/वोट ख़रीदने के लिए दंगे मत बेचिए..

वोट ख़रीदने के लिए दंगे मत बेचिए..

– क़मर वहीद नक़वी

ऐ मेरे वतन के लोगो, चुनाव आ गये हैं. हुँह! चुनाव क्या पहली बार आये हैं. वह तो आते ही रहते हैं. सही कहा आपने. चुनाव तो पाँच साल पहले भी आये थे, दस साल पहले भी आये थे, और पहले भी आये, पच्चीस साल पहले भी आये थे. लेकिन ऐ मेरे वतन के लोगो, इस बार के चुनाव में कुछ तो ख़ास है. ऐसा कुछ, जो पहले के किसी चुनाव में कभी नहीं रहा. वरना दो-दो दंगों की खड़ताल अचानक क्यों बजायी जाने लगी होती. एक दंगे को बारह साल बीत गये, दूसरे को तीस साल! खड़ताल आज बज रही है! तेरा दंगा मेरे दंगे से ज़्यादा गंदा था!

व्यंगचित्र: सुधीर गोस्वामी
व्यंगचित्र: सुधीर गोस्वामी

ये अपने देश की राजनीति है! बरसों पुराने प्रेतों को फिर से जगाया जा रहा है. घाव छीले जा रहे हैं. इसलिए नहीं कि किसी को कहीं मरहम लगाना है. इसलिए भी नहीं कि किसी को अपने किये पर वाक़ई कोई पछतावा हो! इसलिए भी नहीं कि किसी को रत्ती भर भी यह एहसास हो कि उन उजड़ी ज़िन्दगियों का क्या हुआ? इसलिए नहीं कि इतिहास के इन कलंकों से कोई लज्जित है और कोई उनको धोना चाहता है. राजनीति में शर्म के लिए कभी कोई जगह नहीं होती! वह पाँसों का खेल है. जब जैसे गोटी लाल होती हो, कर लो, चाहे यह किसी के ख़ून का लाल रंग ही क्यों न हो. और खिलाड़ी चाहे जो हो, खेल की चालें, तरकीबें, तिकड़में और तड़ी वही की वही रहती हैं! इसीलिए प्रेत जगाये जा रहे हैं. प्रेत जगेंगे तो वोट गिरेंगे. धड़ाधड़!

जनता महज़ वोट है. या वोट बैंक है. वह बीन की धुन पर डोलती रहती है. वैसे कभी-कभार वह ग़लती से डस भी लेती है. लेकिन मदारी के पास ज़हरमोहरा भी होता, जनता के काटे का इलाज वह कर लेता है. वह फिर बीन बजाने लगता है. जनता फिर डोलने लगती है. मन डोले मेरा तन डोले….मेरे दिल का गया क़रार रे….ये कौन बजाये बाँसुरिया….! और जब दिल बेक़रार हो तो होश किसे रहता है! बाँसुरी बजाओ, बीन बजाओ, खड़ताल बजाओ, जनता कहीं न कहीं तो डोलेगी, कहीं तो पटेगी, प्रेत जगाओ, जनता कहीं तो चिपटेगी!

पार्टियाँ वही हैं, नेता बदल गये हैं. समय के चक्र ने चाहे-अनचाहे युद्ध में दो चेहरों को आमने-सामने ला खड़ा किया है. पहले चेहरे दूसरे थे, इसलिए लड़ाई के हथियार भी दूसरे थे. वरना 1984 में सिखों के नरसंहार की बात बीजेपी ने ज़ोर-शोर से क्यों नहीं उठायी. नहीं उठायी. तब कुछ ही दिनों बाद काँग्रेस हाहाकारी बहुमत से जीत गयी थी. आज बेचारी बीजेपी रो-रो कर हलकान है, तीस साल पहले उसकी बोलती क्यों बन्द थी. कोई नहीं पूछता. और पंजाब धीरे-धीरे आतंकवाद के मुहाने पर क्यों जा पहुँचा था, पूरे देश में सिखों के ख़िलाफ़ नफ़रत धीरे-धीरे किसने और कैसे रोपी, ज़रा इतिहास को खंगालिए, उस समय के अख़बारों, पत्रिकाओं के पन्ने पलटिये, जवाब मिलने शुरू हो जायेंगे.

