से कई कविताओं में उन्होंने ऐसे प्रयोग किए हैं, जो बच्चों को तो मज़ेदार लगेंगे ही, बड़ों को भी लुभाएंगे.

लोकार्पण समारोह का संचालन वरिष्ठ लेखक बलराम अग्रवाल ने किया. कार्यक्रम में लेखिका डॉ. पुष्पा राही, वरिष्ठ पत्रकार सतीश के सिंह, डॉ. शिवकुमार राय, उदय चंद्र सिंह, अभिषेक दुबे, मृगांक शेखर दुबे, अविनाश दास, अनुरंजन झा, राकेश त्रिपाठी, अमलेंदु उपाध्याय, अनुराग पुनेठा, हर्षवर्द्धन त्रिपाठी, उमेश चतुर्वेदी और शक्तिशरण सिंह समेत देश के कई दिग्गज रचनाकार और पत्रकार मौजूद थे.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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