/परकाया प्रवेश हर दिन नहीं हो पाता है…

परकाया प्रवेश हर दिन नहीं हो पाता है…

-उज्जवल भट्टाचार्य||

मायावती कुछ भी बोले, वह मायावती लगती है – कुछ-कुछ अमिताभ बच्चन की तरह, लेकिन पूरी तरह से नहीं. यही बात लालू या मुलायम के बारे में भी कही जा सकती है. मेरे ख़्याल से सोनिया में भी यह बात है. बाकी सारे नेता मुझे मेथड ऐक्टर लगते हैं – लेकिन नाटक मे दिलचस्पी रखने वाले जानते हैं : परकाया प्रवेश हर दिन नहीं हो पाता है.modi

एक मित्र ने पूछा कि मेथड ऐक्टर क्या होता है ? मैंने जवाब दिया – यह अभिनय का एक सिद्धांत है. रूसी नाट्य सिद्धांतकार स्तानिस्लाव्स्की ने इसका प्रतिपादन किया था. आप हिंदी में इसे परकाया प्रवेश कह सकते हैं, यानी अपनी भूमिका में पूरी तरह समा जाना. कथकली नृत्य में इसे किया जाता है. कलाकार मेकअप के बाद सो जाता है, कार्यक्रम से पहले जब जागता है तो रावण या किसी दूसरे पात्र के रूप में. पृथ्वीराज कपूर में यह बात थी, नसीर में भी है. इसके विपरीत चाहे दबंग हो या भिखारी – अमिताभ बच्चन हमेशा अमिताभ बच्चन रहा.

मिसाल के तौर पर, मेरी राय में कत्थक में मेथड ऐक्टिंग नहीं होती है. वहां कलाकार अपने देह को एक छंदमय गतिशील चित्र की तरह प्रस्तुत करता है. आप साफ़-साफ़ देख सकते हैं – मंच पर कलाकार एक व्यक्तित्व है, और अपने देह के माध्यम से वह अपनी कला प्रस्तुत कर रहा है. दोनों जुड़े हैं, लेकिन एक नहीं हैं.

राजनीति का मंच भी एक मंच है, जहां दर्शकों को ध्यान में रखा जाता है. और उसी के साथ अभिनय और उसकी समस्यायें भी सामने आती हैं.

यहां हमें तीन प्रतिभास दिख रहे हैं : मेथड ऐक्टिंग या कथकली की तरह परकाया प्रवेश ; कत्थक की तरह कला का वस्तुकरण या ऑब्जेक्टिफ़िकेशन, जो ब्रेष्ताने एलियेनेशन के लिये जरूरी है ; और तीसरा है अमिताभ बच्चन, यानी आप प्रोडक्ट के रूप में एक अमूर्त छवि तैयार करते हैं, और अभिनेता हर भूमिका को उसी छवि में ढालता है. यह तीसरा प्रतिभास हमें आज मोदी में दिख रहा है. और इस प्रक्रिया की पराकाष्ठा हमें देखने को मिलती है, जब हज़ारों दर्शक मोदी का मुखौटा लगा लेते हैं. मोदी से जुड़ने के लिये मुखौटा लगाना लाज़मी हो जाता है. सिनेमा हॉल में जाने वाला हर युवक थोड़ा सा अमिताभ बच्चन हो जाता है, अपने असामर्थ्य को पाटने के लिये वह अमिताभ जैसी पोशाक पहनता है, इसी तरह ये दर्शक मोदी बनना चाहते हैं, और अपने असामर्थ्य को पाटने के लिये मुखौटा लगा लेते हैं.

आज के राजनीतिक मंच पर मोदी अमिताभ बच्चन हैं. लेकिन जिस मंच पर वह हैं, वहां दो या तीन घंटे का हिसाब नहीं चलता.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.