/बिहार का दलित जाये तो जाये कहां, एक ओर जननायक के इंतजार में बिहार के बहुजन..

बिहार का दलित जाये तो जाये कहां, एक ओर जननायक के इंतजार में बिहार के बहुजन..

-आशीष||

15 अगस्त 2007 और 15 अगस्त 2013 के बीच क्या संबंध है. निश्चित तौर पर यह भारत देष की आजादी की तिथि है, लेकिन बात जब बिहार राज्य की हो तो, यह मामला दलित, अतिपिछड़ों व पिछड़ों की हकमारी के दिन के तौर पर इतिहास में दर्ज हो चुका है. और इसका पूरा श्रेय राज्य के सुशासन बाबू व सामाजिक व समता मूलक विकास के पक्षधर नीतीश कुमार को जाता है. सर्वोदय नेता जयप्रकाष नारायण के संपूर्ण क्रांति से उपजे और पेषे से, इंजीनियर नीतीश कुमार ने 2004 में सता प्राप्ति के तीन साल बाद ही वर्श 2007 में सामाजिक न्याय को वोट बैंक में तब्दील करते हुये दशकों से उपेक्षित दलित जातियों को महादलित समुदाय में विभाजित करते हुये, उन्हें एक दूसरे के सामने अधिक लाभ व कम लाभ के कुछ लोक-लुभावन वादों के साथ जबरदस्त नुकसान पहुंचाया. वहीं दूसरी ओर 2013 में ऐसे ही मौके पर लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार के संसदीय क्षेत्र सासाराम के शिवसागर प्रखंड के बड्डी में राष्ट्रध्वज फहराने को लेकर राजपूतों व रविदास समुदाय के दो सदस्यों के बीच हिंसात्मक विवाद में रविदास समुदाय की एक महिला समेत दो लोग मारे गए.NCDHR1

महादलित फार्मूला
24 नवंबर 2005, जब राज्य ने करीब डे.ढ दषक के लंबे अराजक वनवास के बाद करवट ली और इसकी कमान भाजपा-जदयू गठबंधन के सर्वमान्य नेता नीतीश कुमार के हाथों में आयी तो यह सवाल प्रमुखता से उठा था, कि क्या नीतीश सरकार में सामाजिक न्याय को एक नया आयाम मिलेगा या परंपरागत तरीके से वादों, घोषणाओं व कुछेक लोक-लुभावन योजनाओं के खिचडी से यह सरकार भी अपना काम करते रहेगी. हालांकि सरकार के शुरुआती एक दो साल राज्य के लिए सकून दायक रहे, लेकिन सरकार के अंदर बैठे कुछेक ब्राहमणवादी नेताओं ने सोशल इंजीनियरिंग का महादलित फार्मूला लागू करवाया, इसके तहत सरकार ने दलित नेता व लोजपा प्रमुख रामविलास पासवान की जाति दुसाध व पासवान को छोड चर्मकार, पासी,डोम, हलखोर, मुसहर आदि को महादलित समुदाय में षामिल कर राज्य में जातिय धु्रवीकरण को ध्वस्त करते हुये, कुर्मी, कोयरी, भूमिहार व महादलित फार्मूला लागू किया.

कर्पूरी फार्मूला
राज्य में जनता पार्टी के 1977-80 शासन के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने पिछडे वर्गो के लिए पहली मर्तबा आरक्षण लागू किया था. हालांकि ठाकुर को पता था कि प्रभावकारी जातियों के लोग अत्यंत पिछड़ों को सरकारी सेवा में पनपने नहीं देंगे, इसलिए उन्होंने आरक्षण दो सूचियों के आधार पर लागू किया. ताकि दबी-कुचली जातियों के बहुसंख्यक पिछडे भी सरकारी सेवा में आ सकें. आरक्षण की पहली सूची में अत्यंत पिछड़ों की कुल 108 जातियां व दूसरी सूची में अन्य पिछडा वर्ग में यादव, कोइरी, बनिया व कुर्मी समेत कुल 38 जातियां शामिल की गयी थी. सनद् रहे कि कर्पूरी ठाकुर के इस फार्मूलों का उस दौर में सर्वणों ने जोरदार विरोध किया था, लेकिन उनके तमाम प्रयास इस फार्मूले को बदलने के लिए बाध्यकारी नहीं हो सके. हालांकि कर्पूरी फार्मूलों को राष्ट्रीय स्तर पर लागू किये जाने के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने 1992 में दोनों सूचियों को खत्मकर पिछड़ों के लिए 27 फीसद आरक्षण की व्यवस्था करनी चाही, ताकि दबंग पिछडी जातियां मसलन यादव, कुर्मी, कोयरी व बनिया का सरकारी सेवा में कब्जा हो सकें, लेकिन इस साजिश को अति पिछड़ों ने बूरी तरह से खारिज करते हुये आंदोलन करने की धमकी दे डाली. हालांकि लालू प्रसाद ने कर्पूरी फार्मूलों में शामिल दोनों सूचियों, में दो-दो फीसद आरक्षण बढोतरी यानी सरकारी सेवा में अत्यंत पिछड़ों के लिए 14 व अन्य पिछड़ों के लिए 12 फीसद की नयी व्यवस्था के साथ बनाये रखा.

