/संघ, विहिप, बजरंग दल, मोदी इत्यादि को खूब मेहनत कर लेने का है…

संघ, विहिप, बजरंग दल, मोदी इत्यादि को खूब मेहनत कर लेने का है…

-यशवंत सिंह||

संघ, विहिप, बजरंग दल, मोदी… सबको खूब मेहनत कर लेने का है… ऐसा मौका फिर न मिलेगा… कांग्रेस पस्त है… आम आदमी पार्टी शिशुवत है… बाकी ज्यादातर पार्टियां अवसरवादी हैं जो बड़ी पार्टी के रूप उभरने वाली पार्टी के गोद में बिछ बैठ जाएंगी… सो, हे भाजपाइयों… अभी नहीं तो कभी नहीं…. मौका भी है और दस्तूर भी … सबसे बड़ी पार्टी बन जाना… वरना कहीं के नहीं रहोगे… वैसे तो दिन इतने बुरे चल रहे हैं कि सबसे बड़ी पार्टी बनकर भी दिल्ली विधानसभा में न सत्ता पक्ष में बैठ पाए और न विपक्ष में… देखते हैं बड़ी वाली दिल्ली चुनाव में क्या होता है…sangh-modi हालांकि तुम्हारे मोदी ने अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा टहलाना शुरू कर दिया है… हवा देश भर में बन रही है, बनाई जा रही है… अभी नहीं तो कभी नहीं… या तो कांग्रेस साफ होगी या बीजेपी… तीसरी पार्टी एक को रिप्लेस करने की तरफ बढ़ रही है… अगले पांच सालों में एक बड़ी पोलिटिकल सर्जरी पूरी होगी… पूरा देश कांग्रेस से त्रस्त और उबा है.. जनविक्षोभ भाजपा के झोली में गिरने को तैयार है… पर राजनीति की जाने कैसी मार है कि ऐन मौके पर पार्टी की किस्मत बेकार है… डर है लोकसभा चुनाव के पहले ये ‘आप’ वाले छोटे बच्चे कहीं खिखियाते हुए हिहियाते घोड़े को नाथ न दें… लगाम हाथ में न ले लें…. सो, सावधान रहना…

बता रहा हूं… ये जो सवर्ण, परंपरावादी, एलीट, शहरी लोग हैं तुम्हारे समर्थक, इन दिनों बड़े भावुक हैं.. आंख नाक सब बहा रहे हैं मोदी को लाने के नाम पर… इनकी पीड़ा, इनकी लगन, इनकी मेहनत, इनका अभियान, इनका छल-प्रपंच देखकर मन भरा आ रहा है… कई बार खुद को अपराधी मानने लगता हूं कि इन बेचारों की फीलिंग क्यों नहीं मैं समझ रहा और क्यों नहीं मैं भी बेचारे मोदी को एक बार, बस एक बार के लिए पीएम बन जाने दे रहा… बाकी, अगर उन दलितों आदिवासियों अल्पसंख्यकों आदि की बात है तो वो कहां इतने विजिबल हैं… वो कहां इतने वोकल हैं.. वो कहां अपने घर परिवार जाति नाते रिश्तेदारी के हैं… सो इस बार छोड़ देते हैं उन्हें और मोदी बाबा दादा काका चाचा … जो भी कह लें. सब खांचे में वो फिट हैं… क्योंकि उनके लिए फिलहाल पीएम की कुर्सी जो हिट हैं… को चुन लेते हैं..

सो, हे भाजपाइयों, किसी को पता न चले कि मैं भी मन ही मन तुम्हारे साथ हूं… लेकिन इतना अब भी बताए दे रहा हूं कि ये बहुत बड़ा देश है और बड़ा भावुक भी है…. पूरी छोड़ आधे के लिए धावत है… पाव भर पाकर किलो भर की सरकार पकावत है… इस देश में सवर्णों, शहरियों, एलीटों के गठजोड़ ने सदियों तक राज किया है.. अब राजपाट की बारी उनकी है जो हम शहरियों, हम सवर्णों की दुनिया से बाहर रहे हैं…. सो, क्या पता, देश के काले, अभागे, बेचारे, नंगे, भूखे, पीड़ित, शोषित, उत्पीड़ित सब मिलकर कोई ड्रामा कर दें और मोदी भइया को कुर्सी न मिलने दें… हालांकि मोदी खुद को हर चश्मे हर फ्रेम में फिट कर चुके हैं.. चाय वाला भी, गरीब भी, पिछड़ा भी, विद्वान भी, विकासवादी भी… पर अंततः वे उसी सवर्ण ब्राह्णवादी परंपरा के प्रतीक हैं जिसकी गुलामी इस देश की बहुतायत जनता ने सदियों से की है….. इसलिए वो नहीं मानेंगे… वो तुम्हारी नजरों में करप्ट ही सही, अपना वोट उसी मुलायम या मायावती या केजरीवाल को दे देंगे जो उन्हें अपने दिल के करीब लगते हैं… अब क्या करें.. कोई शास्त्र वास्त्र तो पढ़ता नहीं और न ही किसी के पास वेद पुराण पढ़ने का वक्त है… भइया, अब तो आदमी अपना मान सम्मान और विकास तरक्की देखता है… भाजपा सत्ता में आए नहीं कि देश भर के लंठ ठाकुर, भ्रष्ट पंडित फिर राज करेंगे.. फिर दलितों पिछड़ों को लखेदेंगे, औकात बताएंगे.. इसलिए ना बाबा ना… भाजपा को आर्कवाइव में भेज दो… मोदी की मूर्ति लगाकर वेद के केवर पर चिपका दो… पर इनको वर्तमान में सत्ता मत दो… इन्हें फिर से खेलने खाने की छूट मत दो…. किस्मत का पहिया बदल ही रहा है, बदलेगा ही… लेकिन तभी जब परंपरावादी, ब्राह्मणवादी, सवर्ण मानसिकतावादी हाशिए पर रहें… सो, हे मेरे नाते रिश्तेदारों.. रोते हंसते मोदी नाम जपते भाइयों और बहिनों… आप सभी के अपार मेहनत को देखने के बाद भी मैं नहीं कहूंगा कि भाजपा सत्ता में आए और मोदी पीएम बने… अगर ये बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा वाली कहानी के तहत सत्ता पा ही गए तो हम जैसे ढेर सारे लोगों के लिए हिमालय में तपस्या के वास्ते जाने के दिन होंगे…
(यशवंत सिंह  की फेसबुक वाल से)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.