/मोदी जी, शूं आ छे तमारू गरवी गुजरात..

मोदी जी, शूं आ छे तमारू गरवी गुजरात..

-भंवर मेघवंशी||

आजकल हर जगह ‘एक भारत – श्रेष्ठ भारत’ का विज्ञापन दिखलाई पड़ता है, जिसमें गुजरात के अनुभवों से भारत की उम्मीदों को जोड़ते हुये देश में सुराज्य की स्थापना का आह्वान किया गया है. सरकार का धर्म-भारत, धर्मग्रंथ-संविधान, भक्ति-देशभक्ति, शक्ति-जनशक्ति के काव्यात्मक पंक्तियों के साथ सवा सौ करोड़ देशवासियों की भलाई की कामना दर्शाते हुये इसे आपकी सरकार की कार्यशैली के रूप में रेखांकित किया गया है और सार्मथ्य, सम्मान एवं समृद्धियुक्त ‘नये भारत’ की ओर चलने की बात कही गई है. जरूर चलेंगे मोदी जी, लेकिन रात दिन देशभर में लाखों लोगों के बीच विकास का दावा करने और राष्ट्र को एक श्रेष्ठ राष्ट्र बनाने के संकल्प को दोहराते-दोहराते अगर आप थोड़ी सी फुर्सत में हो तो जरा उस गुजरात के विकास की बात कर लें, जिसे आप एक आदर्श के रूप में प्रस्तुत करते रहे है.Modi

निश्चित रूप से आपने देश भर के बड़े मुनाफाखोर उद्योग घरानों को गुजरात में आमंत्रित किया है, उन्हें मुफ्त जमीनें, टेक्सों में रियायतें, चमचमाती सड़के और अबाध ऊर्जा दी है, ताकि वे और फलफूल सकें तथा अपनी तिजोरियां भर सके, मगर उन 60 हजार छोटे स्तर के उद्योग धंधों का क्या हुआ जो विगत 10 वर्षों में बंद हो गए ? विकास, विकास और सिर्फ विकास की माला जपने वाले हे विकास पुरूष, आंकड़े तो बताते है कि आपका गुजरात प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में आज पांचवे पायदान पर है. आपको मालूम ही होगा कि सन् 1995 में जब आपकी पार्टी पहली बार सत्तारूढ़ हुई तब गुजरात सरकार का कर्जा 10 हजार करोड़ रुपए से भी कम था, अब आपके निपुण और सार्मथ्यशाली नेतृत्व में वह 1 लाख 38 हजार 978 करोड़ तक पहुंच गया है तथा अनुमान है कि वर्ष 2015-16 के बजट तक यह 2 लाख करोड़ का जादुई आंकड़ा पार कर लेगा.

अन्नदाता किसान की बातें आपने कई जगहों पर उठाई, एक कृषि प्रधान देश के संभावित पंत प्रधान को निश्चित रूप से किसानों की चर्चा और चिंता करनी चाहिये लेकिन यह भी बताना चाहिये कि कृषि वृद्धि में गुजरात आठवें स्थान पर क्यों है ? गुजरात में खाद (उर्वरक) पर 5 प्रतिशत वेट क्यों लगा रखा है जो कि इस देश में अधिकतम है. मार्च 2001 से अब तक जिन 4 लाख 44 हजार 885 किसानों के कृषि विद्युत कनेक्शन लम्बित है, उनके खेतों तक रोशनी कब पहुंचेगी ? या सिर्फ अदानी, अम्बानी, टाटाओं को ही मांगते ही बिजली कनेक्शन मिलते रहेंगे, और देश का भाग्य विधाता किसान दशकांे तक सिर्फ इंतजार करेगा, ‘जय जवान-जय किसान’ के अमर उद्घोषक लौहपुरूष के नाम पर देश भर से लौहा इकट्ठा कर रहे हे विकास पुरूष, गुजरात के इन लाखों किसानों को लौहे के चने चबाने पर क्यों मजबूर कर रखा है आपने ?