राज्य में दलित आबादी
राज्य सरकार के द्वारा 2010-11 में जारी आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, सूबे में दलित जातियों की आबादी 1 करो.ड 30 लाख से पार कर गयी है. कुछ वर्श पूर्व ही महादलित वर्ग में शामिल की गयी रविदास जाति 31.41 प्रतिशत के साथ अभी भी दलित जातियों में आबादी के मामले में पहले पायदान पर है, वहीं 30.94 प्रतिशत के साथ पासवान दूसरे पायदान पर है. जबकि मुसहर समुदाय की आबादी 16.22 प्रतिशत है. रिर्पोट के मुताबिक पासी 5.46, धोबी 4.97 व भुइंया जाति की आबादी कुल दलित आबादी की 4.37 प्रतिशत है. जबकि बांतर 0.78, बाउरी 0.02, भोगता 0.10, भूमिज 0.02, चौपाल 0.77, हलालखोर 0.03, दबगर 0.03, डोम 1.19, घासी 0.01, हारी 1.40, कंजर 0.01, कुरियार 0.05, लालबेगी 0.01, नट 0.03, पान 0.03, रजवार 1.64, तूरी 0.26 और जेनरिक जातियों की आबादी 0.021 प्रतिशत बतायी गयी है. उल्लेखनीय है, कि सूबे में मुस्लिम समुदाय की अति पिछ.डी जातियों की आबादी 11 फीसद है.

हिंसा के आसान शिकार
दलित राज्य में होने वाले किसी भी हिंसा के सबसे आसान शिकार दषकों से बनते आ रहे हैं. विषेशकर जातीय अस्मिता के नाम पर दलितों के साथ जितना अमानुशीय कृत्य राज्य में पूर्ववर्ती व वर्तमान सरकारों के कार्यकाल में हुआ है, वह सामाजिक न्याय के सभी दावों को पूर्णतः खोखला करता है. इनमें 11 जुलाई 1996 को भोजपुर जिले के सहार थाना के बथानी टोला में 21 दलितों की हत्या, 1997 में अरवल का लक्ष्मणपुर बाथे नरसहंार जहां 57 दलितों की हत्या इसी तरह 11 मई 1998 को भोजपुर जिले के नगरी बाजार नरसंहार में 11 दलित व पिछ.डा वर्ग के लोगों की हत्या और 16 जून 2000 को जहानाबाद के मियांपुर में 32 दलितों की हत्या प्रमुख है. सबसे आश्चर्य तो यह है, कि उपरोक्त सभी मामलों के करीब-करीब आरोपी पटना उच्च न्यायालय द्वारा साक्ष्य के अभाव में बरी किये जा चुके हैं.

पार्टी यानी जाति
जननायक कर्पूरी ठाकुर के मुख्यमंत्री काल के दौरान पहली मर्तबा सूबे में सामाजिक न्याय सही अर्थो में मूर्त रुप ले सकी. अत्यंत पिछ.डी जाति से आने वाले कर्पूरी ठाकुर ने अत्यंत पिछड़ों व अति पिछड़ों की बहुसंख्यक आबादी को सरकारी नौकरियों में आरक्षण देकर जातिय अस्मिता का बोध कराया. हालांकि इसके बाद वर्श 1980 में राज्य में गैर कांग्रेसवाद की जगह कांग्रेस की वापसी हुई, और इसके मुखिया बने डॉ. जगन्नाथ मिश्र, जिनके मंत्रीमडल में मात्र एक स्थान अति-पिछड़ों को मिला. 1977-85 के दौरान अत्यंत पिछडे वर्ग से धानुक और नोनिया और नाई जाति के एक-एक ने लोकसभा का प्रतिनिधित्व किया. जेपी आंदोलन के उपज बिहार के तीन महारथी, क्रमश: पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव, पूर्व केन्द्रीय मंत्री रामविलास पासवान और वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जेपी के सपनों के उलट जाति की राजनीति का सबसे गंदा खेल खेला है. उक्त तीनों नेताओं ने सूबे की अत्यंत पिछडी, अतिपिछडा व दलित समुदाय को अपने-अपने जाति के आगे करीब-करीब बौना ही रखा है, जहां लालू प्रसाद ने राज्य में मुसलिम -यादव गठजोड कर सता का सुख भोगा, वहीं रामविलास पासवान ने अपने को दलित जाति यानि दुसाध व पासवान तक हीं सीमित रखा, जबकि नीतीश कुमार ने इन दोनों से एक कदम आगे ब.ढते हुये दलित को महादलित में विभाजित कर दिया और राज्य में दलित को ही दलित के आगे युद्व के लिए ख.डा कर दिया. सवाल यह है, कि राज्य में दलितों को लेकर सामंती सोच आज भी जस की तस क्यों बनी हुई है, क्यों संविधान निर्माता डॉं. भीमराव अंबेदकर के सामाजिक न्याय के सिद्धांत को स्वीकार करने में नेता सही मायनों में रुचि नहीं ले रहे हैं. हालांकि उम्मीद लगातार बनी हुई है, कि निश्चित तौर पर सूबे में सामाजिक न्याय का सपना नेताओं के भाशणों, इतिहास के पन्नों व बौद्विक जुगाली करने वाले अकादिक जगत के सभी दायरों को ध्वस्त करते हुये स्थापित होगा. दिनकर के इस पंक्ति का सवेरा जरुर आयेंगा.

लोहे के पेड़ हरे होंगे, तू गान प्रेम का गाता चल,
नम होगी यह मिट्टी जरुर, ऑंसू के कण बरसाता चल.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.