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लाइव ड्रामा: जब कबर ही खोदना था तो इतना तारीफ में टीला काहे खड़ा किए..

-सुभाष गौतम||

लाइव ड्रामा- विश्व पुस्तक मेला प्रगति मैदान नई दिल्ली, का छठा दिन, दिनांक 20 फरवरी दिन बृहस्पतिवार. पुस्तक मेला के हाता नं 18 में अथर कार्नर पर राजकाल प्रकाश से प्रकाशित पुस्तक “तिनका तिनका तिहाड़” का लोकार्पण और परिचर्चा शुरू ही हुआ था कि किसी उजबक ने कान में मुह सटा के बोला ‘बहुते खर्चा भरा पोग्राम हैं जी, फुल-पत्ता सतरंगी खटिया (चारपाई) बहुते जबरजत है कुछ लोग तो यही सब देखन आया होगा’. दूसरा बोला बुडबक ‘तिहाड़ जेल का महिला कैदिया सब भेजवाई हैं सुश्री वर्तिका जी को आज बिहार करने के लिए. वैसे तो इस पुस्तक की संपादक/ आथर विमला मेहरा भी थीं जो आथर कम पाथर ज्यादा लग रहीं थी. उनका व्यक्तित्व व् संघर्ष झांक रहा था तो दूसरी अथर का छलक रहा था. यह किताब अद्भुत है पहले देखि फिर संघर्ष के पश्चात वाचिए. इस किताब में एक अनूठा प्रयोग है दो पेज आपस में चिपके हुए है. जिसे पढ़ने केलिए पन्नो को खोलना होगा, ठीक वैसे ही जैसे किसी को रिहा किया जाता हैं.naqvi

जिसका इस्तेमाल वर्तिका जी ने बताया. जनता ने चिहा के देखा और कहा यह तो ऐसे दिखा रहीं है जैसे सोटा (सर्फ़) का व्यवसाइक प्रचार (विज्ञापन) कर रहीं हैं. खरीदते समय इस कितव में पाठक सिर्फ फोटू देख सकित हैं अंदर का सामग्री नहीं बाच नहीं सकित हैं. इस किताब का पन्ना बिना ख़रीदे फाड़ दिए तो पुस्तक को खरीदना अनिवार्य हैं, वर्ना तिहाड़ का विहार करा दिया जायेगा.

विमला जी ने थोडा बोला और पाठक ने ज्यादा समझा जैसे चिट्टी में लोग लिखते हैं “मई के मालूम की हम ठीक बानी थोडा लिखना जयादा समझाना” ठीक वैसे ही. दूसरी लेखिका ने अपने भाषण में कहा की “हमको माइक के सामने कुछ-कुछ होता है”. मंच पर एक भारी लेखक, पक्षकार, भाषा विज्ञानी जिन्होंने आजतक टीवी की भाषा को आम से खास बनाया इतने तारीफ के पुल बांधने के बाद एंकर चोकर के बोला यहा कबर वहिद नक्वी जी हमारे बिच हैं. भाई जब कबर ही खोदना था तो इतना तारीफ में टीला काहे खड़ा किए, साथ में श्रुश्री वर्तिका जी को भी एक्टिविस्ट बता. इस पुस्तक की रायल्टी/ पारिश्रमिक किसको दिया जायेगा यह बात मैंने नहीं सुनी क्यों की यह सब बात सुन नहीं पता. जो इस पुरे आयोजन की सबसे अच्छी बात थी.

हाता नं 18 से बहार में रोज भोरे- भोरे फोर्टिस हास्पिटल का एम्बुलेंस हिंदी लेखकों को बीमार करने के इंतजारी में खडी रहती हैं. ठिक वैसे ही जैसे महापात्रों (महाबाभन) की बेगमे भोर में सील-बट्टा (सीलवट-लोढा) उलट कर कहतीं हैं कि हे महापात्र भगवान आज कोई बड़का जजमान परलोग सिद्धारे और सवा-सवा कुंटल चावल, दाल पिसान मिले घर के डेहरी में रखने की जगह भी न बचे. लेकिन संजोग की हिन्दी का बुजुर्ग लेखक भी बहुत चतुर हैं पुस्तक मेला में आता ही नहीं है। जेब कटाने केलिए एनबीटी एमबुलेंस बुलाले या हास्पिटल.

