/महारानी, अब नहीं चलेंगे ये टोटके..

महारानी, अब नहीं चलेंगे ये टोटके..

-दिनेशराय द्विवेदी||

दो माह पहले हुए विधानसभा चुनाव में महारानी ने राजस्थान में सारे रेकॉर्ड तोड़ दिए. ऐसा बहुमत भाजपा को भूतकाल में किसी राज्य में नहीं मिला. महारानी ने साहिब को वादा कर दिया, लोकसभा में 25 सीटें उन्हें राजस्थान देगा. वे अब उस वादे को निभाने के लिए शतरंज बिछाने में लगी हैं. उत्तरी मध्यप्रदेश का नगर ग्वालियर उनका मायका है. उन्होंने धौलपुर को अपना ससुराल बनाया था. पर विवाह के साल भर बाद ही धौलपुर तो उनसे छूट गया. जब राजनीति में उतरीं तो राजस्थान का दक्षिण पूर्वी कोने में बसे झालावाड़ को अपना चुनाव क्षेत्र बनाया. अब राजस्थान की बहू राजस्थान की महारानी हैं. भाजपा वालों को भले ही भारत की बहू सोनिया पर भरपूर एतराज हो, पर कम से कम अपनी सिंधिया महारानी के वे पूरे भक्त हैं.vasundhraraje

महारानी के लिए झालावाड़ इस कारण सबसे माफिक जगह थी कि वह राजस्थान के सबसे पिछड़े जिलों में से एक था. जहां के लोग आजादी के 67वें साल में भी सामंती संबंधों और मानसिकता को जी रहे हैं. राजघरानों के प्रति स्वाभाविक अनुराग अभी भी विद्यमान है. राजपूत जमींदार अभी जीवित हैं. आबादी में बड़ी संख्या में आदिवासी हैं. आज भी महाजनी कर्जों का जाल फैला हुआ है और गांव-गांव में जातियों और संप्रदायों के गोल बचे हुए हैं. महारानी को वहां अपना प्रभाव बनाने के लिए बड़ा श्रम नहीं करना था. केवल जातियों और संप्रदायों के इन समूहों के प्रभावशाली लोगों से थोड़ा अपनापा बनाकर उन्हें अपने खास लोगों में शामिल करना था, जो उनके लिए अत्यन्त आसान काम सिद्ध हुआ.

महारानी को राज के लिए बना बनाया क्षेत्र मिल गया था. झालावाड़ नगर की गली-गली में उन्होंने सीमेंट कंक्रीट की सड़कें बनवा दीं. उस क्षेत्र के लिए यही बहुत बड़ी उपलब्धि थी. एक-एक मेडिकल और एक इंजिनियरिंग कॉलेज उनकी कीर्ति को ऊपर चढ़ाने के लिए पर्याप्त था. इससे अधिक की गुंजाइश वहां थी नहीं. यदि वे वहां औद्योगिक विकास को आगे बढ़ा कर पुराने सामंती आर्थिक सामाजिक ढ़ांचे को आधुनिक बनाने का प्रयत्न करतीं तो अपनी ही जड़ें खोदतीं. नतीजा यह हुआ कि उन्होंने उसके लिए कोई प्रयास नहीं किया. कुछ उद्योगों का विकास स्वयमेव तरीके से होने वाला था तो उसे हतोत्साहित भी किया. इस सामाजिक ढांचे के कारण वे अब अपने निर्वाचन क्षेत्र से पूरी तरह निश्चिंत हैं. इसके बाद चुनाव में भी उन्होंने उसकी अधिक परवाह नहीं की. उनका बेटा भी अपने पैतृक क्षेत्र धौलपुर से नहीं झालावाड़ से सांसद है, अगले 25 सवारों में वह फिर से शामिल रहेगा. इतने सुरक्षित क्षेत्र को छोड़ कर अपने पैतृक क्षेत्र की तरफ क्यों जाया जाए?

