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आजाद न्यूज को बंद करा भोपाल चले अंबिकानंद सहाय…

By   /  March 3, 2014  /  9 Comments

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 मणिभूषण सिंह ||

तथाकथित रूप से बड़े पत्रकार अंबिकानंद सहाय ने एक बार फिर साबित कर दिया कि वे एक सुविधाभोगी और स्वार्थी पत्रकार हैं. आजाद न्यूज चैनल के न्यूज डायरेक्टर अंबिकानंद सहाय ने चैनल को तब तक अलविदा नहीं कहा जब तक कि चैनल बंद नहीं हो गया. मालूम हो कि आजाद न्यूज चैनल का हाल ही में शटर डाउन हो गया है, जो कि बहुत स्वाभाविक था. जो चैनल महज काला धन को छिपाने और राजनीतिक रसूख पैदा करने के इरादे से लाया गया हो, जिसमें पेशेवराना रवैये का नितांत अभाव हो, जिसे उसके बड़े और धूर्त पत्रकारों ने जमकर लूटा हो, उसे एक न एक दिन बंद तो होना ही था. आजाद न्यूज चैनल पत्रकारों के जबर्दस्त शोषण और श्रम कानूनों के उल्लंघन को लेकर बहुत विवादित और बदनाम रहा. जब पत्रकारों के हक मारे जा रहे थे, जब उन्हें उनके अधिकारों, आधारभूत जरूरतों और जायज छुट्टियों से महरूम रखा जा रहा था और जब चैनल के मालिक वालिया और उनकी बेटी तानिया वालिया पत्रकारों से गुलामों जैसा बर्ताव कर रहे थे, तब अंबिकानंद सहाय ने अपनी पत्रकारीय निष्ठा और नैतिकता को ताक पर रखकर दमकते और चमकते नोटों के लिए वालिया की काली करतूतों का चुपचाप और मुस्कराते हुए साथ दिया. एक तरफ तो सहाय जी ने हर गलत काम में मालिकान का साथ दिया लेकिन दूसरी तरफ काहिली और कामचोरी में भी डूबे रहे. नतीजतन, चैनल पर ताला लग गया. azad-news-logo

आज जब आजाद न्यूज चैनल के नोएडा ऑफिस में बड़ा ताला लटक रहा है, कुछ पत्रकार अब भी अपनी सैलरी और बकाया राशि पाने की बाट जोह रहे हैं, तो ऐसे समय में, पत्रकारों को उनका हक दिलाने के बजाय बताया जा रहा है कि अंबिकानंद सहाय मध्यप्रदेश चले गए हैं. सुविधा और पैसे को जिंदगी की कसौटी मानने वाले सहाय जी  ने आजाद पर ताला लगते देख खुद के लिए एक नई नौकरी तलाश ली और मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से छपने वाले किसी अखबार के मालिक को फांस लिया. लेकिन सड़क पर आए सैकड़ों बेरोजगार पत्रकारों का क्या होगा ? आखिर वो अब कहां जाएं ? आजाद चैनल के बंद होने से सड़क पर आए पत्रकार अंबिकानंद सहाय के समर्थन की चाह रखते थे, लेकिन सहाय जी को उनसे क्या लेना-देना. उन्हें तो बस अपनी नौकरी बचाने और पाने की चिंता रहती है. आजाद के पत्रकार टॉर्च लेकर अंबिकानंद सहाय को ढूंढ रहे हैं, लेकिन वे तो दिल्ली से गायब हो चुके हैं. हां, कुछ तिकड़मबाज और धूर्त पत्रकारों ने मालिक को ब्लैकमेल कर जरूरत से ज्यादा पैसे जरूर ऐंठ लिए हैं. मीडिया की हालत और कथित बड़े पत्रकारों के रवैये को देखकर पत्रकारिता शर्मसार हो रही है.

