/लाइव ड्रामा: जब मैं भनभना के भागने लगा. .

लाइव ड्रामा: जब मैं भनभना के भागने लगा. .

-सुभाष गौतम||

लाइव ड्रामा- विश्व पुस्तक मेला का चौथा दिन. दिनांक 18 फरवरी दिन मंगलवार, प्रगति मैंदान मेट्रो स्टेसन और बहार सडक में लगे बैनरों, पोस्टरों में पुस्तक मेला की कोई चर्चा नहीं. नेशनल बुक ट्रस्ट इससे पहले दो चार पोस्टर बैनर चस्पा कर दिया करता था, जिसे पिकनिक स्पाट को जाने वाले यात्री उतर कर पुस्तक मेला का दर्शन कर आते थे सो इस बार नहीं है. मेट्रो स्टेसन और बहार की सडकों पर “अमेज़न डाट इन” का विधुतीय किपात पढ़ींए (इ बुक रीडर) का मशीन का विज्ञापन जरुर लगा है, जिसको जनता चिहा के देखती है. इस पोस्टर को देख कर एक दम्पति हाता नं १२ में पूछते पूछते पहुचे. “अमेज़न डाट इन” के गुमटी से बीबी कोहना को भागी और बोली की 40 रुपिया भी गया और कुछु भेटाया भी नहीं.IMG_2048

मेला में अगर आप लेखक/कवी है तो इस सदमे में मत रहिए की आप का भाषण/व्याख्यान/कविता संगीत मेला ठेला में कोई सुनने आयेगा. अपना श्रोता अपने साथ लेके चलिए. अगर आप दिल के कमजोर है तो मेला नहीं पार पईएगा दिल की बीमारी हो सकती है. आईए एक और बात बताते हैं. हाता नं 14 के सामने एक खाना-पान, चाय-साय का चौपाल लगा है. उस चौपाल पर लेग जाते है और चाय काफ़ी का दाम पूछ कर वाह से ऐसे भागते है जैसे किसी गुप्त क्लिनिक की दुकान से सभ्य आदमी पोस्टर देख के भागता है. चाय का दाम मात्र ७० रुपिया है. हाता नं १२ के सामने भी एक चाय की दुकान है जहा पर चाय काफ़ी का दम ३० रुपिया है. इस मामले को जानने केलिए हाता नं १२ में ढुक गया. एक पुस्तक बेचन वाली गुमटी देखि बहुत झालर मलार लगाया रहा और गुमटी के सामने ललका फीता से घेर दिया था और लिख दिया था नो इन्ट्री. मैंने कहा जब गुमटी लगाए भैया तो बेचते क्यों नहीं. आगे बढ़ा ओशो बाबा का गुमटी था एक सुंदर कन्या ललका पोसाक पहनी थी और किसी से गले ऐसे मिल रही थी, जैसे लोग विदाई के बाद भेट-घाट करते है. गनीमत थी की रो नहीं रही थी. मैंने सोचा इसका कोई करीबी या रिश्तेदार होगा. मैंने भी गुमटी में ढूका. उस गुमटी में चाकबादुर जैसे चिहा चिहा के देख रहा था. कि एक स्त्री ने मुझे ओशो की पुस्तकों के बारे में बताने लगी तभी भेट-घाट करने वाली युवती बिच में टपक पड़ी और बोली सन्यासी जी को मैं बता देती हूँ. सन्यासी जी को बातों-बातों में, आखों आखों में, ओशो के विषय में बिस्तर से बताया थोडा देर में अंदर ही अंदर उछ्नर होने लगी सोचने लगा की कैसे पीछा छुडाऊ. खैर वह दिव्य छड आ ही गया जब मैं भनभना के भागने लगा. युवती बोली सन्यासी जी ! गले मिलने केलिए मेरे कंधे तक उसके खुबसूरत हाथ पहुचे ही थे कि मैं हडबी में हाथ जोड़ कर बोला माते फिर कभी आता हूँ और रोकेट की तरह वहा से उड़ा. बाप रे बाप यही लोग सन्यासी को बनबास बना देते है. सोचते हुए घर पंहुचा. अब किसी माजार पर जाने की जरुरत पड़ गई है…

नोट- अगर किसी के साथ उच्च नीच हो जाए तो बनारस की ठंढई पीके भुला दीजिए. अइंचा-पइचा, इजरी -पिजरी का महिना है…

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.