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चार महीने की मेहनत का नतीजे में चार महीने का घर खर्च नहीं चलता..

By   /  February 19, 2014  /  No Comments

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-दीप पाठक||

जब गोल गढ़ मेहल नाम की पौष्टिक नाशपती कुंटलों के हिसाब से तैयार होती हैँ तो दाम 40 रुपये मन यानि एक रुपये किलो बाज दफा इससे भी कम एक खाली कट्टा 8 रुपये 2 रुपये आढ़त 2 रुपये पल्लेदारी काट के 38 रुपये कट्टा किसान को मिलता है जिसमें फलों की तुड़ाई, भराई और सड़क तक ढोने ट्रक में भरने तक पूरे परिवार की कमर दुखने लगती है.ये नाशपाती इस कदर फलती है कि बंदर भी खा खा के अघा जाते हैं.nanital

उत्तराखंड के सामने यू पी है अगर इन फलों के जैम जैली जैसे प्राडक्ट बना भी दिये जाँय तो यू पी में जैम जैली खाने का कल्चर नहीं जबकि हिमांचल के सामने चंडीगढ़ पंजाब है वहां इन फल उत्पादों की भारी खपत बन जाती है.रोटी परांठा खाने के साथ ये सब चल जाता है यू पी वाले भात के साथ ये बेमेल हो जाता है.

आड़ू खुबानी और मीठे पूलम की मार्केट अच्छी है सेब भारी रखरखाव मांगता है इस कारण सेव उत्पादक उत्तराखंड के किसानों ने धीरे धीरे सेब कम कर बगीचे में आड़ू के पेड़ भर दिये हैं.

मटर आलू गोभी अदरक पहाड़ में खूब होता है पर किसान को सस्ते ट्रांसपोर्ट से कैसे भिजवाऐं ये किसान की भारी चिंता है ट्रकों से भिजवाना पड़ता है स्थानीय मंडी ऐजेंट और मुख्य मंडी की आढ़त के बीच किसान को दो बिचौलियों को अपनी फसल में हिस्सा देना पड़ता है अपनी और परिवार की मेहनत फोकट मेँ.

ओखलकांडा के किसान किसन कुमार बोरा जी एक दिन बोले “ये खाली कट्टे और पल्लेदारी ही हमारे हिस्से आती है पैसा आता है पर वो इतना भी नहीं होता कि चार महीने की फसल बेचकर चार महीने का घर खर्च नहीं चलता!”

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

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