गुजरात में ‘मौत के सौदागर’ का जुमला बोल कर गच्चा खायी काँग्रेस ने बाद में वहाँ 2002 को परदे में रखना शुरू कर दिया था. अब अचानक 2014 में अचानक याद्दाश्त की घंटी घनघना उठी. क्यों? जवाब इतना कठिन है क्या कि यहाँ लिखना पड़े? इधर दिल्ली की राजनीति में एक नये खिलाड़ी ने परचम लहराया है. काँग्रेस और बीजेपी जब 2002 और 1984 को लेकर सींगे लड़ा रही थीं कि तभी ‘आप’ ने 1984 के लिए एक नयी एसआइटी बैठाने की तान छेड़ दी. राजनीति का ककहरा बड़ी जल्दी सीख लिया! होनहार बिरवान के होत चीकने पात! हालाँकि ‘आप’ वाले कहेंगे कि यह बात तो उन्होंने अपने चुनावी घोषणापत्र में कही थी, उसे ही पूरा किया है. कही होगी. बात बस मौक़े और ‘टाइमिंग’ की है!

अब ‘आप’ के इस बिरवे से पेड़ कैसा बनेगा, बनेगा भी या नहीं, यह अटकलपच्ची करने की फ़िलहाल जगह यहाँ नहीं है. लेकिन ‘आप’ की तान ने सुर ऐसा बिगाड़ा कि बाटला हाउस का जिन्न बन्द बोतल से बाहर आ गया. उधर, उत्तर प्रदेश पहले से ही मुज़फ़्फ़रनगर से चोटिल पड़ा है. ध्रुवीकरण का बिरवा रोपा जा चुका है. चुनाव में फ़सल काटने के लिए सब अपने-अपने हँसिया पर सान चढ़ाने में लगे हैं!

अब तक कोई विकास बेच रहा था, और विकास की बट्टी पर पिछड़ी जाति का लेबल भी छापे था, टी स्टाल के साथ इंडिया का आइडिया भी पकड़ा रहा था, कोई भ्रष्टाचार मिटाने के नौ-नौ हथियारों की दुकान सजाने में लगा था, कोई सब कुछ साफ़ करने के लिए झाड़ू चमका रहा था. लेकिन क्या पता, तमाम सलमा-सितारा जड़ी पैकिंग के बावजूद ग्राहक फँसे न फँसे, सो बीन-बाजे का इन्तज़ाम ज़रूरी है न. हमारे बचपन में सड़कों पर तमाशा दिखाने वाले मदारी अकसर मजमा लगाते थे, कभी बन्दर-बन्दरिया का नाच दिखाते, कभी साँप-नवेले की लड़ाई दिखाने का स्वाँग भरते, बनी बजती रहती, नाग महाराज बीन के आगे डोलते रहते, लम्बी-लम्बी ऐसी हाँकते कि सब चकित से सुनते रहते और जिस-जिसकी जेब में पैसे होते, वह ‘ज़हर मारने की बूटी’ या रातोंरात मालामाल बना देनेवाली ‘चमत्कारी सिद्ध अँगूठी’ ख़रीद कर ही लौटता. मदारी आते रहते, जाते रहते, उनकी कहानियाँ चलती रहतीं, उनका खोटा माल बिकता रहता, चमत्कार लालायित जनों की जेबों पर मदारीगण लगातार चमत्कार दिखा कर उनकी जेबें ख़ाली करते रहते, बार-बार.

चुनावों को देख कर हर बार वही मदारी याद आ जाते हैं. हर बार वही खेल. वही चमत्कारी अँगूठियाँ, जो किसी काम की नहीं होतीं—-ग़रीबी हटाओ; हर हाथ को काम, हर खेत को पानी; देश बचाओ आदि-आदि. लेकिन इस बार खेल ज़रा ज़्यादा ही संगीन लगता है. यह ज़हरमोहरा बेचने का खेल नहीं है, बल्कि यह ज़हर फैलाने का मामला लगने लगा है. वरना दंगों के प्रेतों का आह्वान न किया जाता. वोट ख़रीदने के लिए दंगे मत बेचिए!
(लोकमत समाचार, 1 फ़रवरी 2014 और राग देश.कॉम)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.