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पब्लिक कहेगी तो दूल्हा भी बन के दिखा देंगे, सर जी..

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-दिनेशराय द्विवेदी||
पींईँईँईँ… पिपिप्पींईँईँ … हो गया, हो गया, हो गया. आज सुबह, साढ़े दस बजे ‘दी ग्रेट इंडियन सर्कस’ का शुभारंभ हो गया. करोड़ों लोगों और हजारों नेतागणों को जिसका इन्तजार था वह शुरु हो गया. जब दो माह की गारंटी है, उससे कुछ दिन बाद तक चल सकता है. गारंटी है कि जब तक दिल्ली में देश की नई सरकार नहीं बन जाती तब तक चलेगा. चलेगा नहीं दौड़ेगा हुजूर, दौड़ेगा.In-pics-Narendr15048

आपने देखा नहीं? कितनी बेकरारी से इन्तजार था इस घड़ी का. इस बार इसे सर्कस नहीं बल्कि स्वयंवर समझा जा रहा है. एक साहिब हैं, महीनों पहले से दूल्हे का लिब़ास पहने घोड़ी पर सवार इधर-उधर धूम रहे हैं. सारा हिन्दुस्तान, सॉरी हिन्दुस्थान, नहीं नहीं इंडिया घूम चुके हैं. घोड़ी के पैरों में ऐसी चकरी पड़ी है कि उन्हें घुमा रही है. कह रही है जब तक तोरण नहीं मार लेता उतरने नहीं दूंगी. छोटी-बड़ी शंकाएं तक भी घोड़ी पर बैठे-बैठे ही निपटानी पड़ रही हैं. अब तक तो तोरण बंधा ही नहीं था. अब तक तो केवल अभ्यास था, असली बिनौरी तो अब शुरू होगी.

साहब के ठाठ निराले हैं, दिन में बीस ड्रेस बदलते हैं, घोड़ी पर बैठे-बैठे. जब बोलते हैं तो कहते हैं चायवाला हूं. लोग पूछते हैं- किधर से? फिर गौर से निहारते हैं. फिर कहते हैं- दाढ़ी से तो लगता है, पर कपड़ों से नहीं. दूसरा पट्ट से कहता है- तो क्या यार, दूल्हा बना है तो कपड़े तो ढंग के पहनेगा न? उससे तोरण भी क्या चाय दुकान की ड्रेस में मरवाओगे क्या?

शादियों में जब गणपति स्थापना हो जाती है तभी से उस की कमर पर तलवार लटकने लगती है. इस बन्दे ने महीनों पहले ही गणपति स्थापना करवा ली. डरता था. कहीं ऐसा न हो कि उधर तोरण लटका दिया जाए और इधर घर में किसी दूसरे का गणपति स्थापित हो जाए. पहले ही तय करवा लिया कि इस बार वही, और केवल वही घोड़ी चढ़ेगा. गणपति बैठे, तलवार म्यान समेत कमर पर लटक गई. वह साधारण दूल्हा नहीं, वह तो निराला है, भारत की आजादी के बाद का सबसे निराला दूल्हा. दूल्हों की तलवार अक्सर म्यान में ही रहती है. कभी जरूरत पड़ भी जाए तो उसके फौजी, लड़ाके और सेनापति तलवारें निकालते हैं. पर उसने तो अगले ही दिन से तलवार म्यान से निकाल ली और घुमाने लगा. अब तक घुमा ही रहा है. जिस जिस को भी झटकाना होता है, उसे कोई और झटकाए उसके पहले खुद ही तलवार घुमा देता है. ऐसा नहीं है कि उसके पास फौजी, लड़ाके या सेनापति नहीं. पर लगता है उसे किसी पर भरोसा नहीं. उसके फौजी, लड़ाकों और सेनापति सिर्फ उसकी तारीफ करते हैं- क्या लाजवाब दूल्हा है, क्या तलवार घुमाता है, जिस पर पड़ती है पानी तक नहीं मांगता वगैरह वगैरह. अब तो उनकी आदत तक पड़ गई है, जिस दिन दूल्हा तलवार न घुमा पाए, उस दिन भी छावनी से आवाजें आती रहती हैं. क्या बात है उस्ताद? क्या तलवार घुमाई है, क्या पछाड़ा है. मुझे तोतों द्वारा हवा में बनाए जा रहे हवामहल का किस्सा याद आ रहा है. जिसमें तोते आसमान में उड़ कर एक स्वर में बोलते थे- ईंट लाओ, चूना लाओ, पत्थर लाओ वगैरह वगैरह.Narendra_Modi_in_Arunachal_PTI_360

