/मुदित ग्रोवर बना बेमिसाल………

मुदित ग्रोवर बना बेमिसाल………

मुदित ग्रोवर एन आई टी जालंधर में..

मुदित ग्रोवर, उम्र महज 16 साल लेकिन काम बड़े बड़े गुरुओं को अपना शिष्य बना लेना. आपको आश्चर्य तो होगा, लेकिन सच यही है.

सिर्फ सोलह साल का यह बालक 9 साल की उम्र से इंजीनियरिंग कालेजस में मेहमान शिक्षक बतौर कम्प्यूटर विज्ञानं पढ़ाने लगा और आज इन्टरनेट मार्केटिंग का विशेषज्ञ बन बैठा है. पिछले दिनों मुदित ग्रोवर NIT जालंधर में भी बतौर गेस्ट लेक्चरर अपनी कला के झंडे गाड चुका है तथा वहां के छात्रों को भी वेबसाइट बनाने से लेकर इन्टरनेट मार्केटिंग के गुर सिखा के आया है.

15 मार्च, 1995 को जयपुर में जन्मे मुदित ग्रोवर ने पालने में ही अपने होनहार होने का परिचय दे दिया था और दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम हँसते हंसाते में महज अढाई साल की उम्र में एक शराबी बालक की भूमिका अदा कर बड़े बड़े धुरंधरों को दांतों तले अंगुली दबाने को मजबूर कर दिया. इसके बाद 1999 में जब मुदित चार साल के हुए तो दूरदर्शन के एक रिअलिटी शो को संचालित कर दुनिया के सबसे छोटे टी. वी. एंकर होने के ख़िताब का दावा जता डाला, जिसे लिम्का बुक ऑफ़ रेकॉर्ड्स ने अपने नियमों को ढीला कर स्वीकार किया (क्योंकि लिम्का बुक ऑफ़ रेकॉर्ड्स बच्चों के रेकॉर्ड्स को जगह नहीं देता कारण कि रिकॉर्ड बनवाने के चक्कर में कई माता पिता बच्चों से उलटे सीधे काम करवाते है, जो, बच्चों कि सेहत और दिमाग पर उल्टा सीधा असर डालते है) और मुदित ग्रोवर को लिम्का बुक ऑफ़ रेकॉर्ड्स के 2001 के संस्करण में जगह दी गई, अमिताभ बच्चन के ठीक बाद. मुदित ग्रोवर के इस कारनामे को पिंकसिटी प्रेस क्लब ने न सिर्फ सराहा बल्कि 15 मार्च 2001 को जयपुर के सवाई मानसिंह स्टेडियम में कार्यक्रम आयोजित कर तत्कालीन राज्यपाल श्री अन्शुमान सिंह जी के हाथों सम्मानित करवाया. इस सम्मान समारोह को संचालित करने प्रसिद्ध क्रिकेट कमेंटेटर सरदार जसदेव सिंह आये तथा समारोह कि अध्यक्षता वर्तमान उच्च शिक्षा मंत्री डा. जीतेन्द्र सिंह ने की.
इसके साथ ही राजस्थानी लोकसंगीत कि मशहूर कंपनी वीणा कैसेट्स ने मुदित ग्रोवर को अपने एक विडियो एल्बम नखरालो देवरियो कि मुख्य भूमिका निभाने का अवसर दिया जिसे मुदित ग्रोवर ने बिना किसी रिटेक के 12 घंटे की लगातार शूटिंग में पूरा कर एक नया इतिहास रच डाला.

