/कत्ल होने के बोनांजा ऑफर्स…

कत्ल होने के बोनांजा ऑफर्स…

-संध्या नवोदिता||

मेरे पास मारे जाने के तरीकों के इतने आफरों की बाढ़ आ गयी है कि मैं हैरान हूँ.

मतलब अतीत में मरने के तरीके इतने जोर शोर से प्रचारित नहीं किये गये वरना तरीके मौजूद तो थे ही, इसके बोनान्जा आफर खपाने के लिए कितने ही लोगों को नरक से गुज़ारा गया.Sandhya Navodita

मसलन मैं चौरासी के दंगों की तरह गले में जलता टायर डाल कर नरकाग्नि का आनन्द लेते हुए मरूं, रातों-रात छोडी गयी गैस में घुटकर तड़प कर मरूं, या उन्नीस सौ बानवे की तरह तलवार से कटना और त्रिशूल भोंका जाना पसंद करूं.

या दो हज़ार दो की तरह रेलगाड़ी के डिब्बे में लगाईं आग से तड़प कर मरूं या अपने ही घर में सारे दरवाज़े खिड़कियाँ बंद कर बाहर पेट्रोल छिड़क कर लगाई गयी ब्लास्ट आग में तड़पना पसंद करूँ.

घर में पानी भर कर करेंट दौडाने का भी आफर है, त्रिशूल घोंप कर बड़ी कुशलता से अंदर की नन्ही जान को भी मुफ्त मारने का आफर है. इलेक्ट्रिक चेयर का विकल्प भी खुला है. तलवार से काट फेंकने का तो खैर पुराना आफर भी अभी पड़ा ही है.

मरने की तड़प का मजा कई गुना बढाने के लिए मुझे मोबाइल फोन, लैंडलाइन फोन वगैरह भी देने का आफर है कि उस आग से बचाने की खातिर मैं चाहे जिस मंत्री, प्रधानमन्त्री, दमकल, डाक्टर को फोन कर सकूं पर फोन नही उठाया जाएगा यह गारंटी है.

अब तो और नए आफरों की उम्मीद है. सुन रहे हैं गैस चैंबर बनवाये जायेंगे. हर शहर में हमारे जैसों के लिए पक्की व्यवस्था की जायेगी की प्राण जाएँ तो दुनिया इसे सैकड़ों साल तक नजीर के तौर पर याद रखे. वो कहते हैं कि हमारे जैसों की मौत को ऐतिहासिक बनायेंगे, ऎसी मौत देंगे कि देखने वालों तक की रूह काँप जायेगी.

मगर मुझमे डर समाया है. वो तो मेरी खातिर नए नए तरीके दिन रात ईजाद कर रहे हैं. वो दर्द को रस मानते हैं, मैं वीभत्स की कल्पना में हूँ.
मरना तो तय है पर कोई ऐसा आफर आये कि मरने में सबसे कम कष्ट हो तो बताना.

Facebook Comments

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.