विचित्र वेशभूषा धारण करके मंचों पर मुट्ठियां बंद करके किसी भारोत्तोलक की भांति भंगिमाए बनाकर अपने गलत इतिहास बोध का परिचय देने तथा गुजरात में बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के लम्बे चौड़े दावे करने वाले कलियुगी विकास के हे अंतिम अवतार, जरा यह भी तो बताते जाओ कि गुजरात के 26 जिलों के 225 ब्लाॅक अब भी डार्क जोन में क्यों है ? राज्य के पांच वर्ष से कम आयु के लगभग आधे बच्चे कुपोषण से क्यों पीडि़त है ? 70 प्रतिशत बच्चों में खून की कमी और 40 प्रतिशत सामान्य से भी कम वजन के क्यों है ? क्या ये भी डाइटिंग कर रहे है ? एनीमिया से प्रभावित महिलाओं के मामले में गुजरात का स्थान 20वां है हालांकि आप इसका स्पष्टीकरण भी दे चुके है कि गुजराती महिलाएं अपने बदन को इकहरा या छरहरा रखने के लिये और स्लिम तथा फिट दिखने के लिये डाइटिंग करती है, वाकई भूख और कुपोषण का इससे सुन्दर और रोचक जस्टिफिकेशन आपके सिवा कौन दे सकता है.

गुजरात के आठ शहरों तथा तीन तालुकों में 2894 शिक्षकों के पद खाली क्यों है, वहीं चार जिलों के 178 स्कूल एकल शिक्षक के भरोसे क्यों चल रहे है ? आपको सार्वजनिक शिक्षा की तो वैसे भी चिन्ता नहीं होगी क्योंकि आप तो निजीकरण के घनघोर पक्षधर है, इसलिये शिक्षा जैसी बुनियादी सेवा को भी पब्लिक स्कूलों के प्रतिस्पर्धी बाजार के हवाले करने में आपको कोई झिझक नहीं है.

आपके राज्य का स्वास्थ्य खर्च प्रतिवर्ष कम हो रहा है, आंकड़े बताते है कि राज्य स्तरीय बजट में स्वास्थ्य संबंधी मद में आवंटन के मामले में गुजरात का स्थान उपर से नहीं, नीचे दूसरा है, इसका मतलब यह नहीं है कि गुजरात में बीमार लोग नहीं है या उनके इलाज के लिए अस्पताल नहीं है, सब है पर प्राइवेट, मरीज लालची डाक्टरों के हवाले कर दिये गए है, जिसकी जेब में जितना दम, उसका उतना ही अच्छा इलाज हो सकता है, मतलब साफ है कि राज्य सरकार अपने नागरिकों के स्वास्थ्य के फर्ज को अदा करने में नाकाम रही है, उसने स्वास्थ्य सेवाओं को बाजार के हवाले कर दिया है जबकि ग्रामीण शिशु मृत्यु दर में गुजरात का स्थान 14वां है तो एनीमिया से प्रभावित बच्चों के मामले में गुजरात 16वें पायदान पर है.

इतने विकसित आपके ‘गरवी गुजरात’ में भूख की बात करना तो शायद आपको अच्छा नहीं लगेगा पर वर्ष 2009 की वैश्विक भूख रिपोर्ट के मुताबिक भारत के 17 बड़े राज्यों में से 23.3 के भूख सूचकांक के साथ गुजरात का स्थान 13वां  है, आपका विकसित गुजरात भी बिहार, झारखण्ड  जैसे खतरे की सूची वाले राज्यों में शामिल हो चुका है, मेहरबानी करके आप यह मत कहियेगा कि यह कोई ‘भूख वूख’ नहीं है, यह तो उपवास है.

