/ऊँ गणेशाय नमः के बाद साहिब का नाम…

ऊँ गणेशाय नमः के बाद साहिब का नाम…

-दिनेशराय द्विवेदी||

वाह साहब¡ मान गए आप को. क्या बात कही है? आज तक किसी ने इस तरह से नहीं सोचा, न बताया, जो व्यापारियों को बताया. वैसे एक गलती कर गए. इत्ता बड़ा ट्रेड सीक्रेट इस तरह खुल्ले में नहीं बताना चाहिए था. अब बता ही दिया है तो जल्दी से इसे पेटेण्ट भी करवा लेते, वरना वहाँ यूएस में बहुत हैं जो ऐसी बातों को तुरन्त पेटेण्ट करवा लेते हैं. वो पेटेण्ट करवा लें और साहिब देखते रह जाएँ.27_02_2014-modin28

व्यापारियों की पण्डों और पुजारियों से जरूर अच्छी खासी साँठ-गाँठ रही होगी, जो उन्हों ने सुपारी जैसी निरर्थक चीज को पूजा में स्थान दे, गणपति बना डाला. बेकार चीज का मार्केट बन गया. व्यापारी फालतू, बेकार के जंगली पौधे की खेती करवाने और फिर उस का व्यापार करने लगे. जल्दी जल्दी तिजोरियाँ भरने का इस से अच्छा और क्या तरीका हो सकता था? मुझे पूरा विश्वास है साहिब ने चरक, सुश्रुत, वाग्भट्ट आदि के पाँच प्रसिद्ध ग्रन्थ नहीं पढ़े होंगे, पढ़ना तो दूर शायद उन का नाम भी न जाना हो. जाना होता तो शायद ऐसी बात नहीं कहते.

खैर, उन की जबान है, कोई एक–आध बार थोड़े ही फिसली है. अब तो फिसलते फिसलते उसे भी फिसलने की आदत हो चुकी है. वैसे भी व्यापारियों के समूहों से उन की दोस्ती पुरानी है. जब पुराने दोस्त मिलते हैं तो फिसलना कतई अस्वाभाविक नहीं होता. वैसे भी फागुन का महीना चल रहा है. कल शिवरात्रि भी थी. व्यापारियों ने पुराने दोस्त के स्वागत में बाबा के प्रसाद की व्यवस्था जरूर की होगी. अब यह कैसे हो सकता था कि बाबा का प्रसाद सामने हो और साहिब इन्कार कर दें? बाबा का प्रसाद लेने के बाद तो जुबान राज करती है. वह कुछ भी उड़ान भर सकती है, आसमान के ऊपर से ले कर समुद्र तल की गहराई के नीचे तक.

वैसे साहिब¡ जब भी बोलते हैं तो सामने बैठे लोग उस मझली की आँख की तरह होते हैं जो अर्जुन ने द्रोपदी स्वयंवर में बींधी थी. फिर फागुन में ये खयाल भी तो नहीं रहता कि कल किस से क्या कह कर आए थे और आने वाले कल में किस से क्या कहना है? अब तो यह भी पता नहीं लगता कि जब वे बोलते हैं तो अनेक कैमरे और माइक्रोफोन लगे होते हैं जो सब कुछ रिकार्ड करते जाते हैं. जब तक बोल कर निपटें तब तक तो बोली गई बात जो केवल सामने वाले लोगों को कही जानी हो दुनिया भर में फैल जाती है.

कल तो गजब हो गया, पुराने व्यापारी दोस्तों को मक्खन लगाने के चक्कर में सीमा पर खड़े सिपाही नाराज हो गए. कई घण्टे बाद औरों के कहने पर पता लग पाया. वैसे बात तो गलत नहीं कही थी. आखिर व्यापारी जितना साहस किसी में कैसे हो सकता है? एक फौजी में तो कतई नहीं. बेचारा फौजी अपने देश के लिए लड़ता है, बीवी, बच्चों को छोड़ कर सीमा पर जा कर पहरा देता है. कोई आँख उठाए तो उस की आँख फोड़ डालने का जुगाड़ करता है. वह साहसी कैसे हो सकता है? असल साहसी तो वो होता है जो हर पल डण्डी मारने की सोचता है और मौका मिलते ही सब से पहले अपने आस पास के लोगों पर अपना हथियार आजमाता है. दुनिया घूम-घूम कर बेकार फालतू चीजें बेच कर मुनाफा मारता है.

