/ठग बाबाओं का चोखा धंधा, कमाई बेहिसाब, निवेश जीरो…

ठग बाबाओं का चोखा धंधा, कमाई बेहिसाब, निवेश जीरो…

उत्तराखंड का पर्वतीय क्षेत्र बेहद धर्मप्राण रहा है. यहां बेहिसाब मठ मंदिर आश्रम हैं जिनकी अपार कमाई है देशी विदेशी भक्त हैं. बेनामी जमीनें हैं मंदिर आश्रम समिती के ट्रस्टी लाखों में खेलते हैं.fake babas

कैंची का नीम करोली बाबा का मंदिर हो या हैड़ाखान बाबा का मंदिर मायावती आश्रम हाट कालिका हो या अल्मोड़ा का चितई मंदिर श्रद्धा के साथ चढ़ावा भी खूब आता है पर कहां और कैसे खर्च होता है इसको बताने की ना वे जहमत उठाते हैं ना कोई पूछने की हिमाकत करता है. कुछेक आश्रमों, मंदिरों में रोज रसोई भी बनती है  भंग बूटी पीकर भक्त और संचालक सब तल्लीन रहते हैं.

जो स्थापक बाबा थे वो मर गये उनके नजदीकी चेले आज मस्त हैं भक्ति भाव चरस में कुछ ज्यादा ही होता है. और जो जिंदा भगवान हैं वे राजनेता भी हैं प्रवचन भी करते हैं दबा के कमाते हैं इनके आश्रम तो 5 स्टार होटलों जैसे हैं भीतर क्या होता है कुछ पता नहीं. आशाराम के बाप बैठे हुए हैं यहां.

जमीन कब्जाने की बात तो आम है इसको कौन पूछे. इनकी अपराधी टाईप खूंखार भक्त फोर्स होती है जो ज्यादा भीतर की बातें जानने की कोशिश करेगा यकीनन वो परम समाधि में ही लीन कर दिया जायेगा. इन बाबाओं ने अपनी अपराधी गाड़ियों से हरिद्वार में भक्तों को प्रभु से तत्काल मिला दिया था पिछले कुंभ मेले में क्या हुआ? कोई चूं तक नहीं बोला निशंक नाम का सी एम जो इतना बोलता था इस बारे में कभी कुछ बोला?

विचार मीमांसा नाम की एक भड़काउ आग लगाउ पत्रिका आयी. एक दिन उसने सतपाल महाराज के भाई के आश्रम के बारे में लिखा था कि वहां चरस गांजे का क्विंटलों अंबार था और कमाई तो कांरु का खजाने जैसी थी. भाजपा के ही ठग बाबा नहीं होते कांग्रेसियों ने भी सैकड़ों बाबा और आश्रम वगैरह पाले पोसे हैं. आशाराम तो कमाई कर करके बमकने लगा था और बेहद टुच्चे स्तर पर उतर आया था सो उसके दिन पूरे होने ही थे. पर ये पूरे घुन्ने गुरुघंटाल हैं. चेहरे से ही कुटिल कसाई लगते हैं. चरबी की परतों भरे चेहरे पे भाव भी चरबी में दब जाते हैं.

भाजपा कांग्रेस के अलग अलग आश्रम साधु मठ मंदिर हैं. इनके स्टाफ बेहद जांच परख कर रखे गये हैं. इनके भीतर यकीनन अभी लाखों काले कारनामे और काली नीयत के भांड और धूर्त बैठे हैं. भक्त बनकर ही सही, इनके आस पास, बाहर भीतर कभी जरुर जाइये, लंबलेट होकर पांव पकड़िये, रसोई जीमिये, गांजे की दम भरिये और खोजी नजर और जेम्स बांण्डिया दिमाग खोलिये. मन में आपके क्या चल रहा है ये कोई नहीं जान पाऐगा. माथे पर छापा तिलक लगाइये दो एक दिन आश्रम में भगत बनकर रहिए अपने पल्ले का पैसा खर्चने की जरुरत नहीं. इनके भीतर से जरुर कुछ बाहर आयेगा. पर ध्यान रखें, पूछताछ न करें, अपने दिमाग से समझें, आंख से देखें कानों से सुनें. कैमरा स्टिंग रिकार्ड़िंग कीजिये पर बचकर.

(जारी)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.