नर्मदा मैया का पानी गुजरात पहुंचा कर पीठ ठोंकते-ठोंकते आपकी पीठ में दर्द होने लगा हो तो जरा ठहरिये, राष्ट्रीय जनगणना-2011 के मुताबिक आपके राज्य की सिर्फ 29 फीसदी आबादी को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध है, जिन 6 करोड़ गुजरातियों पर आप गर्व करते रहे है उनमें से पौने दो करोड़ लोगों को शुद्ध पेयजल प्राप्त नहीं होता है.

मोदी जी, एक तरफ जहां गुजरात में अमीरी बढ़ रही है, वैभव और सम्पन्नता अपनी पूरी नग्नता से दृष्टिगोचर हो रहा है, वहीं गरीबी भी निरन्तर बढ़ रही है. आज प्रत्येक 100 गुजरातियों में 40 व्यक्ति गरीब है, राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन के आंकड़े कहते है कि गुजरात में गरीबी घटने का प्रतिशत निम्नतम है, मतलब कि गरीबी घट नहीं बढ़ रही है.

शायद इस प्रकार की आंकड़ेबाजी से आप नाराज हो जायेंगे इसलिये थोड़ी सी सीधी-सीधी समझ आने लायक बातें करे कि गुजरात में हरेक तीन दिन में एक बलात्कार होता है. कुपोषण, एनीमिया से बच्चों की मौतें हो रही है, बिजली किसानों के लिये नहीं बल्कि उद्योग घरानों के लिये है, सरकारी स्कूलें खाली हो रही है, प्राइवेट पब्लिक स्कूलों में भीड़ बढ़ रही है, सरकारी अस्पतालों को पंगु बना दिया गया है ताकि निजी अस्पताल चांदी काट सके, छोटे कल-कारखाने तथा कुटीर घरेलू उद्योग निरन्तर दम तोड़ रहे है, भूखमरी बढ़ रही है और भ्रष्टाचार का तो आलम यह है कि अहमदाबाद की सड़कों पर खड़ा गुजरात ट्रेफिक पुलिस का जवान बाहर से आने वाली गाडि़यों से खुलेआम 20-20 रुपये तक वसूल लेता है, चारों तरफ लूट मची है, पैसों से लेकर संसाधनों तक की, देश-विदेश के लुटेरों ने अपने डेरे डाल दिये है वहां, गांधी का गुजरात अब हेडगेवार के चेलों के नेतृत्व में लुटने को अभिशप्त है.

आप ‘गुड गर्वनेंस’ और सुराज्य की बड़ी-बड़ी बातें करते है लेकिन आपकी विधानसभा में विगत 10 वर्षों से डिप्टी स्पीकर का पद खाली है और तमाम आलोचनाओं के बाद भी पिछले 10 वर्ष से लोकायुक्त के पद पर नियुक्ति नहीं की गई. आपने वन अधिकार अधिनियम को लागू करने की कोई इच्छा शक्ति नहीं दिखाई है. सूचना के अधिकार के सिपाही वहां गोलियों से भूने गये और रोजगार गारण्टी योजना ठीक से लागू नहीं की जा रही है. बीपीएल के राशन कार्ड का मसला हो अथवा खाद्य सुरक्षा का मामला, हर तरफ फिसड्डी साबित हो रहा है गुजरात, मगर इतिहास साक्षी है कि जब रोम जल रहा था तब नीरो बंसी बजा रहा था.

जला तो गुजरात भी था, गोधरा में रामसेवकों से भरी बोगी से लगाकर पूरे गुजरात के गांव व शहरों के अल्पसंख्यक चुन-चुन कर मारे गये, काटे गये, जिन्दा जला दिये गये, औरतों के साथ बलात्कार किए गए. गर्भवतियों के पेट फाड़कर भ्रूण निकालकर उन्हें हवा में उछाल कर काट डालने का नृशंस काम किया गया. इस नरसंहार के मामले में आपकी मंत्री मण्डलीय सहयोगी माया कोडनानी जेल में है. ईशरत जहां और सोहराबुद्दीन तथा तुलसीराम प्रजापत जैसे फर्जी एनकाउण्टरों में गुजरात के गृहमंत्री से लेकर डीजीपी तक सब सलाखों के पीछें पहुंचे है फिर भी आप गर्व से कहते है कि वर्ष 2002 के बाद गुजरात में कोई दंगा नहीं हुआ है, शांति है! वाकई, मरघट की शांति है, उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाद जिन 1958 दंगा केसों को दुबारा खोला गया, उनमें से मात्र 117 मामलों में ही गुजरात पुलिस ने गिरफ्तारियां की है यानि कि कुल मामलों के मात्र 5 प्रतिशत में कार्यवाही, यह कैसा न्याय और शांति और विकास है आपके राज्य में ?

