/आज के कन्हैया को तो अहीरों ने मार डाला..

आज के कन्हैया को तो अहीरों ने मार डाला..

-भंवर मेघवंशी||

अपनी शूरवीरता   के लिये प्रसिद्ध चित्तौडगढ जिले के गंगरार थाना क्षैत्र के मण्डपिया गांव का 20 वर्षीय पप्पूलाल सालवी बचपन से ही अपने नाना कालूराम के साथ रह कर पला और बडा हुआ, घर में भजन सत्संग का वातावरण था, कबीर से लेकर निरंकारी तक निगुर्ण की अजस्त्र धारा बहती थी, पप्पू की वाणी का माधुर्य सबको मोह लेता था, सिर्फ 20 बरस उम्र लेकिन साधु संतों सा जीवन, सत्संगों में भजन और घर पर भी ज्ञान चर्चा,  2 वर्ष पूर्व उसने घर छोडकर अपने नाना के खेत में ही एक कुटिया बना ली, वही रहने लगा, एक वीतराग दरवेश  की भांति, अन्न आहार भी त्याग दिया, सिर्फ दूध और फल खाता, जवानी की दहलीज पर कदम रखता एक युवा संत, सुन्दर मनोहारी व्यक्तित्व  का धनी और कण्ठ में कोकिला सी आवाज, प्यार से लोग उसे पप्पू महाराज कहते और भजन गाने के लिये दूर-दूर तक सतसंIMG-20140209-WA009गों में आमंत्रित करते, इस युवा संत के विभिन्न समाजों में कई  शिष्य-शिष्याएं  भी बन गये थे, लेकिन पप्पू महाराज शायद जगत को मिथ्या मानने वाले हवाइ विचारों से ही अवगत था, उसे जगत में जाति के कड़वे सच का ज्ञान नहीं था कि कोइ भी दलित चाहे वह संत बने या साधु, राजा बने या महाराज, चपरासी बने या कलेक्टर, व्यवसायी बने या विदूषक, मजदूर बने या कलाकार, उसकी औकात बढती नहीं है, चार बात किताबी ज्ञान की दोहरा देने और मीठी आवाज में भजन गा देने मात्र से जाति का कलंक कहां मिटता है, इस देश में ? भगवा धारण कर लेने से एक दलित को कौन संत मान लेता है इस मुल्क में ?

IMG-20140209-WA008एक दलित जन्म से लेकर मरने तक सिर्फ और सिर्फ दलित ही रहता है, वह कितना भी प्रतिभावान क्यों ना हों, उसका कथित नीची जाति का होना, उसके लिये आजीवन अभिशाप होता है, क्योकि इस देश में जाति कभी भी पीछा नहीं छोडती है, जन्म से पहले और मरने के बाद तक जहां सारे कर्मकाण्ड जाति पर आधारित होते है, वहां पर दलित युवा संत पप्पू महाराज को कौन महाराज मानता ? आखिर था तो वह भी नीच जुलाहों का ही बच्चा ना ? जिसके पूर्वज कपडे बुन बुनकर बेचते थे, भले ही अब बुनकर, सूत्रकार, सालवी लिखने लगे हो लेकिन सवर्ण हिन्दुओं की नजर में तो वे नीच ही थे और नीच ही रहेगें, भले ही सरकार उन्हे कितना ही ऊंचा उठाये, समाज उन्हे कभी ऊंचा नहीं उठने देगा. तो इन पप्पू महाराज की खेत की पडौसन थी एक अहीर युवती, पप्पू महाराज अगर 20 के थे तो यह लडकी है 18-19 की, बचपन में शादी हो गइ थी, पति से खट-पट हुई  और रूठ कर पीहर आ बसी वापस, खेत पर काम से फुर्सत मिलती तो पप्पू महाराज की कुटिया में और भक्तों के साथ सुस्ताने चली आती थी, एक संत था तो दसरी सतायी  हुई, दोनों ही इस जगत से खफा, कब गुरू शिष्य बने, किसी को क्या मालूम ? कई  और चेले थे, वैसे वो भी थी, पर नारी का ह्रदय गुरू के प्रति भी प्रेम से सरोबार ही था, नजदीकियां इतनी कि गांव के बहुसंख्यक एवं प्रभावशाली  अहीरों को चुभने लगी, पहले तो चेतावनी दी गयी पर बात बनी नहीं, आखिर किसी नीच जाति के एक छोकरे की चेली बन जाये अहीरों की लडकी, कितनी शर्म की बात थी यह ?IMG-20140209-WA003

हालात ऐसे विकट हुए कि संत महाराज को गांव छोडना पडा, ननिहाल का घर छोड पप्पू महाराज प्रवास को निकल गये, तीन दिन बाद शिष्या भी घर से गायब हो गयी, महाराज के नाना कालुलाल सालवी के घर आ धमके अहीर लोग, बोले – तुम्हारा पप्पूलाल और हमारी लडकी दोनों कहीं चले गये है . हमारे टुकडों पर पलने वाले नीचों, तुम्हारी यह हिम्मत हो गइ कि तुम्हारे लौण्डे हमारी लडकियों को भगा ले जाये, हम उस हरामजादे को चारों तरफ ढूंढ रहे है, जैसे ही मिलेगा, उसके शरीर  के टुकडे -टुकडे कर देगें . अहीरन  के   काका  डालू राम अहीर ने तो सरेआम धमकी दी कि-चाहे मुझे जेल ही हो जाये, पर तुम्हारा तो बीज तक नष्ट कर दूगां. घबरा गये महाराज के मण्डपिया के दलित सालवी, उन्होनें हाथ पांव जोडे और कहां कि अगर हमारे लडके ने गलती की है तो हम सजा देगें उसे, ढूंढेगें, वापस लायेगें, पर अहीर तो मरने-मारने पर आमादा थे, वे पप्पू के नाना कालूलाल से पप्पू का फोटो तथा मोबाइल नं. 8094836138 लिखवाकर ले गये. इस बीच गांव में शांति रही, ना तो अहीरों ने पप्पू महाराज की कोइ जानकारी ली और ना ही कोई  पूछताछ की, नारायण अहीर जो कि गांव का ही निवासी है, उसने जरूर पप्पू के ननिहाल के घर आकर कहा कि तुम्हारा बच्चा 6 महीने तक नहीं आयेगा.

