/चुनावी सियासत की भेंट चढा राजीव हत्याकाण्ड…

चुनावी सियासत की भेंट चढा राजीव हत्याकाण्ड…

-प्रणय विक्रम सिंह||

उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के तीन हत्यारों संतन, मुरूगन और पेरारीवलन की मौत की सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दी. जयललिता सरकार ने दो कदम और आगे बढते हुए राजीव गांधी हत्याकांड में सजा पाए 7 मुजरिमों को रिहा करने का फैसला किया है.RajivGandhi

गौरतलब है कि डीएमके प्रमुख करुणानिधि ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट फैसले के तुरंत बाद ही कहा था कि अगर संथन, मुरुगन और पेरारिवलन की रिहाई होती है, तो उन्हें बहुत खुशी होगी. संविधान विशेषज्ञों के अनुसार इस पर अब राज्यपाल को फैसला लेना होगा. राज्यपाल ऐसे मामलों पर केंद्र सरकार से सलाह-मशविरा करके फैसला लेते हैं. वहीं गृह मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक सजा को माफ करने का अधिकारी केंद्र सरकार को ही है, इसलिए राज्य सरकार अपराधियों को जेल से आजाद नहीं कर सकती. हालांकि अी इस बारे में कोई आधिकारिक सूचना नहीं भेजी गई है. लेकिन इस बात ने एक विवाद को जन्म दे दिया है. क्या तमिलनाडु सरकार राजीव गांधी के हत्यारों को माफ करके राजनीतिक ला उठाना चाह रही हैं? अधिकतर सीधे हस्तक्षेप से बचने वाले कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने पिता राजीव गांधी के हत्यारों को रिहा करने के लिए जयललिता पर हमला बोला है. राहुल गांधी हत्यारों को रिहा किए जाने से खुश नहीं हैं. उन्होंने कहा, जब एक प्रधानमंत्री के हत्यारों को रिहा किया जा सकता है तो फिर आम आदमी क्या उम्मीद लेकर जिएगा!

गौर हो कि पूर्व में भी तमिलनाडु की विधानसभा ने राजीव गांधी की हत्या के दोषियों को मृत्युदंड न दे कर उम्र कैद की सजा देने का जो प्रस्ताव पास किया था. और अब जो रिहाई का प्रस्ताव जयललिता सरकार ने पारित किया है वह विशुद्ध रूप से साम्प्रदायिकता है. आश्चर्य है कि यह प्रस्ताव खुद मुख्यमंत्री जयललिता ने पेश किया. प्रस्ताव में यदि निर्णय में विलंब, मानवता की मांग आदि का तर्क दिया गया होता, तब तो गनीमत थी. हालांकि अपनी बात को जायज साबित करने के लिए कई बार शैतान भी बाइबल का हवाला देता है. लेकिन जयललिता ने प्रस्ताव का औचित्य प्रतिपादित करते हुए कहा कि तमिल भावनाओं का सम्मान करने के लिए उन्होंने ऐसा किया है. समझ में आना मुश्किल है कि एक पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या करने वालों का साथ देने के साथ तमिल भावनाओं का क्या मेल है?

दरअसल राजीव गांधी के हत्यारों को लेकर तमिलनाडु में शतरंज की बाजी सी बिछी हुई है. जिसमें एक ओर है सत्तारूढ एआईएडीएमके और दूसरी ओर है विपक्षी डीएमके. इस चुनावी बाजी में एक तीसरा पक्ष भी है, कांग्रेस जो इन दोनों का खेल बिगाड़ने की भूमिका में है. जयललिता सरकार के हत्यारों की रिहाई के फैसले से तमिलनाडु से लेकर दिल्ली तक कांग्रेस बेचैन हो उठी. नतीजतन शाम होते-होते केंद्रीय गृह मंत्रालय ने तमिलनाडु सरकार के फैसले पर आपत्ति जता दी. गृह मंत्रालय ने कहा है कि तमिलनाडु की जयललिता सरकार को राजीव गांधी के हत्यारों को जेल से रिहा करने का अधिकार नहीं है. तमिलनाडु के नजरिए से देखें तो राजीव गांधी के हत्यारों का मामला केंद्र के बजाय एलटीटीई से कहीं ज्यादा जुड़ा है. इस फैसले ने तमिलों को एक बार फिर प्रभाकरन की याद दिला दी है. बाकी बचा काम राजनीतिक दल कर रहे हैं जो वोटों की राजनीति के स्वार्थ के चलते अब तक एलटीटीई की निशानियों को सहेजे हुए हैं. चाहे सत्तारूढ एआईएडीएमके हो या फिर डीएमके ये दोनों दल हमेशा से तमिल भावनाओं की राजनीति करते रहे हैं. आने वाले लोकसभा चुनावों के मौके पर इन्हें तमिल भावनाओं को वोट में बदलने का बैठे-बिठाये एक अनोखा फार्मूला हाथ लग गया है.

वोटों की इस बेरहम राजनीति और सत्ता की चाहत में कांग्रेस ने अपनी ही पार्टी के प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों सजा दिलवाने में अक्षम्य लापरवाही बरती. हत्यारों की दया याचिका राष्ट्रपति के पास 11 साल तक लंबित पड़ी रही. केंद्र में कांग्रेस की सरकार होने के बावजूद गृहमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों की दया याचिका की फाइल पर अपनी राय राष्ट्रपति को भेजने में नाकाम रहे. पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों की दया याचिका निपटाने में देरी के पीछे तमिल सियासत की अहम भूमिका रही है. फांसी में हुई देरी केवल सरकार की लापरवाही नहीं, बल्कि तमिल सियासत से जुड़ी मजबूरी थी. वोटो की तिजारत और अंचल विशेष की भावना के आधार जयाललिता द्वारा की गई कार्रवाई पर अब तो कुछ लोग कहने लगे हैं कि अफजल गुरू के साथ अन्याया हुआ है. यानी जिस तरह तमिलनाडु की तमिल राजनीति ने फांसी की सजा को तमिल भावनाओं से जोड़ने का अपराध किया है, उसी तरह अफजल गुरु की फांसी को मुस्लिमवादी राजनीति से जोड़ने की कोशिश की जा रही है.

कहते हैं, लोकतंत्र सबसे अच्छी प्रणाली है क्योंकि इसमें सभीी की बात सुनी जाती है लेकिन जब लोकतंत्र अपने आप में कोई आदर्श नहीं रह जाता, बल्कि दल तंत्र और वोट तंत्र में बदल जाता है, तब वह समानता, न्याय और निष्पक्षता के मूल्यों का हनन करने का औजार बन जाता है. फांसी जैसे सवाल पर धर्म, जाति और क्षेत्र के आधार पर विभाजन लोकतंत्र का घोर अलोकतांत्रिक इस्तेमाल है. पतन की इस अंधेरी रात में हम वह दीपक कहाँ से ले आएं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.