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लाइव ड्रामा- तिथि 16 फरवरी दिन रविवार विश्व पुस्तक मेला..

By   /  February 24, 2014  /  No Comments

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-सुभाष गौतम||

लाइव ड्रामा- तिथि 16 फरवरी दिन रविवार विश्व पुस्तक मेला प्रगति मैंदान का दूसरा दिन था. हिंदी प्रकाशक नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा अपने साथ किए गए उंच-नीच को भुला के भोरे-भोरे दंतुअन-कुल्ला के बाद दू रोटी का पनपियाव कर के भागे-भागे पुस्तक मेला पहुच रहे थे. प्रवेश द्वार पर टिकस खरीदने वाले लोगों की भीड़ देख कर प्रकाशक बहुत प्रसन्न हुए थे कि आज रविवार का दिन हैं पुस्तक का रेला-ठेला ठीक चलेगा, पर यहाँ ठीक उल्टा था. कुछ पाठक खरीदने वाले तो थेड़े बहुत पाठक तसिलने वाले थे. तसिलाने वाले लोगों में खास कर रंगीन पत्रिकाओं के समीक्षक थे. जो कभी कुछ लिखते नहीं प्रूफ और नोकता-चीनी की सफाई करने वाले पक्षकार किस्म के मनई.DE10_CITY_PG3_4COL_1359251f

हिंदी प्रकाशकों का हाल नं 18 में प्रवेश द्वार से घुसने पर चारो तरफ दीवार पर तंत्र-मन्त्र, योग-भोग वाले प्रकाशकों ने अपना बैनर-पोस्टर ऐसे चस्पा किया था जैसे गाव की गोसाई काकी देवाल पर चिपरी पाथती थीं. सबसे अधिक सम्मोहन वाला प्रकाशक गीता प्रेस रहा, जो हनुमान लंगोटी, राम-लखन धोती और खडाऊ पुस्तक के स्टाल में ऐसी भीड़ जुटान किया था जैसे प्रकाशक न होकर तरकारी बाजार का कुजडा हैं. दूसरी तरफ बनवारी लाल प्रकाशकों ने पुस्तकों को इस प्रकार सजाया था जैसे गोहरा पाथ के डाणा (इट नुमा) लगाया हो मानों सूखने केलिए छोड़ा गया है और अषाढ़ के महिना में उपयोग होगा. हिंदी के प्रकाशकों का धंधा गरम नहीं था पर नरम भी नहीं था कुल मिला के ठीक रहा. प्रभात प्रकाशन मान मार के बैठा था जैसे नरेंद्र मोदी का इंतजार कर रहा हो कि कब सरकार बने और हम मॉल खपाएं. एक उत्तर कोना में सेमिनार हाल था जिसमे हंसी की पुचकारी विषय पर सेमिनार चल रहा था. लेखाकों का कोना दोपहर बाद ऐसे चल रहा था जैसे जाड़ा में मनई कौऊड़ा तापते हैं, साथ में कसी गंभीर समस्या पर बतकूचन करते हैं ठीक उसी प्रकार था.

मेले के दौरान लेखकों में पुस्तकों की कम फेसबुक और टूटर नामक अवजार की चर्चा अधिक हो रही थी. एक साहित्यकार तो कह रहे थे कि फेसबुक ने लोगों के लेखक बना दिया है. छात्रों को प्रवेश केलिए पहचान-पत्र दिखाने पर 50 % की दी जाने वाली छुट इस बार ख़त्म कर दिया है. टिकस खिड़की पर पूछने पर बाबु बोला की केजरीवाल ने छुट ख़तम कर दिया है. प्रगति मैंदान में चाय 20 रुपया से शुरू होकर 80 रुपये तक की थी जिसका मूल्य पूछकर लोग वापस चले आते थे, कुछ मज़बूरी में पीते भी रहे थे. पानी का नल तो ऐसे बंद पड़ा है जैसे रविश कुमार की रिपोर्ट बंद होगई हो. जनता को अपना झुराइल गला तर करने केलिए मात्र ३० रूपये खर्च करना पड़ता है. इस साल प्रकाशित पुस्तकों में ज्यादातर पुस्तकें कविता की हैं.

नोट- अगर किसी के साथ उच्च नीच हो जाए तो बनारस की ठंढई पीके भुला दीजिए. अइंचा-पइचा, इजरी -पिजरी का महिना है…

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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