कल साहिब ने बिलकुल सही लोग पकड़े थे. वे व्यापारी ही तो थे जिन्हों ने इधर की फालतू चीजें उधर जा कर बेचीं और उधर की फालतू चीजें इधर लाकर पकड़ा दीं. बीच में अपना मुनाफा बनाया. अब इन फालतू चीजों को लाने ले जाने में बीच में जंगल भी पड़ते थे, जहाँ लुटेरों से लूट का खतरा रहता था. अब अपनी सुरक्षा खुद करते, तो व्यापार कैसे करते? इन व्यापारियों ने ही कबीलों के सीधे-सादे सरदारों को राजा बनाया और उन के लड़ाकों को फौजी. न बनाते तो फालतू माल लाने ले जाने के लिए रक्षक कहाँ से मिलते? ये लोग ही हैं जो किसी भी नाव को पार लगा सकते हैं. रक्षकों की अपनी सीमाएँ होती हैं, व्यापारी की नहीं. फिर देश के एक एक प्रान्त में इतने व्यापारी हैं जितने योरप भर में नहीं. वे चाहें तो पूरी दुनिया कब्जा सकते हैं, भारत क्या चीज है?

जब ध्यान आया कि नाव तो व्यापारी खे ही लेंगे. लेकिन बीच में लुटेरों से सुरक्षा भी तो चाहिए. वे नाराज हो लिए तो नाव खेने वाले केवट क्या करेंगे? बीच में सुरक्षा वाले दगा दे गए तो? कहीं बीच भंवर में ही उठा कर न फैंक दें? ये तो बड़ी गलती हो गई. बात को जरा तरीके से कहना चाहिए था. खेने वाले भी खुश हो जाएँ और रक्षक भी नाराज न हों. अब गलती तो गलती है, हो गई तो ठीक भी की जा सकती है. व्यापारी दोस्त तो समझदार होते हैं, ये रक्षक जरा बावले. वो बड़े भाई ने जिसे दुर्गा कहा था, उसे ही रक्षकों ने निपटा दिया, तो औरों की क्या बिसात? उन्हें मनाना जरूरी है. वैसे ठीक किया कि पता लगते ही बयान बदल दिया. आखिर फौजी के साहस की तुलना व्यापारी से कैसे की जा सकती है? व्यापारी की रक्षा भी तो फौजी ही करता है. फौजी से व्यापारी का क्या मुकाबला. फिर साहस भी तो कई तरह का होता है. वह तो बाट न मिला तौलते वक्त, सो फौजी को रख दिया. रक्षक तो रक्षक है वक्त पड़ने पर नाव भी खे सकता है. ठीक किया जो जल्दी से सुधार लिया, वरना माफी मांगनी पड़ती जो साहिब की डिक्शनरी में नहीं.

कोई बात नहीं. व्यापारी खुश हो लिए. उन का उत्साह फूल कर गुब्बारा हो रहा है. कुछ तो अभी से बेकार और फालतू चीजों की लिस्ट बनाने में लगे हैं. एक बार लिस्ट बन जाए तो फिर सोचा जाए कि किस तरह उन की मार्केटिंग कर के मुनाफा मारा जा सकता है. व्यापारी लिस्ट बनाने में इतने मशगूल हैं कि बहुत से तो कल रात भोले भंडारी के कोहबर वाले जागरण से ही गैरहाजिर हो गए. फोन कर के पूछा तो बता रहे थे- बस जरूरी काम आ गया था, इस लिए न आ सके. कल सुबह के मेले में जरूर हाजिर होंगे. एक भाई सुबह की सैर पर न आए. वापस लौटते वक्त उन के घर दस्तक दी, तो रात भर लिस्ट बनाने के जागरण के कारण सोए पड़े थे. वे उठ कर ड्राइंग रूम तक पहुँचते, उस के पहले ड्राइंग रूम में उन की बनाई, बिगाड़ी और फिर बनाई लिस्टें पढ़ने का चान्स लग गया. पर ये क्या? व्यापार की जाने वाली फालतू और बेकार चीजों की सब से ताजा लिस्ट में गणेशाय नमः के बाद सब से ऊपर साहिब का नाम विराजमान था.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.