आजाद न्यूज के मालिक के पत्रकार और सरोकार विरोधी रवैये को अंबिकानंद सहाय ने हमेशा अंध समर्थन दिया. आजाद के मालिक और मालिक के पिट्ठू बने अंबिकानंद सहाय के अमानवीय आचरण का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि स्वर्गीय रवीन्द्र शाह जैसे पत्रकार का बकाया भी आजाद न्यूज ने अभी तक उनके परिवार को नहीं सौंपा है. वरिष्ठ पत्रकार रवीन्द्र शाह ने आजाद न्यूज के बाद आउटलुक पत्रिका ज्वाइन कर ली थी. अमानवीयता की हद देखिए कि शाह जी के असामयिक निधन के साल भर बीत जाने के बाद भी उनका एक लाख रुपये से ज्यादा का बकाया आजाद न्यूज ने उनके परिवार को नहीं लौटाया. ऐसे में, अंबिकानंद जैसे लोगों को जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जा सकता.

दरअसल, अंबिकानंद सहाय का पूरा जीवन ही पत्रकारिता की साख को बट्टा लगाने और पत्रकारीय मूल्यों को गिरवी रख कर मालिकों और धनाढ्यों की चापलूसी, चाकरी करने की गवाही देता है. लखनऊ में टाइम्स ऑफ इंडिया का स्थानीय संपादक रहते हुए उनकी करतूतों का उल्लेख वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार दयानंद पांडेय ने अपनी किताब  ‘मीडिया तो अब काले धन की गोद में’ किया है. ‘यह मीडिया है कि भस्मासुर है?’ शीर्षक लेख में अंबिकानंद सहाय के बिकाऊ रवैये को रेखांकित करते हुए दयानंद लिखते हैं, “2 जून 1995 को लखनऊ में मुलायम सिंह ने सुबह-सुबह जिस तरह अपने गुंडों को मायावती पर हमले के लिए भेजा था, मुख्यमंत्री रहते हुए भी, वह तो अश्लील था ही, अपने पत्रकारों ने उससे भी ज़्यादा अश्लीलता बरती. पी.टी.आई ने इतनी बड़ी घटना को सिर्फ़ दो टेक में निपटा दिया तो टाइम्स आफ़ इंडिया ने शार्ट डी.सी. अंडरप्ले कर के दिया. बाद में इस के कारणों की पड़ताल की तब के जनसत्ता के संवाददाता हेमंत शर्मा ने. तो पाया कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि पी.टी.आई के व्यूरो चीफ़ खान और टाइम्स के तत्कालीन रेज़ीडेंट एडीटर अंबिकानंद सहाय ने मुलायम शासनकाल में विवेकाधीन कोष से लाखों रुपए खाए हुए थे. तमाम और पत्रकारों ने भी लाखों रुपए खाए थे. और वो जो कहते हैं कि राजा का बाजा बजा! तो भैय्या लोगों ने राजा का बाजा बजाया. आज भी बजा रहे हैं. खैर, हेमंत शर्मा ने जब इस बाबत खबर लिखी तो टाइम्स आफ़ इंडिया के तत्कालीन रेज़ीडेंट एडीटर अंबिकानंद सहाय ने हेमंत को नौकरी ले लेने की धमकी दी. पर न हेमंत बदले न बाजा बजाने वाले. आज भी बजा रहे हैं. बस राजा बदलते रहते हैं, भैय्या लोग बाजा बजाते रहते हैं.” दयानंद पांडेय का ये लेख उनके ब्‍लॉग सरोकारनामा पर भी उपलब्ध है. अंबिकानंद सहाय पर मुलायम सिंह यादव और एन डी तिवारी के शासनकाल में जनता के मुद्दों और सरोकार को धता बताकर अखबार को इन नेताओं की दासी बना देने के भी आरोप लगे. बताया जाता है कि सरोकार से समझौता करने के लिए अंबिकानंद को इन नेताओं ने लाखों की जमीन कौड़ियों के मोल भेंट कर दिए.

अंबिकानंद सहाय जैसे  चापलूसी पसंद, पाखंडी, अवसरवादी और दलाल पत्रकारों से किसी सकारात्मक और सरोकारी पत्रकारिता की उम्मीद पालना बेमानी है. जिंदगी भर जिन लोगों ने पत्रकारिता को नेताओं की चाकरी के काम में लगाए रखा, जिंदगी की शाम में उनमें किसी क्रांति या बदलाव की उम्मीद निरा मूर्खता ही होगी.

