/कल तक चेले थे, स्वयंभू भगवान बन बैठे…

कल तक चेले थे, स्वयंभू भगवान बन बैठे…

बैरगिया नाला जुलम जोर..नौ कथक नचावें तीन चोर…

उत्तराखंड के जनमानस में भक्ति एक जमाने में ईश्वर को शुकराना भेजने का माध्यम था, रोज खटती जिंदगी में हर कामकाजी अपने ऊपर अदृश्य ताकत का शासन मानता था और उसके प्रति जबाब देह था. यूं तो हर कथा जागर भड़ वीर का इतिहास उठाकर देखिये, संताप और उपेक्षा के मारे समाज के जातीय ढ़ांचे में कसमसाते आम विद्रोही मिलेंगे जो समकालीन बंद धार्मिक ढांचे की ढांचे के भीतर ही सुधार की मांग कर रहे थे और सवर्ण राजसत्ता को ये नागवार था बदले में शहादतें हुईं वे उनके चाहने वालों के गीत कथा में ढलकर अवतारी बन गये.uttrakhand-tourism

अगर थोड़ा पीछे चले जाएँ यही कोई 25 साल तो यही वह समय है जब गाँव पट्टी के मंदिरों और पारंपरिक देवताओं के बीच कुछ भक्त फकीरनुमा मध्यमवर्गीय जोगटे और कुछ भीतरी उत्तराखंडी समाज के पूर्व जमींदार, थोकदार और पुरोहित समाज से आये कुछ लोग इलाकावार आस्था को जनश्रुतियोँ बतकही किस्सागोईयों से जोड़ने लगे. गाँव की महिलाऐं प्रचार का अच्छा माध्यम थीं. किस्सों में अपनी मौलिकता मिलाकर बात आगे पहुंचती थी. आप इन तमाम मठ आश्रमों के शुरुआती संपर्कों को ढूंढ़िये पुराना किराना दुकानदार, बड़ी जोत का पहाड़ी काशतकार, सड़क का पुराना ठेकेदार शादियां कराने वाला पुराना उच्च कुलीन ब्राह्मण और इलाके का दबंग ठाकुर परिवार के पिता, दादा लोग इनको बसने, बैठने, जमने जमाने में मदद किये हैं. जनता के चंदे और निशुल्क कार सेवा श्रम की बदौलत शुरुआती ठिया ठिकाना बना. मजे की बात इसमें दलित परिवारों के खास लोगों को भयमिश्रित अनुराग के साथ बाहरी दहलीज तक प्रवेश दिया गया और आज भी वे बाहर ही हैं इनकी इनर संचालक कोर में कहीँ नहीं हैं.

यहां बाजार था, गांव की जरुरतें थी और श्रद्धा को बाजार में लाने या श्रद्धा का बाजार बनाने की व्यावसायिक समझ थी. आज देखिए क्या खूब परिणाम मिला उस आश्रम या मंदिर का इन 25 सालों में भव्य चमाचम निर्माण हो चुका है. दसियों सैकड़ों हजारों से होते हुए लाख तक का गुणात्मक विकास हुआ. आस पास की प्रापर्टी ओर प्रबंध कमेटी में वे ही लोग हैं जिनके पिता या दादा ने स्वयंभू भगवान बाबा आदि के साथ घुटकर चेलवाई की थी.

पहले तो ये भक्त उपासक फकीर बनकर आये पारंपरिक देवता के नाम पर मंदिर आश्रम बनाया. समय बीता तो खुद स्वयंभू अवतारी चमत्कारी बन गये. भगवान दूसरे नंबर पे आ गया क्या चालाकी है! ये आस्था के शातिर चोर व्यौपारी हैं इनपर खोज खंगालने की जरुरत है वरना- “बैरगिया नाला जुलम जोर, नौ कथक नचावें तीन चोर.
गलचौर करें मेवा खाऐं, अव्वल दर्जे के मुफतखोर!”

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.