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खुदकुशी करने से अन्ना नहीं बन जाता कोई, फिर भी दिनेश की मौत है एक दुखद सच्चाई

By   /  September 5, 2011  /  No Comments

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– शिव नारायण शर्मा।।

दुनिया में कुछ अलग-अलग व्यक्तित्व के लोग रहते हैं एक व्यक्तित्व वह होता है जो भ्रष्ट तंत्र का उपयोग करके धन और रुतबे में अपने आप को ऊँचा उठाने की कोशिश करते हैं, ऐसे लोग समाज में अपने रुतबे की ज़्यादा परवाह करते हैं न कि अपनों कि, दूसरा व्यक्तित्व वह होता है जो किसी भी तरह से धन प्राप्ति में लगा रहता है, ऐसे लोग अपने पर ज़्यादा ध्यान देते हैं ना कि अपने परिवार पर, तीसरा व्यक्तित्व वह होता है जो अपने व अपने परिवार के पालन के लिये चोरी या आसामाजिक कार्य करता है और चौथा व्यक्तित्व वह होता है, जो अपने आदर्शों से कभी समझौता नहीं करता, भले ही उसकी वजह से उसकी आर्थिक स्थिती कितनी ही खराब क्यूँ न हो जाये, यह व्यक्तित्व अपने परिवार के लिये खुद की जान भी न्योछावर करने को तैयार रहता है।

ऐसे लोगों को समाज कदम-कदम पर लज्जित करता नज़र आता है, इस वजह से ऐसे लोग अपने आप को कर्ज के महा दलदल में फँसा लेते हैं और कर्जदार इनका भरपूर शोषण करते हैं व इनसे आठ से दस प्रतिशत तक ब्याज वसूलते हैं यहाँ तक कि सरकारी व्यवस्था के अनुसार बिना फायनेन्स का रजिस्ट्रेशन हुये बिना कोई व्यक्ति कर्ज नहीं दे सकता, फिर भी कर्जदारों ने रास्ता निकाला हुआ है, वह इन लोगों से फ्रंडली लोन के नाम पर मूल रकम का तीन से चार गुना लिखवा लेते हैं, वा बिना तारीख व राशि के ब्लैंक चेक पर हस्ताक्षर करवा कर रख लेते हैं| (इन साहूकारों का बाहुबलियों द्वारा इतना मजबूत दबाव होता है कि अच्छे खासे पढ़े लिखे लोग भी इनके चंगुल में फँसे रहते हैं) ऐसे लोग मौका पड़ने पर क्योंकि उनके आदर्श तो अच्छे हैं।

इसलिये वह यह सोचकर कि हम एक अच्छे मकसद के लिये अपने आप को न्यौछावर कर दें तो हो सकता है हमारे परिवार को कुछ फायदा पहुँच सके, मगर इन लोगों को अगर शहीद का दर्जा देते हुये कुछ मदद पहुँची, तो ऐसे अनगिनत लोग जो इस हालत में हैं, वे अपने परिवार की मदद हेतु इस तरह के कई कांड करते चले जायेंगे। इनमें से काफी लोग इस हालत में हैं, अगर उन्हें आसानी से कोई ऐसा हथियार उपलब्ध हो जाए जिससे वह आसानी से अपने व अपने परिवार को बिना दर्द दिये मौत के हवाले कर लेंगे और इस समाज की रोज-रोज की जिल्लत से निजात पा लेंगे, वो भला हो इस कानून का कि ऐसे हथियार सिर्फ भ्रष्टाचारी व अपराधी लोगों को ही उपलब्ध हो पाते हैं अन्यथा ऐसे लोगों की आत्महत्या की कतार लग गई होती।

हमारा यह नारा कि “मैं अन्ना हूँ” तभी कारगर हो सकता है या आप अन्ना तभी बन सकते हैं जब आप अन्ना के इन पदचिन्हों पर चलें जिस पर वे चलते हैं। जैसे अहिंसात्मक तरीके से किसी भी अन्याय का विरोध करना, समाज की भलाई के लिये काम करना, जिसमें गाँवों की उस दुर्दशा का भी सुधार हो जो गाँव वाले खुद उचित मार्गदर्शन (अन्ना के समर्थक) पर अपने क्षेत्र को उन्नत स्थिति में पहुँचाएं (पाठशाला, जमीन को उपजाऊ करना, पानी का शुद्धिकरण, क्षेत्र को बीमारी से मुक्त कराना आदि)।

हम अगर अन्ना जैसा बनना चाहते हैं, तो उनके मार्गदर्शन का उपयोग करते हुए जैसे कि अन्ना जी कहते हैं कि अपना पेट भरा तो क्या कर लिया, काम ऐसा करो कि वे जिन्हें एक वक्त का भोजन भी प्राप्त करना मुश्किल हो जाता है, उनको इस काबिल बनाओ कि वे इमानदारी से मेहनत करते हुये अपना पेट भर सकें (जैसे अगर वे शिक्षित नहीं हैं तो उन्हें शिक्षित करने के साधन उपलब्ध करवायें) इस बात पर भी ध्यान रखें कि कोई उनका शोषण न कर रहा हो, उनको इस तरह शिक्षित करो कि वे गलत आचरण से अपने आप को दूर रखें, यही अन्ना जी की सबसे बड़ी सफलता होगी और सबसे पहले अपने क्षेत्र के कर्जदारों को चिन्हित करो जो शोषण करने वाले साहूकारों के पंजे में फँसे हुए हों और उचित मार्गदर्शन देते हुए आवश्यक तरीके से कार्रवाई करवाओ जिससे इस तरह के शोषण करने वाले साहूकार को कानून का भय प्राप्त हो व कर्जदार अपने आप को अकेला न समझे और इन लोगों का भरपूर विरोध कर सकें।

कई जगह ऐसा भी नजर आयेगा कि यह कर्जदार कर्ज के बोझ तले तनाव में रहते हुये दारु वगैरह पी कर खुद के घर में हंगामा तो करते हैं, मगर दिल से जरुर मानते हैं कि वे गलत कर रहे हैं| ऐसी जगह अन्ना समर्थक अपनी काबलियत का परिचय दें और (जैसा कि हम जानते है कि जिस महिला के हाथ में घर की बागदोड रहती है, वह अपने परिवार को बहुत अच्छे से संभालती है) ऐसी स्थिति में उस परिवार की बागडोड महिला के हाथ में रखवाते हुये उचित मदद करो| जिससे आप के द्वारा किये गये कार्य की सफलता का % बढ जायेगा| हम इन परिस्थितियों से गुजरते हुये कुछ भी व्यक्तियों की अगर जान बचा सकें व देश की मुख्यधारा में जोडने में सफल रहें, तो हमारे अन्ना जी को लगेगा कि उनकी तपस्या सफल हुई|
जय हिन्द
(यह लेख कमेंट के जरिए प्राप्त हुआ है)

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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