एक और है जिसके दूल्हा बनने की संभावना है, केवल संभावना मात्र. वह कहता है बिना गणों के कैसा गणपति? अभी गण तो चुन लेने दो. जब गण चुन लेंगे तो वे ही गणपति भी चुन लेंगे. जो गण चुनेंगे वही तो गणपति होगा. किसी के घर में बैठ कर गणपति बैठा लेने से क्या होता है. तलवार तो उसने अभी तक छुई क्या? देखी तक नहीं है. अभी तो वह जहां जाता है, पूछता है- आप बताइए तलवार कैसी होती है? कोई कहता है तलवार तो तलवार जैसी होती है. तो वह फिर पूछ बैठता है कि आप के यहां की बताइए आप के यहां तलवार कैसी होती है? कौन चलाता है? कैसे चलाई जाती है…वगैरह वगैरह. अब तक वह बीसियों तरह की तलवारों के वर्णन सुन चुका है. इतने तरह के वर्णन सुने हैं कि कन्फ्यूज हो गया है. उसे समझ ही नहीं आ रहा है कि तलवार कैसी होती है? हल्की होती है या भारी होती है? उसे दाएं हाथ से पकड़ना चाहिए या बाएं हाथ से पकड़ना चाहिए? वह यह भी सोचता है कि तलवार पकडना भी चाहिए या नहीं? क्या बिना कमर पर तलवार लटकाए, बिना हाथ में उठाए तोरण नहीं मारा जा सकता? आज कल तो दूल्हे शादीबाजार से लाई गई गोटा लिपटी डण्डी से भी तोरण मार लेते हैं. कभी यह भी सोचता है कि क्या बिना तोरण मारे दुल्हन नहीं लाई जा सकती?

इधर-उधर प्रान्तों में भी अनेक लोगों के मन में लड्डू फूट रहे हैं. न जाने क्या हो जब वक्त आए. क्या पता उन्हें ही दूल्हा बना कर घोड़ी चढ़ा दिया जाए. वे भी तैयारी में जुटे हैं. ड्रेसें बनवा रहे हैं, तलवारें भांज रहे हैं. किसी के पास तलवार है तो म्यान नहीं है. म्यान है तो घोड़ी नहीं है. घोड़ी है तो ऊंची पड़ रही है. इधर-उधर ताक रहे हैं, कहीं कोई मदद कर दे तो वह भी घोड़ी चढ़ जाए. कुछ ने तो मोर्चा खोल लिया है. कोई तलवार ला रहा है तो कोई म्यान. कोई घोड़ी के इन्तजाम में लगा है तो कोई घोड़ी का जेवर तलाश रहा है. कोई कह रहा है शेरवानी मेरे पास है, तू तेरा पाजामा दे दे तो काम चल जाए, साफे का इन्तजाम उधर से हो जाएगा. एक बार सामान इकट्ठा हो जाए, बाद में तय कर लेंगे घोड़ी कौन चढ़ेगा?

अब आप सोच रहे होंगे कि मैंने बात तो सर्कस की की थी, पर ये स्वयंवर का वर्णन कहां ले बैठा. पर भारतीय स्वयंवर भी किसी सर्कस से कम नहीं होता. सर्कस में भी हर बार वही सब कुछ होता है जैसे हर बार स्वयंवर में वही कुछ होता है. फिर भी स्वयंवर होते हैं और सर्कस भी लौट-लौट कर आते हैं. दर्शक दोनों में हर बार जाते हैं. पर हर स्वयंवर और सर्कस में हर बार कुछ नया होता है. इस बार इस दी ग्रेट इंडियन सर्कस में भी एक नया प्राणी आया है. ऐसा प्राणी जो कभी जोकर सा लगता है, तो कभी शेर सा दिखाई देता है. कभी वह घोड़े की तरह दौड़ता है, तो कभी हाथी की तरह मस्त लगता है. उसे अक्सर टोपी और मफलर में देखा जाता है. लोग कहते हैं उसे भी दूल्हा बनाया जा सकता है. कोई दिखावा नहीं करता. एक स्वेटर में एक नहीं कई कई सीजन तक निकाल सकता है. लोग उस से पूछते भी हैं- दूल्हा बनोगे? तो मुस्कुरा कर बोलता है- हम कोई दूल्हा बनने थोड़े ही आए हैं जी, हम तो सर्कस में काम करने आए हैं. काम करेंगे, जो पब्लिक कहेगी वही दिखाएंगे जी. पब्लिक कहेगी कि दूल्हा बन के दिखाओ, तो दूल्हा भी बन के दिखा देंगे, सर जी?

खैर, यह तो बिस्मिल्लाह है, श्री गणेश है. पर्दा उठ चुका है. सर्कस के बिगुल बजने लगे हैं. आप अपनी अपनी सीट संभालिए और देखिए, आने वाले दिनों में क्या-क्या होता है?

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About Author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 Comments

  1. mahendra gupta on

    सिजदा है तेरे दर पे,तू ही रहनुमा है,
    तेरे खातिर मेरी जां भी कुर्बान हैं.
    एक बार बस मुझको तू गले लगा ले,
    तेरी हर ख़ुशी में …………….
    आज यही हालात हो गएँ है इन दूल्हों के.अभी सब कुछ करने को तैयार हैं पर समस्या है कि दुल्हन अपना मुहं तक नहीं खोल रही

  2. सिजदा है तेरे दर पे,तू ही रहनुमा है,
    तेरे खातिर मेरी जां भी कुर्बान हैं.
    एक बार बस मुझको तू गले लगा ले,
    तेरी हर ख़ुशी में …………….
    आज यही हालात हो गएँ है इन दूल्हों के.अभी सब कुछ करने को तैयार हैं पर समस्या है कि दुल्हन अपना मुहं तक नहीं खोल रही

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