/घर के दुश्मनों ने उजाड़ी उत्तराखंड की पर्वतीय खेती..

घर के दुश्मनों ने उजाड़ी उत्तराखंड की पर्वतीय खेती..

-दीप पाठक||

पिछले दिनों आर टी आई कार्यकर्ता एवं वकील चंद्रशेखर करगेती जी के द्वारा मांगी गयी एक सूचना से पता चला कि पर्वतीय क्षेत्रों में खेती के रकबे में कोई चिंताजनक गिरावट नहीं आयी है महज 6 सौ हैक्टेयर कृषि भूमि का रकबा उत्तराखंड बनने से अब तक कम हुआ है इससे कहीं अधिक जमीनें प्राकृतिक आपदा में खुर्द-बुर्द हो गयीं और सबसे ज्यादा सिंचित सेरे (नदी किनारे की जमीन) जल विद्युत परियोजनाओं ने डुबायी है सैकड़ों गाँवों की हजारों नाली उपजाउ जमीनें जल समाधि में समा गयीं. इसके बदले में धार की उंचाई वाली जमीन में सिँचाई की व्यवस्था नहीं की गयीं.uttrakhand

कोश्यां कुटौली की पट्टी जहां के टमाटर और शिमला मिर्च से हल्द्वानी मंडी पट जाती थी अब तमाम जगहों पर सड़कें चलीं गयीं पर सब्जी की खेती में भारी गिरावट आयी है ऐसा क्यों हुआ किसानों ने खेती के प्रति उदासीनता क्यों बरती?तो पता चला कि लोग शहरों की तरफ दस पांच हजार की नौकरी ढूंढने निकल गये और लंबे चौड़े पुंगड़े में घास जमी है. कुछ गांव के लोग बोले गांवों का वो ताना बाना अब छिन्न भिन्न हो गया जो साल भर खेत से किसान को बांधे रखता था . इस पट्टी के काश्तकार जो सब्जियों की बदौलत साल भर का खर्च चार महीने की फसल पर निकालते थे आज जीप खरीद कर सवारी ढोते हैं या अन्य कामों को तवज्जो देते हैं मोबाइल और केबिल ने गांव को वर्चुअल अनुत्पादक दुनिंयां में ठेल दिया.

हरदत्त बधानी जी अब बूढ़े हो चुके हैं कोश्या कुटौली तहसील के गांव में अपने खाली खेत देखते हैं कभी खूब जानवर थे दूध बेच के इनकम थी, गोबर की दैल फैल (इफरात) जैविक खाद थी, बहंगी भर भर के मनों शिमला मिर्च और टमाटर वे गरमपानी के बाजार बेच के आते थे पर अब एक गाय है चाय के लिए बमुशकिल दूध होता है. मोबाइल है केबल है खेती खड़पट्ट(उजाड़)पड़ी है.

उत्तराखंड बनने के बाद रेता बजरी लीसा खड़िया तस्कर और ठेकेदार ग्राम प्रधान क्षेत्र पंचायत ब्लाक प्रमुख के पदों से होते हुए विधायक बन गये तो इन्होंने जिन चीजों को आगे बढ़ाया वो लाजिम तौर पर संसाधनों की लूट थी. राज्य की कृषि विकाष का माडल उसमें नहीं था. जल जंगल जमीन की बातें नहीं थी पहाड़ पर ठेकेदारी नजर थी और शराब के ठेके गांव गांव पहुंचाने की नीयत थी.

लोग कहते हैं पहाड़ की विरोधी सरकारें उत्तराखंड बनने के बाद उत्तराखंड की धरती पर बनीं विकास के नाम पर सड़कें काटने जहां तहां पुलिस चौकी खोलने तहसील बनाने बंगले होटल रिसौर्ट बनाने का काम चल रहा है जबकि अगर सरकार की मनरेगा योजना और राशन की दुकान में दस किलो गेहूं, दस किलो चावल और पांच लीटर केरोसीन का संबल मानें तो पहाड़ के लोगों का पलायन रुकना चाहिए था, लोगों को खेती किसानी की तरफ लौटना चाहिए था ऐसा क्यूं नहीं हुआ?

उम्मीद थी बारिश होगी उपराउं धान खिलेंगे पेड़ों पर फल भरेंगे पर ये ओले पड़े अतिवृष्टि हुई सीमांत दुर्गम पहाड़ शेष भारत बनके रह गया डीडीहाट के युवा किसान लोकेश डसीला जी कहते हैं-“हैरान पुरखों की थात (जमीन) है, हैरान बैलों की जमात है. यहां का बसंती गेहूँ एक अदद पानी की गूल को तरसता है,फिर भी हर हिंदी लिखने वाला महत्वाकांक्षी पहाड़ी व्यवसाय के आगे कृषि लिखता है. “.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.