/न्‍यूज़ एक्‍सप्रेस में उर्मिलेश को थप्‍पड़ लगाने की इच्‍छा ऑन एयर, देखें वीडियो..

न्‍यूज़ एक्‍सप्रेस में उर्मिलेश को थप्‍पड़ लगाने की इच्‍छा ऑन एयर, देखें वीडियो..

-अभिषेक श्रीवास्तव||
विनोद कापड़ी और सतीश के.सिंह के राज में न्‍यूज़ एक्‍सप्रेस पर पैनल पर बैठे वक्‍ताओं के बारे में क्‍या कहा जाता है, जानना हो तो इस वीडियो को देखें और ठीक 4:39 मिनट पर वरिष्‍ठ पत्रकार उर्मिलेश उर्मिल की आवाज़़ के बैकग्राउंड में अचानक उभरी एक और आवाज़ को सुनें.

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करीब घंटा भर पहले हुई इस परिचर्चा में उर्मिलेश जी यूपीए सरकार के किए न्‍यूक्लियर सौदे व मल्‍टीब्रांड रीटेल में एफडीआइ पर सवाल उठा रहे थे और कांग्रेस की नाकामियां गिनवा रहे थे. अचानक इस वीडियो के 4:39 पर पहुंचते ही एक आवाज़ पीछे से आती है, ”ये कौन है यार… पीसीआर में इसको जा के बोलो थप्‍पड़ लगाए.”

यह तकनीकी दुर्घटना थी या जानबूझ कर ऐसा किया गया, इसे समझना हो तो 7:25 पर सतीश के.सिंह का उलझन में सिर खुजलाने के बाद विनोद कापड़ी से निजी संवाद देखें जिसमें वे कहते हैं, ”विनोद, लेकिन मुझे एक लाइन तो बोलना ही पड़ेगा, इन्‍होंने मेरे ऊपर टिप्‍पणी की है”, और फिर वे चंदन यादव को टोकते हुए उर्मिलेश जी को संबोधित करते हुए कहते हैं, ”मैं बार-बार यह कहना चाह रहा हूंकि जर्नलिस्‍ट को जजमेंटल नहीं होना चाहिए… आपकी राय हो सकती है लेकिन थोड़ा संतुलित रहना चाहिए….”

परिचर्चा में संतुलन बैठाने के नाम पर क्‍या किसी मुखर वक्‍ता को ”थप्‍पड़ लगाने” की बात अब होगी? दर्शकों की फि़क्र करने का दावा करने वाला न्‍यूज़ एक्‍सप्रेस क्‍या इंडिया न्‍यूज़ बन जाएगा जहां वाकई एक वक्‍ता दूसरे को थप्‍पड़ जड़ चुका है? और क्‍या जिंदगी भर पत्रकारिता के नाम पर लंठई करने वाले न्‍यूज़ एक्‍सप्रेस के संपादकद्वय अब यह तय करेंगे कि उर्मिलेश जैसे वेटरन जर्नलिस्‍ट को क्‍या कहना चाहिए और क्‍या नहीं?

ऐसे में तो कोई भी आत्‍मसम्‍मान वाला पत्रकार न्‍यूज़ एक्‍सप्रेस पर जाने से ही कल को परहेज़ करेगा.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.