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पत्रकारिता की सीढियां..

By   /  February 8, 2014  /  No Comments

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-शम्भूनाथ शुक्ल।।
(जब से अखबार से रिटायर हुआ हूं लोग समझते हैं कि मैं तो निठल्ला बैठा ही हूं इसलिए जिसे देखो आग्रह किए जा रहा है कि आप अपने पत्रकारिता के संस्मरण लिखिए। जैसे पत्रकार को अपनी कोई राजनीतिक विचारधारा रखने का हक ही नहीं है। क्योंकि जैसे ही मैं कोई राजनीतिक पोस्ट डालता हूं असंख्य लोग कोसना शुरू कर देते हैं। चलिए अब अपने राजनीतिक विचार अपने मन में ही रखता हूं और पत्रकारिता के अपने अनुभव ही साझा कर रहा हूं। लेकिन धैर्य बरतिएगा क्योंकि ये संस्मरण केवल एक ही पोस्ट के जरिए तो लिखे नहीं जा सकते।)1781007_775399852473594_2025254014_o
“जब से विजुअल मीडिया का दौर आया है पत्रकारिता एक ग्लैमरस प्रोफेशन बन गया है। पर हमारे समय में दिनमान ही पत्रकारिता का आदर्श हुआ करता था और रघुवीर सहाय हमारे रोल माडल। लेकिन उनकी दिक्कत यह थी कि वे साहित्यकार थे और पत्रकारिता उनके लिए दूसरे दरजे की विधा थी। पर दिनमान वे पूरी पत्रकारीय ईमानदारी से निकालते थे। हमारे घर दिनमान तब से आ रहा था जब उसके संपादक सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय थे। लेकिन जब मैने उसे पढऩा शुरू किया तो संपादक रघुवीर सहाय हो गए थे। दिनमान हम पढ़ते जरूर थे। उसके तीखे तेवर, हर विषय पर सामयिक टिप्पणी और उसके शीर्षक। सदस (सर्वेश्वरदयाल सक्सेना) का नियमित कालम तथा श्याम लाल शर्मा, शुक्ला रुद्र, सुषमा पाराशर, त्रिलोक दीप और जवाहर लाल कौल के लेख और रपटें। पर बनवारी जी ने जब इस पत्रिका में कदम रखा तो इसके तेवर ही बदल गए और यह एक विशुद्ध रूप से सामयिक पत्रिका बन गई। बनवारी जी के लिखने की स्टाइल ही अलग थी। चाहे वह नेपाल के चुनाव की रपटें हों या दिल्ली में कुतुब मीनार की सीढिय़ों से फिसल कर ४२ बच्चों की मौत की रपट। अब तो शायद लोगों को पता भी नहीं होगा कि आज से ३२ साल पहले तक कुतुब मीनार पर चढ़ा भी जा सकता था। लेकिन १९८२ में एक भयानक दुर्घटना घटी। कुतुब मीनार देखने आई छात्राओं की एक भीड़ भरभराती हुई तीसरी मंजिल से नीचे आ गिरी, उसमें ४२ छात्राएं मरीं। बनवारी की इस रपट की हेडिंग थी घिसी हुई सीढिय़ों पर मौत। मुझे यह शीर्षक इतना आकर्षक और रपट इतनी कारुणिक लगी कि मैं सिर्फ बनवारी जी से मिलने के लिए साढ़े चार सौ किमी की यात्रा तय कर कानपुर से दिल्ली आ गया। चूंकि मैं हावड़ा-दिल्ली (इलेवन अप) एक्सप्रेस पकड़कर दिल्ली आया था और वह ट्रेन सुबह पांच बजे ही पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन आ जाया करती थी इसलिए पूरे तीन घंटे तो प्लेटफार्म पर ही वाक कर काटे और आठ बजे के आसपास वहां से पैदल ही दिनमान के दफ्तर के लिए निकल पड़ा। ठीक नौ बजे १० दरियागंज स्थित टाइम्स बिल्डिंग में पहुंच गया। पता लगा कि बनवारी जी तो दस के बाद आएंगे। लेकिन वहां मौजूद सक्सेना नामके चपरासी ने चाय पिलाई और समोसे लाकर खिलाए। मैं उसकी सज्जनता से गदगद था। उसने बताया कि टाइम्स से उसे १२ सौ रुपये महीने पगार मिलती है जो मेरी पगार से ड्यौढ़ी थी जबकि मैं कानपुर में दैनिक जागरण में उप संपादक था। खैर करीब सवा दस बजे बनवारी जी आए। मैं उनसे जाकर मिला। वे हल्की लाइनों वाला कुरता तथा एकदम झकाझक सफेद पायजामा धारण किए हुए एक बेहद सौम्य और उत्साही पत्रकार लगे। पर यह भी महसूस हुआ कि शायद पत्रिकाओं के संपादक कुछ हौवा टाइप के हुआ करते थे। क्योंकि बनवारी जी मुझसे बात करते समय कुछ सहमे से लगे और बार-बार संपादक रघुवीर सहाय के केबिन की तरफ देख लिया करते थे। ऐसा लग रहा था कि अभी एक दरवाजा खुलेगा और एक डरावना सा अधबूढ़ा संपादक निकलेगा। जो महान कवि होगा और महान चिंतक भी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ और केबिन खुला तो खाकी रंग की एक जींस नुमा पैंट पहने एक व्यक्ति निकला और लंबे-लंबे संगीतकार जैसे बालों वाले सदस की टेबल तक गया फिर उसने हाल पर नजर डाली मुझे भी देखा और लौट गया। बनवारी जी ने बताया कि वे रघुवीर जी थे। मेरी मिलने की बहुत इच्छा हुई लेकिन न तो बनवारी जी ने मेरी उनसे मुलाकात के लिए बहुत उत्कंठा जताई और न ही वे सज्जन हाल में ज्यादा देर तक रुके थे। इसलिए मन मारकर चला आया। दिल्ली में तब तक किसी को जानता नहीं था इसलिए नई दिल्ली स्टेशन गया। पता लगा कि गोमती जाने को तैयार है। टिकट लिया कुल बीस रुपये अस्सी पैसे का। और ट्रेन में जाकर बैठ गया। तब गोमती एक्सप्रेस नई-नई चली थी। और दिल्ली के बाद सीधे कानपुर आ कर ही रुकती थी। सामने वाली बर्थ पर जो मोहतरमा थीं वे कोई लखनऊ के नवाब परिवार से ताल्लुकात रखती थीं। जब भी वे अपना पानदान खोलतीं तो पूरा कोच उसकी गमकती खुशबू से भर जाता।”
(जारी)

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  • Published: 4 years ago on February 8, 2014
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  • Last Modified: February 8, 2014 @ 2:34 pm
  • Filed Under: मीडिया

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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