दलितों को नहर का पानी लेने-देने से लेकर सार्वजनिक स्थलों पर उनके साथ हो रहे भेदभाव की खबरें निरन्तर आ रही है, आप दक्षिण में दलितों की सभाओं को सम्बोधित कर रहे हो, दिल्ली में दलित नेता उदितराज को गले लगा रहे हो और मुजफ्फरनगर में पासवान से गले मिल रहे हो लेकिन आपके गुजरात में विगत दिनों 5 हजार दलितों ने हिन्दू धर्म छोड़कर धर्मान्तरण कर लिया, अपने ही राज्य के दलितों को गले से क्यों नहीं लगा पाये आप, सिर्फ सामाजिक समरसता पर किताबें लिख देने तथा बिकाऊ दलित लीडरों से मौसमी समझौते कर लेने मात्र से कोई दलितों का हितैषी नहीं हो जाता है, इतना याद रखो विकास पुरूष.

और अंत में देश के नौजवानों को बताना चाहता हूं कि प्रिन्ट, इलेक्ट्राॅनिक और सोशल मीडिया के द्वारा छिडके गए इस ‘मोदी स्प्रे’ को ‘लहर’ मानकर ‘नमो-नमो’ का यशगान करते हुये यह मत भूलना कि गुजरात में भी बेरोजगारी के आंकड़े उतने ही भयावह है जितने बाकी राज्यों में है. गुजरात सरकार के स्वयं के रोजगार संबंधी आंकडे बताते है कि राज्य में 30 लाख बेरोजगार पंजीकृत है जिनमें 10 लाख पढे लिखे सुशिक्षित बेरोजगार युवा भी शामिल है. राष्ट्रीय नूमना सर्वेक्षण संगठन कहता है कि पिछले 12 वर्षों से गुजरात में रोजगार वृद्धि की दर लगभग शून्य है, ऐसी हालात के बावजूद आप देश के युवाओं को करोड़ो रोजगार के अवसर मुहैया कराने का दावा करते है तो यह सरासर धोखा है देश के नवजवानों के साथ.

जनवादी विचार आन्दोलन ने तो एक पर्चा छाप कर आपके विकास की कलई ही खोल दी है तथा कहा है कि गुजरात की इस असलियत को मीडिया कभी लोगों तक नहीं पहुंचायेगा, बिल्कुल सही बात है, इस बिकाऊ मीडिया ने देश को इस बात से अब तक अंजान रखा है कि कैग ने गुजरात राज्य में भूमि आवंटन तथा अन्य सरकारी कामों की हाल की समीक्षा रिपोर्ट में कहा है कि गुजरात में जो वित्तिय अनियमितताएं हुई है, वह कुल 16 हजार 706 करोड़ का घोटाला है. पर, अगर इतना सा भी घोटाला नहीं होगा तो बड़े-बड़े विज्ञापन, विशाल रैलियां और रात-दिन दौड़ते हेलीकॉप्टर का खर्चा क्या अदानी, अम्बानी या टाटा देंगे ?

खैर, जनवादी विचार आन्दोलन द्वारा उपलब्ध कराये गए इन तथ्यों के आलोक में विकास पुरूष से यह सवाल पूछने का मन करता है कि – मोदी जी, शूं आ छे तमारू गरवी गुजरात ? (मोदी जी तो यह है आपका गरवी गुजरात ?)

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता है.)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.