इस सबसे मुदित ग्रोवर एक सेलिब्रिटी तो बन गया पर मुदित ग्रोवर का लक्ष्य फिल्म या टी वी स्टार बनना नहीं था और मुदित ग्रोवर ने कंप्यूटर पर हाथ अजमाना शुरू कर दिया वोह भी अपने पिता की गैरहाजिरी में. नतीजतन कई बार कंप्यूटर ख़राब भी हो जाता और मुदित पापा के डर से कंप्यूटर को ठीक करने के प्रयास में जुट जाते और सफल भी हो जाते. इस चक्कर में मुदित ग्रोवर धीरे धीरे कंप्यूटर विशेषज्ञ बन बैठे जिसका उनके पिता को पता तब चला जब एक बार उनके पिता से कंप्यूटर में कोई भारी खराबी आ गई तो मुदित ने पापा से कहा की ऐसा करिए, फिर ऐसा करिए, फिर देखे, मुदित के पिता ने उसकी तरफ गौर से देखा और मन ही मन हँसे भी की ये पिद्दी ना, न पिद्दी का शोरबा मुझे कंप्यूटर की बारीकियाँ समझा रहा है लेकिन तभी मुदित की माँ ने कहा की ये जो कह रहा है करके तो देखिये,सो मजबूरन मुदित के कहे अनुसार करने लगे और कंप्यूटर ठीक हो गया. इसके बाद मुदित के कदम नहीं रुके. मात्र नौ साल की उम्र में उसकी प्रतिभा को पहिचाना डॉ. अरूण मेहता ने. (डॉ. अरूण मेहता जो की प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ स्टीफन विलियम होकिंग, जो कि ना बोल सकते है ना लिख सकते है. पूरी तरह लकवाग्रस्त है, की व्हील चेयर पर को इस तरह से प्रोग्राम कर चुके है, जिससे डॉ स्टीफन विलियम होकिंग जो कुछ भी सोचते है उसे कंप्यूटर पढ़ लेता है और डाक्युमेंट फॉर्मेट में सेव कर देता है.) डॉ. अरूण मेहता ने मुदित ग्रोवर को महज दस साल की उम्र में रादौर, यमुना नगर, हरियाणा स्थित सेठ जयप्रकाश मुकुन्दलाल इंस्टिट्यूट ऑफ़ इन्जिनियेर्निग एंड टेक्नोलोजी में बतौर गेस्ट फेकल्टी आमंत्रित कर मुदित ग्रोवर को एक नया हौंसला दिया. फिर क्या था मुदित ग्रोवर कई कंप्यूटर दिग्गजों के चहेते बनते चले गए. 2005 में मुदित के पिता की रीड की हड्डी में जबर्दस्त बीमारी ने उन्हें बिस्तर पर डाल दिया जिसके चलते उनका सारा काम काज बंद हो गया. 2007 में मुदित ने वेबसाइट बना कर उससे कुछ कमाने और घर की मदद करने की सोची तथा कुछ वेब डिजाइन करने वालो से संपर्क किया मगर ज्यादातर अधकचरी जानकारी वाले थे तथा पैसा इतना मांग रहे थे जो की देना बस में नहीं था सो, भारत की एक मशहूर वेब होस्टिंग कंपनी से 3000 रुपये में 10 वेबसाइट का स्पेस ख़रीदा और उस पर किसी तरह एक वेबसाइट बना डाली लेकिन जब दूसरी वेबसाइट बनाने लगे तो एरर आने लगे की इस स्पेस में सिर्फ 1 वेबसाइट बन सकती है, जब वेब होस्टिंग कंपनी से कहा गया तो उसने 15 दिन बाद उस एरर को दूर किया. लेकिन हर अगली वेबसाइट पर पुरानी राग. अब ना तो कंपनी पैसे वापिस करने को तैयार और सपोर्ट मिला नहीं. थक कर मुदित ने अमेरिका की एक कंपनी से रीसेलरशिप लेकर नए सिरे से काम शुरू किया और धीरे धीरे आगे बढ़ने लगे.

मुदित ग्रोवर गणतंत्र दिवस 2011 समारोह में प्रशासन द्वारा सम्मानित.

इसके बाद मुदित ने खुद के सर्वर ख़रीदे और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर वेब होस्टिंग बेचने लगे वोह भी बड़े कम दामो पर नतीजा ये हुआ की बड़ी कंपनियां मुदित की कंपनी से चिढ गई और उसके खिलाफ कुप्रचार अभियान चला दिया लेकिन इस कुप्रचार ने मुदित को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहिचान दिलवा दी मुदित ने भी हर नहीं मानी और साईट पर लाइव चैट लगा दी तथा साईट पर आने वाले हर विजिटर का स्वागत करने लगे तथा उनकी समस्या का समाधान हाथों हाथ करने लगे. जिससे प्रभावित होकर विजिटर मुदित ग्रोवर से होस्टिंग खरीदने लगे और मुदित की वेब होस्टिंग कंपनी शान से दौड़ने लगी. 2008 में मुदित ग्रोवर ने दुसरो के लिए साईट बनाना शुरू किया और सात दिन में बहुत कम दाम में 8 पेज की सूचना आधारित साईट बना कर देना शुरू कर दिया. मुदित की इस ऑनलाइन सेवा को विदेशो में बहुत लोकप्रियता मिली और आज मुदित की कंपनी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी सेवाए प्रदान कर रही है तथा वोह अब तक अमेरिका, ब्रिटेन तथा अन्य देशों के 700 से ज्यादा ग्राहकों को 3  हज़ार पांच सौ से ज्यादा साईट बना कर दे चुके है. मुदित ग्रोवर अपने ग्राहकों को न सिर्फ सूचना आधारित वेबसाइटस बना कर देते हैं बल्कि ग्राहकों की आवश्यकता अनुसार बड़े पोर्टलस और इ-कॉमर्स वेबसाइटस भी बना कर देते हैं. यही नहीं पी एच पी प्रोग्रामिंग में भी मुदित को महारत हासिल है. वर्डप्रेस जैसे ब्लोगिंग सीएमएस पर नई डिजाईन के साथ कैसी भी वेबसाइट बना देना मुदित के बाएं हाथ का खेल है तो जुमला जैसे कंटेंट मैनेजमेंट सिस्टम पर भी मुदित को महारत हासिल है.
इसके अलावा मुदित ग्रोवर की अपनी  सैंकड़ों वेबसाईट है. मुदित ने अब तक दुनिया के करीब करीब हर विषय पर वेबसाइट बना डाली है.

मुदित ग्रोवर को गणतंत्र दिवस 2011 समारोह के मौके पर अजमेर प्रशासन की तरफ से भी पर्यटन मंत्री श्रीमति बीना काक के हाथों सम्मानित किया जा चुका है.

मुदित ग्रोवर का विडियो एल्बम….

 

मुदित ग्रोवर 94.3 My FM पर..

 

मुदित ग्रोवर के बारे में अधिक जानकारी के लिए उनके ब्लॉग muditgrover.com का अवलोकन करें…

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.