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एक नायक की कलंक गाथा..

By   /  February 26, 2014  /  No Comments

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शम्भूनाथ शुक्ल||

पत्रकारिता के संस्मरण पार्ट- १२

वह एक नायक था धीरोदात्त और नायकत्व के सारे गुणों से युक्त. वह राजा भी था और रंक भी. पर उसके हर नायक के जीवन की कटुताओं की भांति उसके भी हहिस्से में कलंकगाथाएं ज्यादा आईं और अलौकिकता कम. अपनी इन कलंकगाथाओं पर उस नायक ने एक बार एक विवाह समारोह में दुखी मन से कहा था कि दरअसल उन्होंने भादों के अंधियारे पाख में चौथ का चाँद देख लिया था इसलिए कलंकगाथाएं उनकी नियति हैं. यह नायक था विश्वनाथ प्रताप सिंह. जब मुख्यमंत्री रहे तब भी और जब प्रधानमंत्री रहे तब भी कलंकगाथाओं ने उनका पीछा नहीं छोड़ा.vp-singh

प्रधानमंत्री राजीव गांधी से उनके तनाव तब ही शुरू हो गए थे जब बतौर वित्त मंत्री उन्होंने इन्फोर्समेंट डिपार्टमेंट को असीम शक्तियां प्रदान कर दी थीं तथा इस विभाग ने एकदम से धीरूभाई अंबानी के आवास पर छापा मार दिया था और प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बालसखा अमिताभ बच्चन को भी घेर लिया था. नतीजा वही हुआ जिसकी आशंका थी. राजीव ने उनसे वित्त मंत्रालय छीन लिया और रक्षा मंत्री बना दिया. पर वहां वीपी सिंह ने बोफोर्स डील पकड़ ली. उनसे ऊबे राजीव ने उनसे मंत्रीपद ले लिया. वीपी सिंह ने पार्टी छोड़ दी तथा लोकसभा की सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया और इलाहाबाद सीट से उपचुनाव जीत कर पुन: लोकसभा में आ गए.

राजीव कैबिनेट के अरुण नेहरू तथा आरिफ मोहम्मद खान को लेकर उन्होंने जन मोर्चा बनाया और धीरे-धीरे कांग्रेस से ऊबे लोग वहां आने लगे. 11 अक्टूबर 1988 को जेपी के जन्मदिन पर जन मोर्चा, जनता पार्टी, लोकदल और कांग्रेस एस ने मिलकर जनता दल बनाया. इसके अध्यक्ष वीपी सिंह चुने गए. राजीव गांधी की सरकार से मिलकर लडऩे के लिए कई क्षेत्रीय दलों जैसे एनटी रामराव की तेलगू देशम, द्रमुक, असम गण परिषद ने वीपी सिंह के साथ हाथ मिलाकर एक राष्ट्रीय मोर्चा तैयार किया. इसके संयोजक वीपी सिंह बने, एनटी रामराव अध्यक्ष और पी उपेंद्र को महासचिव चुना गया. 1989 के आम चुनाव के समय भारतीय जनता पार्टी और वाम दलों ने मिलकर कांग्रेस को सत्ता से हटाने के लिए वीपी सिंह को मदद करने की रणनीति बनाई. बहुत कम बहुमत से ही सही पर राष्ट्रीय मोर्चा सत्ता में आ गया. तब भाजपा और वामदलों ने सरकार में शामिल होने की बजाय बाहर से सपोर्ट करने का वायदा किया.

दो दिसंबर 1989 से लेकर 10 नवंबर 1990 तक वीपी सिंह की सत्ता रही पर इस बीच जनता दल ने यूपी, बिहार, हरियाणा, गुजरात और ओड़ीसा में तो अपनी सरकारें बना लीं तथा राजस्थान में भाजपा की और केरल में वामदलों की सरकार बनवा दी. इसके अलावा राष्ट्रीय मोर्चा की तरफ से असम में प्रफल्ल कुमार महंत की, आंध्र मेंं रामराव की और तमिलनाडु मेंं द्रमुक की सरकार बनी. पर सरकार बनते ही वीपी सिंह का पहला एसिड टेस्ट तो तब हुआ जब केंद्र के गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी को कश्मीरी आतंकवादियों ने अगुआ कर लिया. इसके एवज में उन्हें उन आतंकियों की मांगें माननी पड़ीं. और कुछ खूंखार आतंकियों को रात के अंधेरे में रिहा करना पड़ा. इसके बाद भाजपा के दबाव में उन्होंने जम्मू कश्मीर में पूर्व नौकरशाह जगमोहन को राज्यपाल बनाया. इसी तरह पंजाब से सिद्धार्थशंकर राय जैसे कैड़े राज्यपाल को हटाकर एक अन्य नौकरशाह निर्मल मुखर्जी को राज्यपाल बनाया. वीपी सिंह बगैर किसी सुरक्षा बंदोबस्त के स्वर्ण मंदिर गए और आपरेशन ब्लू स्टार के लिए सिख समुदाय से माफी मांगी. इसी मरहम का नतीजा था कि पंजाब में लोकतांत्रिक प्रक्रिया चालू हुई और वहां विधानसभा चुनाव के आसार बने. इसके अलावा वीपी सिंह ने विवाद की जड़ भारतीय शांति सेना (आईपीकेएफ) को श्रीलंका से वापस बुलवा लिया.

जनता दल बनी ही थी उत्तर भारत के समाज में पिछड़ वर्गों को सामाजिक न्याय दिलाने के वास्ते इसलिए अगस्त 1990 में प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने अन्य पिछड़े वर्गों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिलाने हेतु बने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने का फैसला किया. यह आरक्षण व्यवस्था वर्षों से पिछड़े समुदायों को समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए उन्हें नौकरियों में आरक्षण की सुविधा देती है. वीपी सिंह ने इसे लागू कर एक तरह से अपने एजंडे पर ही अमल किया था. पर मीडिया और कांग्रेस व भाजपा ने इसे युवा विरोधी बताकर ऐसा खूनी खेल शुरू करवा दिया जिसकी कलह और जलन आज तक नहीं मिट सकी है. यह खेल इतना खतरनाक था कि उसके सामने 1947, 1984 और 2002 भी फीके पड़ गए.
(जारी)

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  • Published: 4 years ago on February 26, 2014
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  • Last Modified: February 26, 2014 @ 6:45 pm
  • Filed Under: राजनीति

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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