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अब गरीब की गर्दन मरोड़ने का अभियान…

-मदन मोदी||
राजस्थान में ऐतिहासिक प्रचण्ड बहुमत से आई भाजपा सरकार अब गरीबों की गर्दन मरोडने का कार्यक्रम बना रही है, क्योंकि अब पांच साल उसे आम आदमी की कोई परवाह नहीं है. पिछली कांग्रेस नीत गहलोत सरकार ने कई लोक-कल्याणकारी योजनाएं प्रारम्भ की थी, इनमें से सरकारी अस्पतालों में सबके लिए मुफ्त जांच और मुफ्त दवाओं की योजनाएं तो ऐसी आदर्श योजनाएं थीं कि जिन्हें देशभर में लागू किया जा सकता था, क्योंकि इससे राज्य कोष पर कोई विशेष भार नहीं पड रहा था. उल्टे जो फर्जी मेडिकल बिल और जो दूसरे भ्रष्ट धंधे हो रहे थे वे बंद हो गए थे, डॉक्टरों की दवा लिखने में होने वाली कमीशनखोरी रुक गई थी. लेकिन, यह सब भाजपा सरकार को रास नहीं आ रहा है, क्योंकि डॉक्टर चाहते हैं कि उनकी कमीशनखोरी और फर्जी बिलों का धंधा फिर शुरू हो तो वे नेताओं की भी मुट्ठी गरम कर सकते हैं, बाकी चंदा दे पाना मुश्किल होगा.vbk-Vasundhra_1405945f

गहलोत सरकार द्वारा शुरू की गई कल्याणकारी योजनाओं की समीक्षा के दौरान भाजपा नेताओं ने यह माना है कि “जनता इन योजनाओं को पसंद कर रही होती तो भाजपा को इतना भारी जनादेश नहीं मिलता. इसलिए इन योजनाओं को बंद करने और इनमें कटौती करने से अब कोई फर्क पडने वाला नहीं है.” जबकि जनता ने भाजपा को वोट दिया है भ्रमित होकर. मंहगाई और भ्रष्टाचार के रोजमर्रा के किस्सों व नरेन्द्र मोदी के लोकलुभावन प्रचार व भाजपा के मीडिया मेनेजमेंट से राज्य की जनता भ्रमित हुई है.

विधानसभा चुनावों से वह नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने का सपना देख रही थी, ताकि सबकुछ ठीक हो जाए और कांग्रेस इस भ्रमित करने वाले इन्द्रजाल से जनता को बाहर नहीं ला पाई, जनता बुरी तरह नरेन्द्र मोदी से सम्मोहित थी.

भाजपा सरकार वृद्धावस्था पेंशन योजना, मुफ्त दवा व जांच योजना, मुफ्त पशुधन दवा योजना, छात्रों को तकनीकी सुविधाएं, बीपीएल को वस्त्र, वरिष्ठ नागरिकों को तीर्थाटन, कर्मचारियों के भत्तों और महिलाओं को बस किरायों में 30 फीसदी रियायत की योजनाओं को या तो बंद करना चाहती है या उनमें कटौती करना चाहती है. मनरेगा में भी अपने हाथ थोडे टाइट करना चाहती है, क्योंकि कारखानों के लिए मजदूर नहीं मिलते और मिलते हैं तो मजदूरी ज्यादा मांगते हैं. यह जनता में असंतोष तो पैदा करेगा, किन्तु वह अब पांच साल इस सरकार का कुछ नहीं बिगाड सकती.

दिल्ली में “आप” सरकार काम कर रही है, फिर भी भाजपा उसे निरंतर कोस रही है, जबकि राजस्थान में भाजपा सरकार उल्टी राह पर चलने की तैयारी कर रही है. जबकि करने को यहां बहुत कुछ है. यहां भी भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए एक लोकायुक्त की नियुक्ति करे, जितने भी संविदाकर्मी शोषण का शिकार हैं, उन्हें स्थाई किया जाए. ‘राजस्थान स्टेट एड्स बचाव एवं नियंत्रण सोसायटी’ को चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग की ‘एड्स बचाव एवं नियंत्रण इकाई’ में तब्दील किया जाए, एनआरएचएम को भी विभाग का ही एक ग्रामीण स्वास्थ्य अनुभाग बनाया जाए और इनमें काम कर रहे संविदाकर्मियों को उन्हीं पदों पर तत्काल प्रभाव से स्थाई किया जाए. इन विभागों में भयंकर भ्रष्टाचार है, उस पर अंकुश के कडे कदम उठाए जाएं. विश्वविद्यालयों में कार्यरत संविदाकर्मियों को तुरंत प्रभाव से स्थाई किया जाए. मनरेगा में कार्यरत कर्मियों को पंचायतीराज के तहत स्थाई किया जाए. इच्छाशक्ति हो तो यह सबकुछ सप्ताह दस दिन में हो सकता है.

बिजली की दरें भी यहां आधी हो सकती हैं, यदि विद्युत निगमों में व्याप्त भ्रष्टाचार पर पूरी तरह अंकुश लग जाए. बिजली के मीटरों में, ट्रांसफर्मर्स में और अन्य जगहों, छीजत आदि में बहुत घोटाले हैं.

माइनिंग में व्याप्त भयंकर भ्रष्टाचार रूके तो सरकार को यहां से प्राप्त होने वाला राजस्व पचास गुना बढ सकता है. यदि सरकार को मालूम न हो तो हम बता सकते हैं कि किस प्रकार और कहां-कहां गैरकानूनी, अनियंत्रित और अवैज्ञानिक खनन हो रहा है और माइनिंग माफिया किस प्रकार धरती मां को लूट रहा है, सरकार को कहां-कहां चूना लग रहा है और इस माफिया में कौन-कौन राजनेता व अफसर मिले हुए हैं? इस आय वृद्धि से राजस्थान समृद्ध बन सकता है, तेल रिफाइनरी से यह समृद्धि और बढ़ सकती है, इस आधार पर यहां शराबबंदी हो सकती है. आबकारी में होनेवाली आय कम होगी तो उसका राज्य की अर्थ व्यवस्था पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ेगा.

जलदाय विभाग अकाल हो या सुकाल चौबीसों घण्टे न्यूनतम दर पर जल आपूर्ति कर सकता है, जबकि अभी 1986 से उदयपुर जैसे शहर में भी पांतरे पानी दिया जा रहा है, योजनाओं में भारी कामचोरी और भ्रष्टाचार यहां है. पिछले 27 वर्षों में पानी के नाम पर करोडों रुपये पानी की तरह बहाए गए हैं और सारा बहाव नेताओं व अफसरों के घरों की ओर ही रहा है, मतलब की करोडों रुपयों का भ्रष्टाचार है. पानी के मीटरों में भी भारी भ्रष्टाचार हुआ है. बोझ तो आम आदमी पर ही है न ! लेकिन अब आम आदमी की परवाह किसे है. लोकसभा चुनावों से पहले ये हाल हैं तो बाद में और न जाने क्या होगा?

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.