महारानी की ससुराल धौलपुर भरतपुर संभाग का एक जिला मुख्यालय है. पिछले विधानसभा चुनावों में भाजपा के लिए वही सब से कमजोर क्षेत्र सिद्ध हुआ था. भरतपुर को जीते बिना 25 में 25 के लक्ष्य का संधान करना उन के लिए दुष्कर सिद्ध हो सकता है. यही कारण है कि दुबारा मुख्यमंत्री पद पर आसीन होने के बाद से महारानी वहीं जमी हुई हैं. यहां तक कि मंत्रीमण्डल की बैठकें तक भरतपुर में की जा रही हैं. जिससे भरतपुर संभाग के लोगों को यह अहसास दिलाया जा सके कि महारानी उनके प्रति बहुत चिंतित और सजग हैं. इसके साथ ही उन्होंने अपनी जीवन शैली में भी नाटकीय परिवर्तन किए हैं. मुख्यमंत्री निवास के बदले उसी मकान में रह रही हैं जिसमें वे पिछले विधानसभा की विधायक होते हुए निवास कर रही थीं. कहीं भी सड़क के किनारे चाय की दुकान पर चाय पीने रुक जाती हैं. किसी साधारण ज्योनार में साधारण लोगों के बीच बैठकर भोजन कर लेती हैं. पॉप्युलर बने रहने के वे सारे टोटके आजमा रही हैं जिन्हें वे अपने निर्वाचन क्षेत्र झालावाड़ में पहले भी आजमा चुकी हैं.

पर शायद उन्हें पता नहीं कि भरतपुर संभाग में आजमाए जा रहे इन टोटकों के कारण झालावाड़ के लोग नाराज हैं. वे समझने लगे हैं कि महारानी चालाकी से काम ले रही हैं. झालावाड़ से निश्चिंत होने के बाद उन्हें भूल ही गई हैं. उधर भरतपुर में भी संदेश ठीक नहीं जा रहा है, भरतपुर के लोग भी ये समझ रहे हैं कि ये सब महारानी के टोटके हैं, चुनाव के बाद उन्हें भरतपुर की सुध लेने की सुध भी रहेगी या नहीं, कहा नहीं जा सकता.

उधर अशोक गहलोत की पिछली कांग्रेस सरकार ने राज्य की जनता को सबसे बड़ी राहत मुफ्त दवा और जांच योजना के अंतर्गत प्रदान की थी. लोगों का रुख निजि अस्पतालों से सरकारी अस्पतालों की ओर मुड़ गया था. वहां दवाएं बिल्कुल मुफ्त मिलने लगीं थीं, जांचें मुफ्त होने लगी थीं. इससे आम जनता बहुत खुश थी. महारानी ने जिस तरह सरकार बनाते ही उस योजना को पुनरावलोकन में उलझा दिया उससे अस्पतालों को नए बजट और दवाएं न मिलने से रोगी फिर से दवा बाजार में नजर आने लगे हैं. जिससे आम लोगों में धीरे-धीरे नई सरकार के प्रति नाराजगी पनपने लगी है. राज्य के सबसे प्रमुख अस्पताल सवाई मानसिंह अस्पताल हालत खस्ता होने लगी है. इस अस्पताल की अव्यवस्थाओं को लेकर उच्च न्यायालय ने सरकार से विकास की कार्ययोजना बताने को कहा था. जिसके जवाब में सरकार की ओर से कहा गया कि न्यायालय हमारे काम में दखल न दे, यह कार्यपालिका का काम है, हमें राज्य भर के लोगों की चिकित्सा व्यवस्था भी देखनी है. राज्य सरकार के इस जवाब ने राज्य भर के लोगों में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा में उत्पन्न हुई कमी से जो नाराजगी की आग पनप रही थी, उसमें घी डालने का काम कर दिया है.

विधानसभा चुनाव के परिणामों के बाद दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सफलता के बाद राज्य भर में पार्टी इकाइयों की गतिविधियां असामान्य रूप से तेज हो गई हैं. रोज लोग आम आदमी पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर रहे हैं. इस बार के लोकसभा चुनावों में आप की उपस्थिति भी कमजोर नहीं रहेगी जिससे विधानसभा चुनावों में कांग्रेस से टूटे मतदाताओं का जो लाभ भाजपा को अनायास मिला था उसका प्रवाह आम आदमी पार्टी की ओर मुड़ेगा. भाजपा के वोटों में बड़ी संख्या में कमी होगी. राजस्थान में मोदी की ब्रैंड मार्केटिंग का जो लाभ दो माह पूर्व विधानसभा चुनावों में भाजपा को मिला था उसका जादू लगातार टूट रहा है. अगले दो माहों में इन सब चुनौतियों से निपटना महारानी के लिए आसान नहीं होगा. अगले माह के आरंभ में आचार संहिता लागू हो जाएगी. फिर कोई वायदा करना कठिन होगा. महारानी यदि एक सप्ताह में राज्य के भविष्य के संचालन की रूपरेखा जनता के सामने स्पष्ट नहीं कर पाती हैं तो 25 में 25 का लक्ष्य असंभव है. ऐसे में भाजपा राजस्थान से आधे निर्वाचन क्षेत्रों में भी अपने सांसद जिता पाती है तो वह पर्याप्त होगा.

Facebook Comments

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.