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उत्तराखंड के किसानों को सिंचाई सुविधा मिलनी चाहिए…

By   /  February 12, 2014  /  No Comments

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-दीप पाठक||

ठंडी जलवायु भी और समतापी गुनगुनी गरम घाटियां भी उत्तराखंड को जलवायु का एक निराला क्षेत्र बनातीं हैं उपजाउ मिट्टी जिसमें खनिज और आक्सीजन की बहुतायत है. हर संवार कर बोये बीज को पोषित पल्लवित कर देतीं है. उंची धारों पर नदी का पानी पहुंचा दिया जाये, जैसा कि कुछेक जगहों अल्मोड़ा पिथौरागड़ पौड़ी टिहरी में किया गया है. शक्तिशाली विद्युत मोटरों से उठाकर उंचाई पर पहुंचा दिया जाये तो ये छोटे पुश्ते, हांगे-फांगे (सीढ़ी नुमा खेत) ऐसी झक्क फसल दालें फल सब्जियां उगलते हैं कि मन हिलोरें लेता है पहाड़ी कामगार किसान जब सूखे खेतों में बारिश के भरोसे इतनी मेहनत करता है, अगर पानी का आधार मिल जाये तो वो क्या नहीँ कर देगा?farmer

पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा ने नारा दिया- “धार ऐंच पाणीं धार पे डाला, बिजली बणांवा खाला खाला” को समग्रता प्रदान करनी है तो जब तक जंगल बांज खिर्सू उतीस के पेड़ों से आच्छादित करना है, चीड़ को हटाना है तो किसान को नीचे नदी का पानी उठाकर उपर देना होगा आखिर इतनी बड़ी बिजली कंपनियां उत्तराखंड को उजाड़कर बिजली बना रहीं हैं तो इनको तयशुदा बिजली का एक हिस्सा किसानों के सिंचाई प्रबंधन के लिए देना चाहिए.

सब कुछ किया जा सकता है पर करने की नीयत होनी चाहिए जहां बंदर और सूअर खेती उजाड़ करते हैं वहां पहाड़ी किसान अदरख बोते हैं अदरख को ना बंदर खाता है ना सूअर उजाड़ता है और अच्छी नकदी फसल है. जंगलों में सूकरों बंदरों के लिए कुछ रहा नहीं तो वे आबादी मे ही आयेंगे. अगर उत्तराखंड की वन पंचायत और वन संरक्षण और प्रबंधन महिलाओं के हाथ में दिया जाय तो वनों का संरक्षण और दोहन वैज्ञानिक विधि से होगा जंगल में धास चारे के लिए जाती महिलाऐं “न काट लछिमा बांजा न काटा” जैसे शिक्षाप्रद गीतों से वनों के संरक्षण और घास चारे के संग्रहण दोनों को समझतीं हैं.

वन विभाग ने बेशक वनों को बचाया है पर विवेकहीन तरीके से दोहन भी करवाया है जब वन उपज निकासी के पट्टे दिये जाते हैं तो ऐसी नोच खसोट होती है कि पूछो मत कोई भी समझदार गृहणीं जब भी गाय भैंस दुहती है तो बछड़े पड़िया के लिए दो धार आगे दो धार बाद में छोड़ती है ना कि नोंच खरोंच के दूध की आखिरी बूंद तक निचोड़ डालती है. ये प्रकृति के प्रति ममतामयी सोच होनी चाहिए और वन प्रबंधन की यही बेसिक बुनियाद होनी चाहिए.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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