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लाइव ड्रामा: विश्व पुस्तक मेला-पहला दिन..

By   /  February 24, 2014  /  No Comments

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-सुभाष गौतम||

लाइव ड्रामा- आज विश्व पुस्तक मेला का पहला दिन था. हिंदी के प्रकाशकों को हाँल नं 18 में ठेकाया दिया गया है, जैसे गाँव में कुजातीय बियाह (विवाह) के बाद ऊढरी बहुरिया को कोने-अतरे में एक खटिया और दो मैला-कुचैला गुदरा देकर कहा जाता है कि इसे अपना ही घर समझिए पतोहू! तनिक सकेत है. ठीक उसी प्रकार से हिंदी के प्रकाशकों को “कबूतर खाना” में ठेकाया गया है.world book fair 2014 in delhi

हॉल नं 18 में पाठकों को प्रकाशकों तक पहुचते-पहुचते इतना उंच-नीच हो जाता रहा हैं कि चार प्रकाशकों की पुस्तकें देखने और खरीदने के बाद जब पाठक निलकता है तो दम फूलने लगता है. इस हाँल नं में निचे में पाठक पुस्तक देखने-खरीने में व्यस्त थे और स्टालों के ऊपर कबूतर खच-मच खच-मच की संगीत करते रहते हैं. माहौल फीका-फीका सा लग रहा था. प्रकाशक इस हाँल नं में मोटे-मोटे दीवार नुमा पिलर देख कर नेसनल बुक ट्रस्ट को कोस रहे थे वहीँ दूसरी तरफ कल सुबह कबूतरों लेंडी (बिट) पुस्तक से साफ करने में काफ़ी समय गावा देंगे. हिंदी के कुछ प्रकाशकों को तो हाँल नं 10 हाँल नं 14 अदि में चकमक प्रकाशकों और अन्य भाषा के प्रकाशकों के बिच में ठेका दिया है, जहाँ हिंदी के प्रकाशक चकचोनहरा गए हैं. कई प्रकाशक तो अन्य भाषाओँ के हाँल में एलाट किए गए स्टाल पर पुस्तक लगाने से इंकार कर दिया है और आयोजक नेसनल बुक ट्रस्ट का बिरोध कर रहे हैं.

हिंदी लेखकों का कोना (आथरस कार्नर) भी ऐसी जगह केने-अतरे में दिया है जहाँ पर मंच के ठीक बगल में शौचालय घर है. इस लेखक मंच को देख कर ऐसा लग की हिंदी के प्रकाशक लिखते कम निपटते (शौच) ज्यादा है. इस हाँल नं 18 की एक और कहानी है कुछ लोग यहाँ हस्त रेखा देखे और जन्मपत्री बनाने वाली नक्षत्र संस्था को पूछते हुए आते है और गीता प्रेस के स्टाल से हनुमान चालीसा लेकर वापस चले जारहे है. हिंदी के प्रकाशकों को इस पुस्तक मेला को लेकर बहुत उम्मीद थी. वहीँ कुछ नए प्रकाशक अपनी पूंजी लगा कर इस मेले में आये हैं. देखना यह होगा की आगे आने वाला दिन कैसा बीतते हैं. हिंदी प्रकाशकों की सहूलियत और सुविधा की नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा की गई इस अनदेखी के वावजूद अभी उम्मीद बची है. हिंदी भाषी खोजते हुए आएंगे चाहे कोना-अतरा में हिंदी प्रकाशकों को ठेकाए या कबूतर खाना में. हिंदी के पाठकों के विवेक और हिंदी से जुडे प्रेमियों पर निर्भर करता है कि मेला कितना सफल रहेगा

नोट- अगर किसी के साथ उच्च नीच हो जाए तो बनारस की ठंढई पीके भुला दीजिए. अइंचा-पइचा, इजरी -पिजरी का महिना है…

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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