/सरदी में भी गरमी का अहसास..

सरदी में भी गरमी का अहसास..

-शंभूनाथ शुक्ल।।

पत्रकारिता के संस्मरण- (पार्ट 9)

1984 की सरदी भी खूब ठिठुरन लेकर आई। लेकिन शीतलहर के बावजूद दिल्ली समेत समूचे उत्तर भारत का मौसम बहुत गरम गर्म था। विश्व हिंदू परिषद के नारों से दीवालें पटी पड़ी थीं। ‘जहां हिंदू घटा, वहां देश कटा।’ जाहिर है यह नारा कश्मीर की घटनाओं को लेकर था। कश्मीर घाटी से पंडित भगाए जा रहे थे। दूसरा नारा था ‘आओ हिंदुओं बढ़कर बोलो, राम जन्मभूमि का ताला खोलो।’ इन दोनों ही नारों में एक आतंक था। एक में घटत का आतंक और दूसरे में बढ़त का। मजा यह था कि एक ही संगठन इन दोनों ही नारों को अपने पक्ष में कर रहा था। यह वह दौर था जब एक तरफ सिख अपनी पहचान की बात कर रहे थे और मुसलमान अपनी तथा हिंदू भी विहिप के कारण अपनी। बाकी तो ठीक पर हिंदुओं की अपनी पहचान क्या है, यह किसी को नहीं पता था। राम जन्मभूमि को लेकर न तो सारे हिंदू एक थे न बाबरी मस्जिद के वजूद को लेकर सारे मुसलमान। इस बीच सिख पीछे हो गए थे।ram-mandir-2_660_081913084823

शायद १९८५ के पहले अधिकतर लोगों को यह नहीं पता था कि रामजन्म भूमि किसी ताले में बंद है क्योंकि सबै भूमि गोपाल की तर्ज पर औसत हिंदू यह मानकर चलता था कि रामजी की मर्जी कहां पैदा होंगे यह कोई विहिप थोड़े ही तय करेगा। लेकिन कुछ लोग कटुता भर रहे थे। इनमें से कुछ वे थे जो किसी कारण से राजीव गांधी से नाराज थे और कुछ वे थे जो उन्हीं कारणों से राजीव गांधी से अथाह खुश थे और वे चाहते थे कि इस समय जो चाहो वह करवा लो। यह वही दौर था जब शिव सेना और विहिप का मकसद बस किसी तरह अयोध्या में राम जन्म भूमि का ताला खुलवाना था। अयोध्या एक नया पर्यटन स्थल विकसित हो रहा था। सरयू के घाट, आलीशान धर्मशालाएं और फैजाबाद में होटल तथा उसी लिहाज से प्रशासन अपने वास्ते सर्किट हाउस का नवीकरण भी करवा रहा था।

सब का टारगेट अयोध्या की वह इमारत थी जो अपनी बुलंदी व स्थापत्य शैली का बेजोड़ नमूना थी। उसका नाम था बाबरी मस्जिद जिसे कुछ दिनों पहले तक मस्जिदे जन्म स्थान कहा जाता था और 1853 तक जिसके निर्माण और जिस पर अधिपत्य को लेकर कभी कोई विवाद नहीं हुआ। इस मस्जिद पर हिंदू दावेदारी अवध के शासक वाजिदअली शाह के वक्त में शुरू हुई जब निर्मोही अखाड़े ने इस मस्जिद में पूजा अर्चना करने तथा मंदिर बनाने की अनुमति मांगी। करीब दो साल तक यहां इसे लेकर झगड़े चलते रहे बाद में प्रशासन ने मंदिर बनाने या पूजा अर्चना करने की अनुमति देने से मना कर दिया। लेकिन फैजाबाद के गजेटियर में लिखा है कि गदर के बाद 1859 में ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों ने मस्जिद के बाहरी प्रांगण को मुसलमानों के लिए प्रतिबंधित कर दिया तथा हिंदुओं को यहां चबूतरा बनाकर पूजा करने की अनुमति दे दी। अलबत्ता मस्जिद का भीतरी प्रांगण मुसलमानों के लिए खुला रहा और कह दिया गया कि वे अंदर नमाज अता कर सकते हैं। हिंदुओं ने मस्जिद के बाहरी प्रांगण में 17 बाई 21 फिट का एक चबूतरा बनवा लिया। इसके बाद 1879 में निर्मोही अखाड़े के बाबा राघोदास ने फैजाबाद के सब जज पंडित हरीकिशन के यहां एक सूट दाखिल कर कहा कि उन्हें इस चबूतरे में मंदिर बनाने की अनुमति दी जाए। पर यह सूट खारिज हो गया। फैजाबाद के डिस्ट्रिक्ट जज कर्नल जेईए चेंबर के यहां एक दूसरी अपील दायर हुई लेकिन चेंबर ने 17 मार्च 1886 को इस स्थान का दौरा किया और अपील यह कहते हुए खारिज कर दी कि मस्जिद निर्माण को अब 358 साल हो चुके हैं इसलिए अब इस मुकदमे का कोई मतलब नहीं है। 25 मई 1886को फिर एक अपील अवध के न्यायिक आयुक्त डब्लू यंग के यहां दाखिल हुई लेकिन वह भी रद्द हो गई। बैरागियों की पहली कोशिश का इस तरह पटाक्षेप हो गया।

