/भारत भाजपा और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद…

भारत भाजपा और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद…

-दीप पाठक||

भाग – आठ

संस्कृति के नाम पर उन्माद और नेता के नाम पर छिछोरे उन्मादी संघ की यही पूंजी है मोहल्ला स्तर से ब्लाक स्तर तक राज्य से राष्ट्रीय स्तर तक संघ भाजपा के लिए जो नेता चयन करता है वो या तो लचर तुक्कड़ लोकरंजक होते हैं या ठस आदेश पालक उन्मादी. बुद्धि विवेक रखने वाला संघ-भाजपा में नहीं होता. हां पढ़े लिखे डाक्टर, इंजीनियर, फौजी या अध्यापक हो सकते हैं. पढ़ा लिखा फासिस्ट आजकल संघ का थिंक टैंक (पढ़ें षड़यंत्रकारी ) है. टीवी अखबार में आपको यही चेहरा दिखता है.1339168976_hindu-sanghatan

आधी सदी के राज में कांग्रेस ने गुंडा ठेकेदार लाबी में अपनी पैठ बनायी जो एन चुनाव के वक्त वोट बटोर सकें तो इधर बीसेक साल से भाजपा ने भारतीय समाज के मध्यमवर्गीय कुंठित सवर्णों क्षत्रियों और क्रीमी लेयर दलितों या मुस्लिम विरोधी विष से ग्रसित दलितों को कदम ब कदम आगे बढ़ाकर सांगठनिक एवं संवैधानिक पदों पर बिठाया.

शाशक मुगलिया दौर के प्रति तो अपनी शाश्वत घृणा को ये यहां तक लाये हैं पर अंग्रेजी हकूमत के खारे चाटुकार एवं मुखबिर रहे संघ भारतीय हिंदू को अपना ठस आदेश पालक उन्मादी देखना चाहते हैं और अपने नस्ली अंधराष्ट्रवादी गुनाह में समूची जनता को सह अपराधी बनाना चाहते हैं. पर भारतीय संजीदा मानस कबीर बुद्ध जैन सांख्य और वैषेशिक दर्शन की समझ भी रखता है. इसलिए उत्तर भारत का सामंती समाज इनके लिए भले उर्वर भूमि हो पर भारतीय विविधता इनके गले की फांस है. इसलिए खंडित अभिशप्त और अतृप्त अधूरा रहने की हताशा दंगोँ में इनका पैशाचिक चेहरा सामने आ जाता है.

पिछले 25 सालों में इस देश में दलित चेतना में अचानक प्रत्यक्ष गुणगत बदलाव आया है कांशीराम मायावती परिघटना ने दलितों में हिंदू सवर्ण समाज और हिंदू धर्म के प्रति अपनी बेरुखी स्पष्ट कर दी वे बौद्धिज्म के प्रति अधिक रुचिकर भाव रखते हैं. सो दलित तबका संघ भाजपा से छिटक कर अलग हो गया.

भारतीय संस्कृति और भाजपा संघ का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद दोनों अलग अलग चीजें हैं विभिन्न मत मान्यताओं वाली भारतीय या हिंद की तहजीब अपना पूर्ण पल्लव रखते हुए दूसरी मान्यता को स्वीकारती है पर संघ चालाकी से एक राष्ट्र एक अखंड देश राष्ट्रभक्ति की लाठी से सबको अंधे नफरत और हिंसा के बाड़े मे धकेलना चाहता है. हिंदीभाषी क्षेत्र में वो कामयाब भी दिखते हैं पर इस छद्म राष्ट्रवाद को भारतीय जन मानस का बड़ा हिस्सा नकार देता है खारिज कर देता है.

हिटलरी रायनय के अंतिम दांव रिबनट्राप, हिमलर,गोयेबल्स जैसे प्रचार मंत्रियों का छद्मी घटाटोप आखिरकार जर्मनी के लिए मित्र राष्ट्रों सोवियत और अमरीका की सामूहिक नफरत लेकर आया संघ की वैसी हैसियत तो नहीं पर जैसा कि गृहमंत्री चिदंबरम ने कहा था कि” सेना व पुलिस में संघी घुसपैठ है” ये चिंता की बात है. “

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.