IMG-20140209-WA002कालूलाल को पप्पू का आखरी संदेश  भी यही मिला कि वह कहीं बाहर है और आइसक्रीम की लारियों पर काम करेगा, फिर लौट आयेगा, लेकिन गांव से गायब हुई  अहीर लडकी के बारे मे उसने कुछ भी नहीं बताया, अब महाराज की कुटिया खाली थी, ना गुरू था और ना ही चेली, अन्य शिष्य भी आते ना थे, सब कुछ पूर्ववत सामान्य हालातों में चल रहा था कि 11 जनवरी 2014 की रात करीब 12 बजे मण्डपिया के ही निवासी उदयलाल सालवी ने पप्पू के नाना कालूलाल के घर आकर जानकारी दी की उसे अभी खबर मिली है कि मेडीखेड़ा फाटक के पास एक लाश  मिली है जिसे पुलिसवाले पप्पू की बता रहे है. यह सुनकर पप्पू के परिवार में तो कोहराम मच गया, पप्पू के नाना कालूलाल की हालत पागलों जैसी हो गयी , गांव से पप्पू का मामा हीरालाल, नंदलाल, किशन  तथा पप्पू के पैतृक गांव आकोडिया से उसके पिता लादूलाल, मोहनलाल तथा भंवरलाल सालवी आदि घटना स्थल पर पहुंचे, उन्होनें मौके पर देखा कि पप्पू की लाश  के टुकडे हो गये है, उसका वह हाथ गायब था जिस पर उसका नाम गुदा हुआ था, एक पैर कटा हुआ था, उसके गुप्तांग बेरहमी से काट डाले गये थे, शरीर  पर जगह – जगह चोटों के निशान थे, प्रथम दृष्टया ही मामला हत्या का प्रतीत हो रहा था, लेकिन वहां मौजूद चंदेरियां थाने की पुलिस ने बताया कि इसने ट्रेन के सामने कूदकर आत्महत्या कर ली है, घटना स्थल पर अहीरों की उक्त लडकी और पप्पू के फोटों तथा प्रेम पत्रनुमा सुसाइड नोट भी मिला है, पप्पू के परिजनों से पुलिस द्वारा खाली कागजों पर दस्तखत करवाने गये, पप्पू का शव लेकर उसके परिजन पैतक गांव आकोडिया पहुचें, जहां पर उसका अंतिम संस्कार कर दिया गया.

मृतक के मामा हीरालाल सालवी द्वारा एक अर्जी पुलिस अधीक्षक को देकर पप्पू की हत्या की आशंका जताते हुए जांच की मांग की गई लेकिन इस प्रार्थना पत्र को पुलिस द्वारा सुना ही नहीं गया, क्योकि अहीर लडकी का मामा पुलिस में मुलाजिम है, बताया जाता है कि वह कोई कार्यवाही नहीं होने दे रहा है, जब मामला ही दर्ज नहीं हुआ तो प्रार्थी हीरालाल ने न्यायालय की शरण ली, इस्तगासे के जरिये अब जाकर मामला दर्ज किया गया है, लेकिन इज्जत के नाम पर, जाति के नाम पर प्रेम करने वालों की हत्या कर देना भारतीय समाज में मर्दानगी का काम माना जाता है, खास तौर पर अगर लडका दलित हो और लडकी सवर्ण हो तो उनका प्रेम नाकाबिले बर्दाश्त बात है. आखिर कोई  दलित लड़का किसी सवर्ण लडकी को शिष्या बनाये या प्यार करे, यह दुनिया के सबसे सहिष्णु सवर्ण हिन्दू समाज को कैसे सहन हो सकता है ?

वैलेन्टाइन डे का बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे इस देश  के लोगों से मुझे सिर्फ इतना सा कहना है कि प्रेम के देवता कृष्ण जो कि खुद एक अहीर थे, उसी के वंशज होने का दम भरने वाले अहीरों ने आज के इस कन्हैया को अपने ही हाथों से पूरी बेरहमी से मार डाला है, और अब कोई  कार्यवाही नहीं होने दे रहे है. अब सिर्फ सवाल ही सवाल है, जिनका कोई  जवाब नहीं है सब तरफ अजीब सी खामोशी  है, एक सर्द सा सन्नाटा है और मरघट की डरावनी शांति फैल रही है, क्योकि हर युग में प्रेम करने की सजा सिर्फ मौत होती है, चाहे वह कबीलाई  तालिबान के हाथों हो या जाति, गौत्र की खांप पंचायतों के द्वारा, प्रेमियों को तो मरना ही है ताकि प्रेम जिन्दा रह सके.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.