1934 के दंगों के दौरान मस्जिद के परकोटे और एक गुंबद को दंगाइयों ने तोड़ डाला जिसे बाद में ब्रिटिश सरकार ने बनवा दिया। 22 दिसंबर 1949 को आधी रात के वक्त जब मस्जिद में तैनात गार्ड सो रहे थे तभी उसके भीतर राम सीता की मूर्तियां रखवा दी गईं। सिपाही माता प्रसाद ने मस्जिद में अचानक मूर्तियां प्रकट होने की सूचना थाने भिजवाई। 23 दिसंबर को अयोध्या थाने के एक सब इंस्पेक्टर राम दुबे ने एफआईआर लिखवाई कि 50-60 लोग मस्जिद के गेट पर लगे ताले को तोड़कर अंदर दाखिल हुए और वहां श्री भगवान को स्थापित कर दिया तथा अंदर व बाहर गेरुए रंग से सीताराम सीताराम लिख दिया। इसके बाद 5-6000 लोगों की भीड़ भजन-कीर्तन करते हुए मस्जिद के भीतर घुसने की कोशिश कर रही थी पर उन्हें भगा दिया गया लेकिन अगले दिन फिर हिंदुओं की भारी भीड़ ने मस्जिद के भीतर घुसने की कोशिश की। फैजाबाद के डीएम केके नैयर ने शासन को लिखा कि हिंदुओं की भारी भीड़ ने पुलिस वालों को खदेड़ दिया और मस्जिद का ताला तोड़कर अंदर घुस गए। हम सब अफसरों और पुलिस वालों ने किसी तरह उन्हें बाहर निकाला। पर अंदर घुसे हथियारबंद साधुओं से निपटने में हमें भारी मुश्किल आ रही है। अलबत्ता गेट महफूज है और हमने उसमें बाहर से ताला लगा दिया है तथा वहां फोर्स भी बढ़ा दी है। प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के पास जैसे ही यह सूचना पहुंची उन्होंने यूपी के मुख्यमंत्री गोबिंदवल्लभ पंत को अयोध्या में फौरन कार्रवाई करने तथा साधुओं को मस्जिद परिसर से बाहर करने का निर्देश दिया। पंत जी के आदेश पर मुख्य सचिव भगवान सहाय और पुलिस महानिरीक्षक वीएन लाहिड़ी मस्जिद से साधुओं को बाहर करने के लिए तत्काल अयोध्या गए। लेकिन डीएम नैयर इस आदेश को मानने के लिए राजी नहीं हुए उन्होंने आशंका जताई कि अगर ऐसा किया गया तो हिंदू उत्तेजित हो जाएंगे।

इसके बाद का किस्सा विश्व हिंदू परिषद का है। हालांकि 1949 तक अयोध्या के इस विवाद में राजनीतिक दलों की दखलंदाजी नहीं थी और न ही इस प्रकरण में अयोध्या के बाहर के लोगों की कोई रुचि थी। अब विहिप के साथ-साथ अखबार भी इस प्रकरण में एक पक्षकार जैसा ही अभिनय कर रहे थे। बाद में प्रेस कौंसिल की जांच में यह साबित भी हुआ। लेकिन यह अभिनय ज्यादातर क्षेत्रीय अखबारों और इतिहास ज्ञान से अनभिज्ञ उनके तथाकथित संपादकों ने किया।
(जारी)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.