हाता नं. 8 में साहित्य मंच बनाया गया है, जो दखिन कोना में स्थित हैं खास कर कुजात चर्चा केलिए. जहा से कोई हवा-बतास सवर्णों में न पहुच सके. इसी कुजात साहित्यिक मंच में दलित लेखक मोहन दास नैमिसराय कि पुस्तक ‘‘भारतीय दलित आंदोलन का इतिहस और भविष्य’’ पर चर्चा थी। लेखक न मोहन हैं, न दास हैं, न नेम हैं, वह सिर्फ व सिर्फ सराय हैं। सराय जी के सराय में हर वर्ग के लोगों का स्वागत होता है। वहा हर चिज दिखती है बिकती नहीं है -जैसे यह पुरस्कार मैंने लंदन में पाया था, इसे जर्मनी से लाने में बडा खर्च हो गया। पहले मैं चपल पहन के पैदल चलता था, साइकिल से चलता था अब कार से चलता हूं! यही उनका संघर्ष हैं. सराय के सराय में दलित लेखिका अनीता भारती को जब बुलाया गया तो बड़ा सोच विचार में थीं कि उनको इस सराय यात्रा में क्यों बुलाया जरहा है पर पहुचाते उनको उनका जबाब मिल गया. दखिन टोला सराय में दलित ब्राहमण बजरंग बिहारी जी को संचालन दिया गया था. उनकी गति पवन सूत जैसी नहीं थी पूछत-पाछत पहुचे कोई कह रहा था कि नाम के सिर्फ हनुमान इनका बस चले तो संजीवनी पहाड़े फुक देंगे. इस आयोजन के वक्ता यह सोच के तय किया गया होगा की यह लोग अपने कुछ साथियों को बुलाएंगे या कुछ फलोवर पहुच जायेंगे पर ऐसा हुआ नहीं. भगवान दास मोरवाल को भी बुलाया गया थायह सोच कर की रेत का खेत बढ़िया जोतते और हेंगाते है. वह भी मन मसोस के इस तेर के खेत में पहुचे थे पर उन्हें भी निराशा हाथ लगी.

तुलसीराम के साथ जेएनयू से दस छात्र उनको सुनने आते थे उस समय कोई अटेंडेंट भी नहीं था. सराय जी से दो चार लोग आक्रांत थे इस लिए की वो भाषण देते हैं तो बाखोर लेते हैं लेकिन वह प्रकाशक के प्रति इतना कृतज्ञ थे कि कुछ बोल ही नहीं पाए. दलित भविष्य पर कम पुस्तक के भविष्य पर उन्होंने दो बात कहीं पहली बात-पुस्तक के विषय में समीक्षक लिखेंगे और दूसरी बात कि पुस्तक देश की प्रमुख पुस्तकालयों में पहुचेगी. सच कहा सराय जीने पाठक तो बोझा खरीदने से रही. अवजार खरीदने वाले पांच लोग बैठ के यह भाषण सुन रहे थे, हमको लगा पचमंगारा बियाह हो रहा है. पचमंगारा बियाह की स्थिति समन्वय के अंतर्गत हुए रंगमच पर चर्चा की भी थी. शाम को समन्वय के अंतर्गत नाटकीय/ नाच-गाना के विशेषज्ञों को भाषण लिए बुलाया गया था, पर यह समन्वय का आयोजन कम विनमय आयोजन ज्यादा था. दो विशेषग्य भाग पराए थे पहुचे ही नहीं. ठोस वक्ता अमितेष जी दुगो लुहेड़ा श्रोता लेके पहुचे थे, वर्ना कोई सुनने वाला नहीं था और जिनको सुनने के लिए बुलाये थे ऊ लोग अफना-अफना के पुस्तक मेला खोज मारा समन्वय मंच नहीं मिला. किराया भारा भी बेकार चला गया. अमितेष जी से मुलाकात मेट्रो में चढ़ेसमय हुई. इस आयोजन में श्रोता की बात छोडिये वक्ता भी दुगों सुने कही से जुगाड़ा के लाना पड़ा.

यह आयोजन दो ठोस और दो द्रव्य वक्ता मिल के निपटाए. पुस्तक मेला में आप को दफती चपकाए हुए भी कुछ लोग मिल जायेंगे वक्ता/विशेषग्य उपलब्ध हैं! यह काहे हुए की कहा करना है! भाषण. इंदौर से आए सत्यनारायण पटेल की पुस्तक का लोकार्पण था. जनता खचमच-खचमच किए रही, अब होगा की कब होगा, कोई बोला लोकार्पण पुरुष की मेट्रो ट्रैफिक में हैं पहुच ही रहे होंगे. सतु का परना सुखाईल जा रहा था. किसी ने कहा की गेट नं पिछवाड़े लोकार्पण पुरुष पहुच गए हैं तब सतु का जान में जान आई. साँझ को दुलरुआ लेखक किसी स्त्री लेखिका के उपन्यास पर चर्चा किए जो खर्चा रहित था. कविता सुनने व् देखने वालों भी भीड़ साँझ को अच्छी रही क्यों कि एफम गोल्ड की रेडियों फुकनर (उद्घोषक) लटकन झटकन कवीत्री ने भी अपनी कविता पढ़ी जो पढ़ नहीं पातीं है उन्होंने ऐसा खुद कहा. अंत में कविता के साथ बाजार का सेंसेक्स 7 दशमलव 48 बजे पर गार्डो की बजाई सिटी के साथ बंद हुआ.

नोट- अगर किसी के साथ उच्च नीच हो जाए तो बनारस की ठंढई पीके भुला दीजिए. अइंचा-पइचा, इजरी -पिजरी का महिना है…

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.