/धर्म कोई अस्मिता नहीं है…

धर्म कोई अस्मिता नहीं है…

-शंभूनाथ शुक्ल||

पत्रकारिता के संस्मरण (पार्ट आठ)

धार्मिक आधार पर कोई राष्ट्र नहीं बना करते और बनेंगे तो स्थायी नहीं रह सकते. इसीलिए पाकिस्तान के विपरीत भारत को हमारे नेताओं ने एक सेकुलर, उदार और हर गरीब-अमीर को साथ लेकर चलने वाला लोकतांत्रिक राष्ट्र बनाया. इसके संविधान में धार्मिक आधार पर कोई भेदभाव नहीं करने तथा कमजोर वर्गों को आगे लाने के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई थी. इसीलिए जब भी कभी धार्मिक आधार पर अलग राष्ट्र बनने की मांग उठी भारत के बहुसंख्य लोगों ने नकार दिया. अगर इस्लाम एक राष्ट्र होता तो पूर्वी पाकिस्तान बांग्ला देश नहीं बनता और न ही पाकिस्तान के अंदर पख्तूनों को अलग-थलग होना पड़ता. पैन इस्लाम का नारा कभी सफल नहीं हो सका. इंडोनेशिया और मलयेशिया का सांस्कृतिक धरातल वह नहीं है जो पाकिस्तान का है अथवा खाड़ी के मुल्कों का. और न ही इनमें परस्पर कोई एकता है. जातीय अस्मिता ही असल अस्मिता है. हम हिंदी भाषी पाकिस्तान को अपना मान लेंगे और पश्चिम बंगाल के लोग बांग्लादेसी लोगों से अपनापा महसूस करते हैं. खुद पाकिस्तान के अंदर सिंध एक अलग अस्मिता है और पख्तून अलग. हालांकि दक्षिणपंथी लोग धार्मिक अस्मिता और धार्मिक पहचान की बात करते हैं लेकिन सिवाय धर्मस्थल समान होने के उनमें परस्पर कोई एकता नहीं होती.20070828bizreligion_dm_500

इसीलिए अलग सिख राष्ट्र की मांग करने वाले बुरी तरह फेल हुए. कुछ दिन जरूर यह नारा चला लेकिन पूरा देश क्या खुद पंजाब में ही इस नारे को कोई खास सपोर्ट नहीं मिला. सिख खाड़कुओं ने 1984 के बाद आतंकवाद के नाम पर खूब उत्पात मचाया. लेकिन जन समर्थन नहीं मिलने के कारण वे अलग-थलग पड़ गए. सिखों ने भारतीय मुख्य धारा में ही रहना पसंद किया. किसी कौम के साथ दोयम दरजे का व्यवहार हो तो वह कुछ दिनों के लिए ‘भकुर’ सकता है लेकिन अपने मुख्य समाज से अलग नहीं होगा. यही हुआ. पंजाब में पंजाबी एक पहचान है लेकिन उसे सिख और हिंदू में बाटना सभी को नागवार लगा और जल्द ही यह लड़ाई दम तोड़ गई.

लेकिन दक्षिणपंथी ताकतें धर्म को ही अपनी अस्मिता का आधार बनाकर परस्पर लड़ाया करती हैं. और शासक जब-जब अपनी जनप्रियता खोता है वह कट्टर और धर्म का पाबंद बन जाता है. हम इतिहास में ऐसे नमूने देख सकते हैं. अकबर और औरंगजेब में यही फर्क था. वर्ना दोनों ही मुगल थे और बाबरवंशी थे. मगर एक ने उदारता की परंपरा रखी और दूसरा गद्दी पाने के लिए आक्रामक हो उठा. नतीजा यह हुआ कि कट्टर मुसलमानों की निगाह में वो आलमगीर औरंगजेब हो गया और हिंदुओं की निगाह में वह क्रूर शासक. भरतपुर के गोकुल जाट ने औरंगजेब की कट्टर धार्मिक नीतियों को ही अपने विद्रोह का आधार बनाया था. एक तरीके से दोनों ही धर्म का इस्तेमाल कर रहे थे पर जनता बागी के साथ होती है और गोकुल जाट पूरे बृज क्षेत्र की जनता का हीरो बन गया.

राजीव गांधी के शासनकाल में भी धार्मिक कट्टरपंथी सिर उठा रहे थे. चूंकि राजीव गांधी पेशेवर राजनेता नहीं थे और न वे राजनय समझते थे न कूटनीति इसलिए उन सारे लोगों ने उन्हें घेर लिया जो येन केन प्रकारेण अपना एजंडा पूरा करना चाहते थे. इसमें कट्टर हिंदू भी थे, मुस्लिम और सिख भी. यहां तक कि खुद उनके ही दल में ऐसे लोग भरे हुए थे और राजीव गांधी उन्हें छांट नहीं पा रहे थे. यहां कहा जा सकता है कि राजीव गांधी को अपनी मां या नाना के राजनीतिक गुण परंपरा से नहीं मिले. उनके लिए बेहतर यही होता कि वे जहाज ही उड़ाते. नतीजा जल्द ही आया. शाहबानो के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला रोकने संबंधी कानून बनाने तथा अयोध्या में राम जन्म भूमि का ताला खोले जाने के रूप में.
(जारी)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.