/केजरीवाल ने खुद मानी थी सेवा शर्तें तोड़ने की बात, अब मुकर रहे हैं…

केजरीवाल ने खुद मानी थी सेवा शर्तें तोड़ने की बात, अब मुकर रहे हैं…

मजबूत जनलोकपाल के लिए आंदोलन चलाने वाले अन्‍ना हजारे के अहम सहयोगी अरविंद केजरीवाल पर चौतरफा वार हो रहा है। कांग्रेस और सरकार ने उन पर निशाना साधा है। सोमवार को मीडिया ने भी उन्‍हें कठघरे में खड़ा किया है। 
आयकर विभाग के नोटिस का जवाब देने की तैयारी कर रहे केजरीवाल के बारे में एक अंग्रेजी अखबार ने खबर दी है कि 2007 में उन्‍होंने खुद बौंड की शर्त तोड़ने की बात मानी थी।

अखबार के मुताबिक सीबीडीटी को जून, 2007 में लिखी गई चिट्ठी में केजरीवाल ने माना था कि नौकरी से दो साल की स्टडी लीव पर जाने से पहले मानी गई एक शर्त का उल्लंघन किया है। चिट्ठी में कहा गया है कि उन्होंने ऐसा ‘व्यापक जनहित’  में किया गया है।

अखबार में छपी रिपोर्ट के मुताबिक अरविंद ने आयकर विभाग का नोटिस मिलने पर कहा था कि उन्होंने कोई शर्त नहीं तोड़ी है। लेकिन जून, 2007 में लिखी गई चिट्ठी में अरविंद ने कहा था, ‘अध्ययन अवकाश लेने के समय मैंने एक बॉन्ड पर दस्तखत किए थे कि मैं लौटूंगा और सरकार के लिए कम से कम दो साल काम करूंगा। मैं वापस आया और 1 नवंबर, 2002 को नौकरी फिर शुरू की। हालांकि, मैंने सिर्फ अगले एक साल तक काम किया और 1 नवंबर, 2003 के बाद से मैंने असाधारण अवकाश (ईओएल) बिना किसी वेतन के ले लिया और आरटीआई पर काम करने लगा।’

अरविंद ने आगे लिखा, ‘मैं एक साल के लिए काम कर सकता था और इस बॉन्ड की शर्तों को पूरा कर सकता था। इसके एवज में मुझे वेतन भी मिलता। हालांकि, मैंने व्यपाक जनहित में काम करने के लिए ईओएल लेने का फैसला किया। चूंकि, मैं बॉन्ड की शर्तों को पूरा नहीं करता हूं। मुझसे कहा जा रहा है कि मैं वह वेतन विभाग को लौटा दूं जो मुझे स्टडी लीव के दौरान मिली थी। छुट्टी के नियम 63 (3) का हवाला देते हुए केजरीवाल ने लिखा कि छुट्टी के दौरान और उसके बाद भी उनका समय और काम जनहित से जुड़ा था और उनके काम को देश और देश के बाहर मैगसेसे अवॉर्ड और सत्येंद्र दुबे मेमोरियल अवॉर्ड के जरिए पहचान मिली है। चूंकि उन्होंने पुरस्कार के तौर पर मिली रकम दान दे ही, इसलिए उनके पास तनख्वाह लौटाने के पैसे नहीं हैं।’

केजरीवाल ने 20 फरवरी, 2006 को आयकर विभाग से इस्तीफा दे दिया था। लेकिन अभी तक उनका इस्तीफा मंजूर नहीं हुआ है। आयकर विभाग ने केजरीवाल को इस्तीफे से पहले कई चिट्ठियां भेजी थीं। इन चिट्ठियों में विभाग ने काम पर लौटने करने या फिर केंद्रीय लोक सेवा नियमों के तहत कार्रवाई का सामना करने की बात कही थी।

2006 तक आयकर विभाग ने न सिर्फ अरविंद की नामौजूदगी पर सवाल खड़े करने के अलावा स्टडी रिपोर्ट को जमा न करने, चंडीगढ़ में पोस्टिंग के बावजूद दिल्ली में बने रहना और एनजीओ परिवर्तन के लिए आरटीआई पर सरकार से बिना इजाजत लिए काम करने पर सवाल उठाए थे।

सीबीडीटी ने जनवरी, 2006 को केजरीवाल को चिट्ठी लिखकर पूछा, ‘आपने न तो जरूरी दस्तावेज जमा किए हैं और न ही आप नौकरी कर रहे हैं। इसके बाद ही केजरीवाल ने इस्तीफा देने का फैसला किया।’ हालांकि, स्टडी लीव पर जाने से पहले मंजूर शर्त के उल्लंघन का हवाला देते हुए सीबीडीटी ने उनका इस्तीफा मंजूर करने से इनकार कर दिया था। जून, 2007 में अरविंद की छूट की मांग करने वाली चिट्ठी को वित्त मंत्रालय के पास भेजा गया था लेकिन इसे नामंजूर कर दिया गया था।

अप्रैल, 2008 में सीबीडीटी ने दिल्ली के आयकर आयुक्त से कहा कि विभाग केजरीवाल से बकाए की वसूली करे और अनापत्ति प्रमाण पत्र जमा करे ताकि उनके इस्तीफे पर फैसले का काम आगे बढ़े। सीबीडीटी की ओर से  5 अगस्त, 2011 को भेजे गए नोटिस में केजरीवाल से 9.27 लाख रुपये जमा करने को कहा गया है। इस नोटिस के जवाब में अरविंद ने जवाब दिया था, ‘मैंने किसी बॉन्ड को नहीं तोड़ा है।’

उधर, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने भी आजमगढ़ में एक सम्मेलन में हिस्सा लेते हुए कहा कि अरविंद ने एनजीओ चलाकर लाखों रुपये चंदे के तौर पर वसूल किए हैं और  भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारी के पद पर रहते हुए अपनी सेवा शर्तों का उल्लंघन किया है। लेकिन अरविंद केजरीवाल ने कांग्रेस के महासचिव पर पलटवार करते हुए कहा है कि अगर उन्होंने कुछ गलत किया है तो कांग्रेस उन पर मुकदमा करे।

केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने भी केजरीवाल पर निशाना साधा है। उन्‍होंने कहा कि टीम अन्ना की अपनी राय हो सकती है लेकिन वे उन विधेयकों को लेकर अपनी विशलिस्ट नहीं भेज सकते जिन पर पहले से ही काम हो रहा है। टीम अन्ना कोई शॉपिंग लिस्ट लेकर नहीं चल सकती कि जो चीज वे चाहें उनके पास आ जाए। खुर्शीद केजरीवाल की उस राय पर तीखी प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए यह बात कही, जिसमें आरटीआई कार्यकर्ता ने कहा था कि जुडिशियल अकाउंटीबिलिटी बिल के तहत किसी भी जज के खिलाफ जांच करने वाले पैनल में सरकार या न्यायपालिका का कोई भी सदस्य शामिल नहीं होना चाहिए।

(भास्कर की खबर पर आधारित)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.