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  • Published: 4 years ago on March 3, 2014
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  • Last Modified: March 3, 2014 @ 9:22 pm
  • Filed Under: मीडिया

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

9 Comments

  1. Marc Tully says:

    Hi all- I had opportunity to work With Mr Sahay during BBC days and let me tell you all that he is fine journalist. I beehive he has already achieved pinnacle of glory and it seems the younger generation just needs the things easy way and hence is criticizing him. Just watch his Amar Singh tape and you will know true story. Mani Bhushan pls be true journalist and do your home work before posting such false stuff

  2. manish says:

    जहँ जहँ पाँव पड़े ‘संतन’ के तँह तँह बंठाधार…!!!

  3. pulkit says:

    सहाय जहाँ जाते हैं वो चैनल बंद हो जाता है.इन्होने पहले s1 को बंद कराया.अब सहाय ने आज़ाद को गर्त में मिला दिया.दरअसल कोई काम नहीं करते सहाय.सिर्फ बैठकबाजी करते हैं.सहारा चैनल को भी इन्होने बर्बाद कर दिया.आज सहारा का भी हाल देख लीजिये.

  4. sahil says:

    ambikanand sahay धनपशु पत्रकार हैं.पता नहीं इतना पैसा कहाँ ले जायेंगे.सहाय ने तो अपनी सेटिंग कर ली.लेकिन आज़ाद के बेरोजगार हुए पत्रकारों का अब क्या होगा.सहाय और वालिआ दोनों पत्रकारो कि हालत के लिए जिम्मेदार हैं.धनपशु पत्रकार अम्बिकानन्द सहाय down down …… down down

  5. madhulata says:

    सहाय जी ने अब नया ठिकाना तलाश लिया है। भोपाल के अखबार के मालिक को सावधान हो जाना चाहिए। कहीं उनका हाल भी आजाद न्यूज जैसा न कर दें अंबिकानंद सहाय।

  6. रवि पांडे says:

    अंबिकानंद सहाय सचमुच एक दलाल पत्रकार हैं। ऐसे पत्रकार नौकरी के लिए कुछ भी कर सकते हैं। जिंदगी भर सहाय ने दलाली के सिवा कुछ नहीं किया। उन्होंने अंग्रेजी में पत्रकारिता की भी तो भाई की बदौलत जो बड़े पत्रकार थे। उनकी पूंछ पकड़कर पत्रकार बन गए अंबिकानंद। वरिष्ठ पत्रकार कहलाते हैं लेकिन उनका न तो कोई किताब मिलता है न ही कोई लेख। दूसरों के लिखे लेख अपने नाम से छपवाते हैं ये साहब। ऐसे पत्रकारों से देश और पत्रकारिता बच जाए तो गनीमत हो। लेखक को शानदार लेख के लिए बधाई।

  7. विजय सिन्हा says:

    भैया आज अंबिकानंद जैसे पत्रकारों का ही बोलबाला है। दलाली जो नहीं कर सकता वो पत्रकारिता में नहीं टिक सकता। कुछ अच्छे लोग हैं लेकिन उन्हें हाशिये पर धकेल दिया गया है।

  8. रमेश says:

    अंबिकानंद सहाय ने इन्हीं में जिंदगी बिता दी। सुविधा को तरजीह देना उनकी फितरत है। अब क्या होगा।

  9. प्रदीप says:

    सहाय जी जैसा ढोंगी, पाखंडी और अहंकारी पत्रकारी ढूंढना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। आजाद के मालिक के तलवे चाटते रहे और पत्रकारों का शोषण करवाते रहे। उधर, मालिक को भी धोखा देते रहे। एक नंबर के कामचोर हैं अंबिकानंद। अंबिकानंद सहाय शर्म करो। शर्म करो शर्म करो। आजाद के जिन पत्रकारों के पैसे नहीं मिले उसके लिए सहाय ही जिम्मेदार है।

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