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भारत, भाजपा और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद- भाग 7

-दीप पाठक||

संजय गांधी और इंदिरा के अवसान के बाद संघ ने भारत में अंधक्षेत्रवादी राजनीतिक गठजोड़ शुरु किये पंजाब में अकाली दल और महाराष्ट्र में शिव सेना.कहां रियासतें खतम कर तो पूरे राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोने वाले सरदार पटेल को भजते थे कहां संघीय गणराज्य के ढ़ांचे के भीतर क्षुद्र क्षेत्रियता को हवा देने का काम तेज करने लगे.RSS+cadre

जे पी आंदोलन के भीतर जाकर संघ ने इस आंदोलन की भारतीय उत्तरपट्टी की राष्ट्रवादी धारा में क्षेत्रियता की लघु फूटें डालीं.संघ ने इस आंदोलन से जुड़कर न सिर्फ इसकी एकता खंडित की बल्कि अपनी अंधराष्ट्रवादी विचारधारा के लिए आउट सोर्सिंग जुटाई.

1925 से 80 के दशक तक भी यहां की उत्तरपट्टी में संघ राजनीतिक ताकत नहीं था ये बात दीगर थी कि हिंदू तीज त्यौहारों पंडितों, बनियों में इनकी स्वीकार्यता थी पहली बार जे पी जन उभार में घुसकर SC/ST व दलितों के आक्रोश को मुस्लिम विरोध की तरफ मोड़ने की लीचड़ साजिश संघ ने की.हालांकि रोटी बेटी मंदिर प्रवेश को लेकर संघी दलितों से नाक भौं सिकोड़ते रहे.

84 के सिख विरोधी दंगों के बाद सिखों की सांप्रदायिक राजनीति में मरहम लगाने का मौका ताड़कर संघ ने सिखों के धार्मिक आधार में पैठ बनायी जो आज तक सहयोगी अकाली दल के रुप में आज भी कायम है.

एक बार किसी ने पूछा “क्या करता है जहर खून में मिलने के बाद?” तो जबाब मिला-“फिर जहर क्या करता है? फिर तो जो करता है खून ही करता है.”
संघ हीमो टाक्सिन जहर है जो राष्ट्र की धमनियों में घुस कर दिल की धड़कन रोक दे साथ ही ये न्यूरोटाक्सिन जहर भी है जो मानवीय संवेदनाओं को कुंद कर किसी भी जीवित जागृत इंसान को खूनी बैताल बना देता है.
(शेष आगे)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.